भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
75 दिन अनशन करके स्वर्गधाम को सिधारने वाला वीर मैकस्वेनी इस मार्ग
का पथिक होने का श्रेय प्राप्त कर सकता है जो कहता था – "It is the love of
the country that inspires us and not the hate of the enemy and the desire
for full satisfaction for the past."
विश्वप्रेम की देवी का उपासक था ‘गीता रहस्य’ का लेखक पूज्य लोकमान्य
तिलक। और देखोगे? वह सूखा सुकड़ा-सा ‘लँगोटबन्द’ जो सज़ा का हुक्म सुनाये
जाने पर स्वर्गीय हँसी के साथ कह सकता था – मुझे जो दण्ड दिया गया वह
अत्यन्त हलका है और मेरे साथ जैसा विनम्र व्यवहार किया गया है उससे अधिक
की आशा मैं नहीं कर सकता था, जिसके मर्मस्पर्शी कथन का तुम्हारे पत्थर के
हृदयों पर कुछ प्रभाव नहीं होना – महात्मा है इस सिद्धान्त का पक्षपाती।
अरे! रावण और बाली को मार गिराने वाले रामचन्द्र ने अपने विश्वप्रेम का
परिचय दिया था भीलनी के जूठे-कूठे बेरों को खाकर। चचेरे भाइयों में घोर युद्ध
करवा देने वाले, संसार से अन्याय को सर्वथा उठा देने वाले कृष्ण ने परिचय दिया
अपने विश्वप्रेम का – सुदामा के कच्चे चावलों को फाँक जाने में।
तुम भी विश्वप्रेम का दम भरते हो! पहिले पैरों पर खड़ा होना सीखो। स्वतन्त्र
जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊँचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक
तुम्हारे साथ कामागाटामारू जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, जब तक डैम काला
मैन कहलाओगे, जब तक तुम्हारे देश में जलियाँवाले बाग़ जैसे भीषण हत्याकाण्ड
होते रहेंगे, जब तक वीराँगनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार
न होगा; तब तक तुम्हारा यह ढोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति, कैसा सुख
और कैसा विश्वप्रेम?
यदि वास्तव में चाहते हो कि संसारव्यापी सुख-शान्ति और विश्वप्रेम का प्रचार
करो तो पहिले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। माँ के बन्धन काटने के लिए
कट मरो। बन्दी माँ को स्वतन्त्र करने के लिए आजन्म कालेपानी में ठोकरें खाने
को तैयार हो जाओ। सिसकती माँ को जीवित रखने के लिए मरने को तत्पर हो
जाओ। तब हमारा देश स्वतन्त्र होगा। हम बलवान होंगे। हम छाती ठोंककर विश्वप्रेम
का प्रचार कर सकेंगे। संसार को शान्ति-पथ पर चलने को बाध्य कर सकेंगे।
94 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
युवक!
भगतसिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 38, 16 मई,
1925) में बलवन्त सिंह के नाम से छपा था। केवल 17 वर्ष कुछ महीने की उम्र
में हिन्दी में लिखा यह लेख भगतसिंह की भाषा के ओज और लालित्य की एक
मिसाल है। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य
शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ ‘आलोचना’ में
प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है। – स.
आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश (पृष्ठ 28)
23 मार्च
सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त भगतसिंह की स्मृति में
सभा हुई। भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था; जिसको
सँवार-सुधारकर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित
‘युवक-साहित्य’ में संगृहीत भी मैंने ही किया था। वह लेख बलवन्त सिंह के नाम
से लिखा था। क्रान्तिकारी लेख प्रायः गुमनाम लिखते थे। यह रहस्य किसी को ज्ञात
नहीं। वह लेख युवक-विषयक था। वह लाहौर से उन्होंने भेजा था। असली नाम
की जगह ‘बलवन्त सिंह’ ही छापने को लिखा था।
आलोचना – 67 / वर्ष 32 / अक्टूबर-दिसम्बर, 1983
युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो
जाता है। हज़ारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ
सहस्त्र-धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदान्ध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन
शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष, प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत
वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह
उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्ज्वल प्रभात की शोभा,
स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्याह्न का उत्ताप और
भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में सन्निहित है। जैसे
क्रान्तिकारी के जेब में बमगोला, षड्यन्त्री की असटी में भरा-भराया तमंचा,
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 95
रण-रस-रसिक वीर के हाथ में खड्ग, वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था। 16
से 25 वर्ष तक हाड़-चाम के सन्दूक में संसारभर के हाहाकारों को समेटकर
विधाता बन्द कर देता। दस बरस तक यह झाँझरी नैया मंझधार तूफ़ान में डगमगाती
रहती है। युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुन्धरा से भी सुन्दर है, पर इसके
अन्दर भूकम्प की-सी भयंकरता भरी हुई है। इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए
केवल दो ही मार्ग हैं – वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर, वह गिर
सकता है अधःपात के अँधेरे खन्दक में। चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे
तो विलासी बन सकता है युवक। वह देवता बन सकता है, तो पिशाच भी बन
सकता है। वही संसार को त्रस्त कर सकता है, वही संसार को अभयदान दे सकता
है। संसार में युवक का ही साम्राज्य है। युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास
भरा पड़ा है। युवक ही रणचण्डी के ललाट की रेखा है। युवक स्वदेश की
यश-दुन्दुभि का तुमुल निनाद है। युवक ही स्वदेश की विजय-वैजयन्ती का सुदृढ़ी
दण्ड है। वह महासागर की उत्ताल तरंगों के समान उद्दण्ड है। वह महाभारत के
भीष्मपर्व की पहली ललकार के समान विकराल है, प्रथम मिलन के स्फ़ीत चुम्बन
की तरह सरस है, रावण के अहंकार की तरह निर्भीक है, प्रह्लाद के सत्याग्रह की
तरह दृढ़ और अटल है। अगर किसी विशाल हृदय की आवश्यकता हो, तो युवकों
के हृदय टटोलो। अगर किसी आत्मत्यागी वीर की चाह हो, तो युवकों से माँगो।
रसिकता उसी के बाँटे पड़ी है। भावुकता पर उसी का सिक्का है। वह छन्दः शास्त्र
से अनभिज्ञ होने पर भी प्रतिभाशाली कवि है। कवि भी उसी के हृदयारविन्द का
मधुप है। वह रसों की परिभाषा नहीं जानता, पर वह कविता का सच्चा मर्मज्ञ है।
सृष्टि की एक विषम समस्या है युवक। ईश्वरीय रचना-कौशल का एक उत्कृष्ट
नमूना है युवक। सन्ध्या समय वह नदी के तट पर घण्टों बैठा रहता है। क्षितिज की
ओर बढ़ते जाने वाले रक्त-रश्मि सूर्यदेव को आकृष्ट नेत्रों से देखता रह जाता है।
उस पार से आती हुई संगीत-लहरी के मन्द प्रवाह में तल्लीन हो जाता है। विचित्र
है उसका जीवन। अद्भुत है उसका साहस। अमोघ है उसका उत्साह।
वह निश्चिन्त है, असावधान है। लगन लग गयी, तो रातभर जागना उसके बायें
हाथ का खेल है, जेठ की दुपहरी चैत की चाँदनी है, सावन-भादों की झड़ी
मंगलोत्सव की पुष्पवृष्टि है, श्मशान की निस्तब्धता, उद्यान का विहग-कल-
कूजन है। वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध कर दे, देश की लाली
रख ले, राष्ट्र का मुखोज्ज्वल कर दे, बड़े-बड़े साम्राज्य उलट डाले। पतितों के
उत्थान और संसार के उद्धारक सूत्र उसी के हाथ में हैं। वह इस विशाल
विश्व-रंगस्थल का सिद्धहस्त खिलाड़ी है।
अगर रक्त की भेंट चाहिए, तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान
चाहते हो, तो तुम्हें युवक की ओर देखना पड़ेगा। प्रत्येक जाति के भाग्यविधाता
96 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
युवक ही तो होते हैं। एक पाश्चात्य पण्डित ने ठीक कहा है - It is an
established truism that youngmen of today are the Countrymen of
tomorrow holding in their hands the high destinies of the Land. They are
the seeds that spring and bear fruit. भावार्थ यह कि आज के युवक ही कल
के देश के भाग्य-निर्माता हैं। वे ही भविष्य के सफलता के बीज हैं।
संसार के इतिहासों के पन्ने खोलकर देख लो, युवक के रक्त से लिखे हुए
