भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 264, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंग्रेज़ी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग़ का कीड़ा ठिकाने पर
आ जाता है।
जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों
का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली।
वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा उठाया हुआ था और जो
“समान राष्ट्रीयता” और “स्वराज-स्वराज” के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही
या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले
हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है, और साम्प्रदायिकता की
ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है
कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं,
वे अख़बार वाले हैं।
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज
बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक
देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौव्वल करवाते हैं।
एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय
अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक, जिनका दिल व दिमाग़
ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं।
अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना,
साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता
का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान
दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल
उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति
देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्रता की झलक सामने दिखायी देती थी
और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना-मात्र बन गया है। बस यही तीसरा
लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। वही नौकरशाही – जिसके
अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी – आज अपनी जड़ें
इतनी मज़बूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही
जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी
आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर
258 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़