भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुलिस की कमीनी चालें
पुलिस के लोग किस तरह नौजवानों को फँसाने और बरगलाने का काम करते
हैं, इस सम्बन्ध में यह लेख जून, 1928 'किरती' में छपा था। – स.
कुछ दिनों से पंजाब में बड़ी सनसनी फैली हुई है। एक अजीब कहानी का पता
चला है। पुलिस की एक अजीब करतूत का भण्डाफोड़ हुआ है। अब चूँकि
भण्डाफोड़ हो ही गया है इसलिए यह कहानी मज़ेदार लगती है, लेकिन दुर्भाग्य
से यदि भण्डाफोड़ न हुआ होता तो उसका परिणाम यह होना था कि कई नौजवान
फाँसी पर लटक गये होते और कइयों को कालापानी हो गया होता। भण्डाफोड़
लाहौर के अख़बार ट्रिब्यून (The Tribune) ने किया है।
कहानी यों है कि अप्रैल, 1927 में लाहौर स्टेशन पर एक बंगाली और एक
मेरठ निवासी नौजवान पकड़े गये। बंगाली के पास से पिस्तौल और मेरठ वाले के
पास से तेज़ाब मिला। कुछ दिन हवालात में रखने के बाद पहले तो मेरठ निवासी
नौजवान जिसका नाम मोहन सिंह रंक था, छोड़ दिया गया और बंगाली पर मुक़दमा
चलाया गया। कुछ दिनों बाद बंगाली को भी जमानत पर छोड़ दिया गया। जमानत
पाँच सौ की हुई थी। पेशी वाले दिन वह हाज़िर न हुआ, फिर भी उसकी जमानत
ज़ब्त नहीं की गयी। उसे वारण्ट निकालकर मेरठ से गिरफ़्तार कर लाया गया और
मि. हीरालाल फैलूक्स ने उसे पाँच साल की क़ैद का दण्ड दिया। लाहौर के राष्ट्रीय
कार्यकर्ताओं को उससे हमदर्दी पैदा हुई। उसके लिए अपील का प्रबन्ध किया गया।
अपील अभी पेश भी नहीं हुई थी कि वह छूटकर घर चला गया। सब लोग हैरान।
उड़ती-उड़ती बात यह सुनी जा रही थी कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का भाड़े का टट्टू
था। लेकिन निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
अब कुछ दिन पहले उसके उन दिनों के लिखे हुए कुछ पत्र 'ट्रिब्यून' में छपे
हैं। एक पत्र तो मेरठ के पुलिस कप्तान के नाम है और एक लाहौर के पुलिस
कप्तान के नाम और एक ऐसा है जिसमें उसने अपना सारा हाल लिखा है। उसने
लिखा है कि वह ख़ुफ़िया पुलिस का एक जासूस है और कई बरसों से पुलिस
का काम कर रहा है। पुलिस को पता चला कि एक और आदमी 'एन' नाम का
मैनपुरी का रहने वाला है। जिसके पास दो पिस्तौलें हैं। के.सी. बनर्जी को, जोकि
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 261