अमर सन्देश भरे पड़े हैं। संसार की क्रान्तियों और परिवर्तनों के वर्णन छाँट डालो,
उनमें केवल ऐसे युवक ही मिलेंगे, जिन्हें बुद्धिमानों ने 'पागल छोकड़े' अथवा
'पथ-भ्रष्ट' कहा है। पर जो सिड़ी हैं, वे क्या ख़ाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान से
उन्मत्त होकर अपनी लोथों से क़िले की खाइयों को पाट देने वाले जापानी युवक
किस फ़ौलाद के टुकड़े थे। सच्चा युवक तो बिना झिझक के मृत्यु का आलिंगन
करता है, चोखी संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुँह पर
बैठकर भी मुस्कुराता ही रहता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और
फाँसी के तख्ते पर अट्टहासपूर्वक आरूढ़ हो जाता है। फाँसी के दिन युवक का
ही वज़न बढ़ता है, जेल की चक्की पर युवक ही उद्बोधन-मन्त्र गाता है,
कालकोठरी के अन्धकार में धँसकर ही वह स्वदेश को अन्धकार के बीच से
उबारता है। अमेरिका के युवक-दल के नेता 'पैट्रिक हेनरी' ने अपनी ओजस्विनी
वक्तृता में एक बार कहा था - Life is dearer outside the prisonwalls, but it
is immeasurably dearer within the prison-cells, where it is the price paid for
the freedom's fight. अर्थात जेल की दीवारों से बाहर की ज़िन्दगी बड़ी महँगी है,
पर जेल की काल-कोठरियों की ज़िन्दगी और भी महँगी है; क्योंकि वहाँ यह
स्वतन्त्रता-संग्राम के मूल्य-रूप में चुकायी जाती है।
जब ऐसा सजीव नेता है, तभी तो अमेरिका के युवकों में यह ज्वलन्त घोषणा
करने का साहस भी है कि, "We believe that when a Government becomes
a destructive of the natural right of man, it is the man's duty to destroy that
Government. अर्थात अमेरिका के युवक विश्वास करते हैं कि जन्मसिद्ध
अधिकारों को पद-दलित करने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य
है।
ऐ भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेख़बर सो रहा है! उठ,
आँखें खोल, देख, प्राची-दिशा का ललाट सिन्दूर-रंजित हो उठा। अब अधिक मत
सो। सोना हो तो अनन्त निद्रा की गोद में जाकर सो रह। कापुरुषता के क्रोड़ में क्यों
सोता है? माया-मोह-ममता त्यागकर गरज उठ -
"Farewell Farewell My true Love
The army is on Move;
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 97
And if I stayed with you Love,
A coward I shall prove."
तेरी माता, तेरी प्रातः स्मरणीया, तेरी परम वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी
अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्यश्यामलांचला आज
फूट-फूटकर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती?
धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर! तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपुंसत्व पर! यदि
अब भी तेरे किसी अंग में टुक हया बाक़ी हो, तो उठकर माता के दूध की लाज
रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आँसुओं की एक-एक बूँद की सौगन्ध
ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कण्ठ से – वन्देमातरम्।
98 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
III.
विरासत से साक्षात्कार :
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन
The provided image is entirely blank, with no visible text or content to transcribe.
होली के दिन रक्त के छींटे
घर से भागकर भगतसिंह कानपुर चले गये। वहाँ वे गणेशशंकर विद्यार्थी के
साप्ताहिक ‘प्रताप’ के सम्पादकीय विभाग में काम करने लगे। कानपुर में ही
क्रान्तिकारी पार्टी से उनके गहरे सम्बन्ध बने। शिव वर्मा, जयदेव कपूर, बटुकेश्वर
दत्त, विजयकुमार सिन्हा व क्रान्तिकारी पार्टी के अन्य साथियों के साथ राजनीतिक
बहसें और अध्ययन चलता रहा।
पंजाब में बब्बर अकाली आन्दोलन चल रहा था। उस आन्दोलन के छह
कार्यकर्ताओं की फाँसी पर ‘एक पंजाबी युवक’ के नाम से 15 मार्च, 1926 के
‘प्रताप’ में यह लेख हिन्दी में छपा था। उस आन्दोलन की जानकारी तो लेख से मिलती
ही है, साढ़े अठारह वर्षीय भगतसिंह की मानसिक परिपक्वता भी इस लेख से
झलकती है। – स.
होली के दिन – 27 फ़रवरी, 1926 के दिन, जब हम लोग खेल-कूद में व्यस्त
हो रहे थे, उसी समय इस विशाल प्रदेश के एक कोने में एक भीषण काण्ड किया
जा रहा था। सुनोगे तो सिहर उठोगे! काँप उठोगे!! लाहौर सेण्ट्रल जेल में ठीक उसी
दिन छह बब्बर अकाली वीर फाँसी पर लटका दिये गये। श्री किशन सिंह जी
गड़गज्ज, श्री सन्त सिंह जी, श्री दिलीप सिंह जी, श्री नन्द सिंह जी, श्री करम सिंह
जी व श्री धरम सिंह जी लगभग दो वर्ष से अपने इसी अभियोग में जो उपेक्षा, जो
लापरवाही दिखा रहे थे, उसी से जाना जा सकता था कि वे इस दिन की प्रतीक्षा
कितने चाव से करते थे। महीनों बाद जज महोदय ने फ़ैसला सुनाया। पाँच को
फाँसी, बहुतों को कालापानी अथवा देश-निकाला और लम्बी-लम्बी कैदें।
अभियुक्त वीर गरज उठे। उन्होंने आकाश को अपने जयघोषों से गुंजायमान कर
दिया। अपील हुई। पाँच की जगह छह मृत्युदण्ड के भागी बने। उस दिन समाचार
पढ़ा कि दया के लिए अपील भेजी गयी है, पंजाब सचिव ने घोषणा की कि अभी
फाँसी नहीं दी जायेगी।
प्रतीक्षा थी, परन्तु एकाएक क्या देखते हैं कि होली के दिन शोकग्रस्त लोगों
का एक छोटा समूह उन वीरों के मृत शवों को शमशान में लिये जा रहा है। चुपचाप
उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया समाप्त हो गयी।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 101
नगर में वही धूम थी। आने-जाने वालों पर उसी प्रकार रंग डाला जा रहा था।
कैसी भीषण उपेक्षा थी! यदि वे पथभ्रष्ट थे तो होने दो, उन्मत्त थे तो होने दो। वे
निर्भीक देशभक्त तो थे। उन्होंने जो कुछ किया था, इस अभागे देश के ही लिए
तो किया था। वे अन्याय न सहन कर सके, देश की पतित अवस्था को न देख
सके, निर्बलों पर ढाये जाने वाले अत्याचार उनके लिए असह्य हो उठे, आम जनता
का शोषण वह बरदाश्त न कर सके, उन्होंने ललकारा और वे कूद पड़े कर्मक्षेत्र
में। वे सजीव थे, वे सदृश थे। कर्मक्षेत्र की भीषणते! धन्य है तू!! मृत्यु के पश्चात
मित्र-शत्रु सब समान हो जाते हैं, यह आदर्श पुरुषों का। अगर उन्होंने कोई घृणित
कार्य किया भी हो, तो स्वदेश के चरणों में जिस साहस और तत्परता से उन्होंने
अपने प्राण चढ़ा दिये, उसे देखते हुए तो उनकी पूजा की जानी चाहिए। श्री टेगार्ड
महोदय विपक्षी दल के होने पर भी जतीन मुकर्जी, बंगाल के वीर क्रान्तिकारी, की
मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए उनकी वीरता, देशप्रेम और कर्मशीलता की मुक्त
कण्ठ से प्रशंसा कर सकते हैं, परन्तु हम, कायर नरपशु, एक क्षण के लिए भी
आनन्द-विलास छोड़ वीरों की मृत्यु पर आह तक भरने का साहस नहीं करते।
कितनी निराशाजनक बात है! उन ग़रीबों का जो अपराध नौकरशाही की दृष्टि में
था, उसका उन्होंने पर्याप्त दण्ड, क्रूर नौकरशाही की भी दृष्टि में पा लिया। इस
भीषण दुखान्त नाटक का एक और पर्व समाप्त हो गया। अभी यवनिका-पतन नहीं
हुआ है। नाटक अभी कुछ दिन और भीषण दृश्य दिखायेगा। कथा लम्बी है, सुनने
के लिए ज़रा दूर तक पीछे मुड़ना होगा।
असहयोग आन्दोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब
में सिक्ख भी उठे, बड़ी गहरी नींद से उठे और उठे खूब ज़ोरों के साथ। अकाली
आन्दोलन शुरू हुआ। बलिदानों की लड़ी लग गयी। मास्टर मोता सिंह, खालसा
मिडिल स्कूल, माहलपुर, ज़िला होशियारपुर, के भूतपूर्व मास्टर महोदय ने एक
व्याख्यान दिया। उनका वारण्ट निकला। परन्तु सम्राट का आतिथ्य उन्हें स्वीकार न
था। यों ही जेलों में चले जाने के वे विरोधी थे। उनके व्याख्यान फिर भी होते रहे।
कोट फतूही नामक ग्राम में भारी दीवान हुआ, पुलिस ने चारों ओर से घेरा डाला,
फिर भी मास्टर मोता सिंह ने व्याख्यान दिया। अन्त में प्रधान की आज्ञा से सभी
दर्शक उठ गये। मास्टर जी न जाने किधर पहुँचे। बहुत दिनों तक इसी तरह यह
आँखमिचौनी का खेल होता रहा। सरकार बौखला उठी। अन्त में एक हमजोली ने
धोखा दिया और डेढ़ वर्ष बाद एक दिन मास्टर साहब पकड़ लिये गये। यह पहला
दृश्य था उस भयानक नाटक का।
गुरु का बाग़ आन्दोलन शुरू हुआ। निहत्थे वीरों पर जिस समय भाड़े के टट्टू
टूट पड़ते, उन्हें मार-मारकर अधमरा-सा कर देते, देखने-सुनने वालों में से कौन
होगा जो द्रवित न हो उठा हो! चारों ओर गिरफ़्तारियों की धूम थी। सरदार किशन
102 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सिंह गड़गज्ज के नाम भी वारण्ट निकला। मगर वे भी तो उसी दल के थे। उन्होंने
भी गिरफ़्तार होना स्वीकार नहीं किया। पुलिस हाथ धोकर पीछे पड़ गयी, पर फिर
भी वे बचते ही रहे। उनका संगठित किया हुआ अपना एक क्रान्तिकारी दल था।
निहत्थों पर किये जाने वाले अत्याचार को वे सहन न कर सके। इस शान्तिपूर्ण
आन्दोलन के साथ-साथ उन्होंने शस्त्रों का प्रयोग भी ज़रूरी समझा।
एक ओर कुत्ते, शिकारी कुत्ते, उनको खोज निकालने के लिए सूँघते फिरते थे,
दूसरी ओर निश्चय हुआ कि खुशामदियों (झोलीचुक्कों) का सुधार किया जाये।
सरदार किशन सिंह जी कहते थे, अपनी रक्षा के लिए हमें सशस्त्र ज़रूर रहना
चाहिए, पर अभी कोई और क़दम न उठाना चाहिए। परन्तु बहुमत दूसरी ओर था।
अन्त में फ़ैसला हुआ कि तीन व्यक्ति अपने नाम घोषित कर दें और सारी ज़िम्मेदारी
अपने ऊपर ले लें तथा झोलीचुक्कों का सुधार शुरू कर दें। श्री कर्म सिंह, श्री धन्ना
सिंह तथा श्री उदय सिंह जी आगे बढ़े। यह उचित था अथवा अनुचित, इसे एक
ओर हटाकर ज़रा उस समय की कल्पना तो कीजिये, जब इन नवीन वीरों ने शपथ
ली थी –
‘हम देश-सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देंगे, हम प्रतिज्ञा करते हैं कि
लड़ते-लड़ते मर जायेंगे, मगर जेल जाना मंज़ूर न करेंगे।’
जिन्होंने अपने परिवार का मोह त्याग दिया था वे लोग जब ऐसी शपथ ले रहे
थे, उस समय कैसा सुन्दर, मनोरम, पवित्रता से परिपूरित दृश्य रहा होगा! आत्मत्याग
की पराकाष्ठा कहाँ है? साहस और निर्भीकता की सीमा किस ओर है?
आदर्शपरायणता की चरमता का निवास किधर है?
श्याम चुरासी, होशियारपुर ब्रांच रेलवे लाइन के एक स्टेशन के निकट सबसे
पहले एक सूबेदार पर हाथ साफ़ किया गया। उसके बाद इन तीनों व्यक्तियों ने
अपने नाम भी घोषित कर दिये। सरकार ने पूरी ताक़त लगाकर इन्हें पकड़ने की
कोशिश की, मगर सफलता न मिली। रुड़की कलाँ में सरदार किशन सिंह
गड़गज्ज घिर गये। उनके साथ एक और युवक भी था जो वहीं घायल होकर
पकड़ा गया। परन्तु किशन सिंह वहाँ से भी अपने शस्त्रों की सहायता से बच
निकले। रास्ते में उन्हें एक साधु मिला। उसने उन्हें बताया कि उसके पास एक
ऐसी बूटी है कि जिसकी सहायता से मनचाहा काम आसानी से किया जा सकता
है। भ्रम में फँसकर एक दिन वे अपने शस्त्र रखकर इसी साधु के पास गये। कुछ
दवाई रगड़ने को देकर साधु बूटी लेने गया और पुलिस को ले आया। सरदार
साहब पकड़ लिये गये। वह साधु सी.आई.डी. विभाग का सब-इंस्पेक्टर था।
बब्बर अकाली वीरों ने अपना काम ख़ूब ज़ोरों के साथ शुरू कर दिया। कितने ही
सरकार के सहायक मार डाले गये। दोआब – व्यास और सतलुज के बीच में,
जालन्धर और होशियारपुर का ज़िला पहले ही भारत के राजनीतिक मानचित्र में
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 103
प्रसिद्ध है। 1915 के शहीदों में भी अधिकतर इन्हीं ज़िलों के लोग थे। अब फिर
वहीं पर धूम मची। पुलिस विभाग ने सारी शक्ति ख़र्च कर दी, परन्तु कुछ न बन
पड़ा। जालन्धर से कुछ दूर एक बिल्कुल छोटी-सी नदी है। उसके किनारे एक
गाँव में ‘चौंतासाहब’ नामक गुरुद्वारा है। उसमें श्री कर्म सिंह जी, श्री धन्ना सिंह
जी, श्री उदय सिंह जी तथा श्री अनूप सिंह जी दो-एक और व्यक्तियों के साथ
बैठे थे, चाय बनाने की तैयारियाँ हो रही थीं। बैठे-बैठे श्री धन्ना सिंह ने कहा,
‘बाबा कर्म सिंह जी! हमें यहाँ से अभी इसी वक़्त चल देना चाहिए। मुझे किसी
बुरी घटना होने का-सा आभास हो रहा है।’ 75 वर्ष के बूढ़े कर्म सिंह ने इस
बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। पर श्री धन्ना सिंह अपने साथ 18 वर्षीय
दिलीप सिंह को लेकर चले ही गये। बैठे-बैठे बाबा कर्म सिंह ने श्री अनूप सिंह
की ओर बड़े ग़ौर से देखकर कहा – ‘अनूप सिंह, तुम अच्छे आदमी हो,’ मगर
इसके बाद उन्होंने खुद भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया। बातें अभी हो रही थीं
कि सचमुच ही पुलिस आ धमकी। सारे बम श्री अनूप सिंह के क़ब्ज़े में थे। ये
सब लोग उठकर गाँवों में छिप गये। पुलिस ने लाख सिर मारा, पर विफल रही।
अन्त में पुलिस की ओर से एक घोषणा की गयी। बागियों को निकालो, वरना
गाँव में आग लगा दी जायेगी। पर गाँव वाले विचलित नहीं हुए।
अवस्था को देखकर वे सब खुद ही बाहर निकल पड़े। सारे बम अनूप सिंह
ले भागा और जाकर आत्मसमर्पण कर दिया। शेष चार व्यक्ति वहीं पर घिरे हुए
खड़े थे। पुलिस के अंग्रेज़ कप्तान ने कहा, ‘कर्म सिंह! हथियार छोड़ दो, तुम्हें
माफ़ कर दिया जायेगा।’ वीर ने ललकारकर जवाब दिया – ‘हम अपने देश के
लिए सच्चे क्रान्तिकारी की तरह लड़ते-लड़ते शहीद हो जायेंगे, पर हथियार नहीं
डाल सकते।’ उन्होंने अपने तीनों साथियों को ललकारा। वे सिंह की तरह गरज
उठे। लड़ाई छिड़ गयी। खूब दनादन गोलियाँ चलीं। गोली-बारूद समाप्त होने पर
वे वीर पानी में कूद पड़े और घण्टों गोलियों की वर्षा होते रहने पर ये चारों वीर
स्वर्गधाम सिधार गये।
श्री कर्म सिंह की आयु 75 वर्ष की थी। वह कनाडा में रह चुके थे। उनका
आचरण पवित्र और चरित्र आदर्श था। सरकार ने समझा, बब्बर अकाली ख़त्म हो
गये, परन्तु वे उन्नति कर रहे थे। 18 वर्षीय दिलीप सिंह एक अत्यन्त सुन्दर, सुदृढ़,
हृष्ट-पुष्ट, पर अशिक्षित नवयुवक थे, और उनका डाकुओं का साथ हो गया था।
धन्ना सिंह जी की शिक्षा ने उन्हें डाकुओं से एक सच्चा क्रान्तिकारी बना दिया।
उधर सरदार बन्ता सिंह और वरियाम सिंह आदि कई प्रसिद्ध डाकू डाकेज़नी
छोड़कर इनमें आ मिले।
इन सबमें मृत्यु का डर नहीं था। ये अपने पिछले कुकर्मों को धो डालना चाहते
थे। इनकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। एक दिन मानहाना नामक गाँव में
104 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
धन्ना सिंह बैठे थे, पुलिस बुला ली गयी। नशे में चूर धन्ना सिंह बैठे ही पकड़
लिये गये। उनका भरा हुआ पिस्तौल छीनकर हाथों में हथकड़ी लगा दी गयी और
उन्हें बाहर लाया गया। बारह साधारण सिपाही और दो अंग्रेज़ ऑफ़िसर उनको घेरकर
खड़े हो गये। ठीक उसी समय धमाके की आवाज़ हुई। धन्ना सिंह जी ने बम चला
दिया था। इससे वे स्वयं भी मरे और साथ ही एक अंग्रेज़ ऑफ़िसर और दस
सिपाही। बाक़ी के लोग बुरी तरह घायल हुए।
इसी तरह मुण्डेर नामक गाँव में बैठे हुए बन्ता सिंह, ज्वाला सिंह आदि कई
लोग घिर गये। ये सब छत पर बैठे हुए थे। गोली चली, कुछ देर तक अच्छी झड़प
होती रही, पर पुलिस ने पम्प से मिट्टी का तेल छिड़ककर घर में आग लगा दी।
फिर भी वरयाम सिंह बच निकले, परन्तु बन्ता सिंह वहीं मारे गये।
अगर इससे पहले की एक-दो अन्य घटनाओं का वर्णन कर दिया जाये तो
अनुचित न होगा। बन्ता सिंह बड़े साहसी पुरुष थे। एक बार, शायद जालन्धर छावनी
जाकर रिसाले में पहरे पर खड़े हुए सिपाही की घोड़ी तथा रायफ़ल वे छीन लाये
थे। इन दिनों, जबकि पुलिस के दस्ते के दस्ते इनकी तलाश में मारे-मारे फिरते
थे, कहीं जंगल में किसी दस्ते से इनकी भेंट हो गयी। सरदार बन्ता सिंह ने फ़ौरन
चुनौती दी – ‘अगर हिम्मत हो तो दो-दो हाथ कर लो,’ परन्तु उस ओर तो थे पैसे
के गुलाम और इस ओर आत्मोत्सर्ग के इच्छुक। तुलना कैसे हो सकती है। सिपाहियों
का दस्ता चुपचाप चला गया।
इन लोगों को पकड़ने के लिए ख़ासतौर से पुलिस नियुक्त की गयी थी। और
उसकी थी यह दशा! खैर, गिरफ्तारियों की भरमार थी। गाँव-गाँव में पुलिस की
ताजीरी चौकियाँ बिठायी जाने लगीं। धीरे-धीरे बब्बर अकालियों का ज़ोर कम होने
लगा। अब तक तो मानो इन्हीं का राज्य था। जहाँ जाते, कुछ लोग हर्ष और चाव
से, कुछ भय और त्रास से इनकी खूब आवभगत करते। सरकार के सहायक एकदम
पस्त हुए बैठे थे। सूर्योदय के पहले सूर्योदय के बाद घर से निकलने का साहस
ही उन्हें न होता था। ये उन दिनों के ‘हीरो’ समझे जाते थे। वे वीर थे और उनकी
पूजा वीर-पूजा समझी जाती थी। परन्तु धीरे-धीरे उनका ज़ोर ख़त्म हो गया। सैकड़ों
पकड़े गये, मुक़दमे शुरू हुए।
वरयाम सिंह अकेले बचे थे। जालन्धर, होशियारपुर में पुलिस का अधिक ज़ोर
देखकर वे दूर लायलपुर में जा रहे थे। वहाँ पर एक दिन बिल्कुल घिर गये, मगर
खूब शान के साथ लड़ते हुए बच निकले, लेकिन बहुत थक गये थे। कोई साथी
भी न था। दशा बड़ी विचित्र थी। एक दिन ढेंसिया नामक गाँव में अपने मामा के
पास गये। शस्त्र बाहर रखे थे। शाम को भोजन करने के बाद अपने शस्त्रों के पास
जा रहे थे कि पुलिस आ पहुँची। फिर घिर गये। अंग्रेज़ नायक ने उन्हें पीछे से जा
पकड़ा। उन्होंने कृपाण से ही उसे बुरी तरह घायल कर दिया। फिर वे नीचे गिर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 105
गये। हथकड़ी पहनाने की सारी चेष्टाएँ विफल हुईं। दो वर्ष के पूर्ण दमन के पश्चात
अकाली जत्थे का अन्त हुआ। उधर मुक़दमा चलने लगा, जिसका परिणाम ऊपर
लिखा जा चुका है। अभी उस दिन इन लोगों ने शीघ्र फाँसी पर चढ़ाये जाने की
इच्छा प्रकट की थी। उनकी वह इच्छा पूरी हो गयी। वे शान्त हो गये।
106 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के वीरों से परिचय
9 अगस्त, 1925 को शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला और उनके
अन्य क्रान्तिकारी साथियों ने क्रान्तिकारी पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य
से लखनऊ के क़रीब काकोरी के पास रेलगाड़ी रोक सरकारी ख़ज़ाना लूटा। इसके
बाद चन्द्रशेखर आज़ाद के अलावा बाक़ी सभी क्रान्तिकारी पकड़े गये। भगतसिंह भी
तब कानपुर निवास के समय हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में भरती हो चुके थे।
‘विद्रोही’ नाम से मई, 1927 में भगतसिंह ने ‘काकोरी के वीरों से परिचय’
शीर्षक लेख पंजाबी में छपवाया। उस लेख के छपते ही भगतसिंह को गिरफ़्तार कर
लिया गया। चारपाई पर हथकड़ी लगे बैठे भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र इसी गिरफ़्तारी
के समय लिया गया। इससे पहले भगतसिंह पंजाब लौटकर शचीन्द्रनाथ सान्याल की
पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ का पंजाबी अनुवाद छपवा चुके थे। – स.
पहले ‘किरती’ (पंजाबी पत्रिका) में काकोरी से सम्बन्धित कुछ लिखा जा चुका
है। आज हम काकोरी षड्यन्त्र और उन वीरों के सम्बन्ध में कुछ लिखेंगे जिन्हें उस
सम्बन्ध में कड़ी सज़ाएँ मिली हैं।
9 अगस्त, 1925 को एक छोटे-से स्टेशन काकोरी से एक पैसेंजर ट्रेन चली।
यह स्टेशन लखनऊ से आठ मील की दूरी पर है। ट्रेन मील-डेढ़ मील चली होगी
कि सेकेण्ड क्लास में बैठे हुए तीन नौजवानों ने गाड़ी रोक ली और दूसरों ने
मिलकर गाड़ी में जा रहा सरकारी ख़ज़ाना लूट लिया। उन्होंने पहले ही ज़ोर से
आवाज़ देकर सभी यात्रियों को समझा दिया था कि वे डरें नहीं, क्योंकि उनका
उद्देश्य यात्रियों को तंग करने का नहीं, सिर्फ़ सरकारी ख़ज़ाना लूटने का है। खैर,
वे गोलियाँ चलाते रहे। वह (कोई यात्री) आदमी गाड़ी से उतर पड़ा और गोली
लग जाने से मर गया।
सरकारी अधिकारी हार्टन, सी.आई.डी. इसकी जाँच में लगा। उसे पहले से ही
यक़ीन हो गया था कि यह डाका क्रान्तिकारी जत्थे का काम है। उसने सभी
सन्दिग्ध व्यक्तियों की छान-बीन शुरू कर दी। इतने में क्रान्तिकारी जत्थे की राज्य
परिषद की एक बैठक मेरठ में होनी तय हुई। सरकार को इसका पता चल गया।
वहाँ ख़ूब छानबीन की गयी।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 107
फिर सितम्बर के अन्त में हार्टन ने गिरफ्तारियों के वारण्ट जारी किये और 26
सितम्बर को बहुत-सी तलाशियाँ ली गयीं और बहुत-से व्यक्ति पकड़ लिये गये।
कुछ नहीं पकड़े गये। उनमें से एक श्री राजेन्द्र लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम केस में
पकड़े गये और वहीं उन्हें दस बरस क़ैद हो गयी। और श्री अशफ़ाक़उल्ला और
शचीन्द्र बख्शी बाद में पकड़े गये, जिन पर अलग मुक़दमा चला।
जज के फ़ैसले से यह पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन दब जाने से
देशभक्त युवकों का शान्ति से विश्वास उठ गया और उन्होंने युगान्तर दल स्थापित
किया। श्री जोगेशचन्द्र चट्टोपाध्याय बंगाल से इस दल का संगठन बनाने यू.पी.
आये और पक्का काम कर सितम्बर, 1924 में लौट गये। उस समय बंगाल में
आर्डिनेंस पास हो चुका था और आप लौटते ही हावड़ा पुल पर पकड़े गये। तलाशी
लेने पर आपकी जेब से एक काग़ज़ मिला, जिस पर यू.पी. की राज्य परिषद की
किसी बैठक का और यू.पी. में अपने दल के संगठन का हाल लिखा हुआ था।
खैर, फिर काम चल पड़ा और काम चलाने की ख़ातिर कई डकैतियाँ भी की गयीं।
जज के विचार में इस दल के नेता हैं — श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल।
श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल का नाम किससे छिपा है। आप ही ‘बन्दी जीवन’
जैसी प्रसिद्ध व शानदार पुस्तक के लेखक हैं। बनारस के निवासी हैं और 1915
के ग़दर आन्दोलन में आपने खूब काम किया था। आप बनारस षड्यन्त्र के नेता
व श्री रासबिहारी जी का दायाँ हाथ थे। तब उम्रक़ैद हुई थी लेकिन 1920 में छूट
गये थे। फिर आप अपने पिछले काम पर ही जुट गये और सन् 1925 के शुरू में
‘दि रेवल्यूशनरी’ परचा एक ही दिन में सारे हिन्दुस्तान में बँटा। उसकी भाषा व
अच्छे विचारों की अंग्रेज़ी अख़बारों ने भी खूब तारीफ़ की थी। आप फ़रवरी में
पकड़े गये। आप पर उस सम्बन्ध में मुक़दमा चलाया गया और आपको दो साल
क़ैद की सज़ा मिली। वहीं से आपको काकोरी के मुक़दमे में घसीट लिया गया।
आप बड़े ज़िन्दादिल हैं। कोर्ट में स्वयं खुश रहना और दूसरों को खुश रखना ही
आपका काम था। आप ने अपना मामला स्वयं लड़ा। जज आपको ही सबका गुरु
कहता है। ‘बन्दी जीवन’ का गुजराती व पंजाबी में अनुवाद हो चुका है।
आप अंग्रेज़ी और बंगाली के उच्च कोटि के लेखक हैं। अब आपको दो
उम्रक़ैद हो गयी है।
आपके साथ आपका छोटा भाई भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी घसीट लिया गया। वह
क़रीब बी.ए. में पढ़ता था। पकड़ा गया और उसे पाँच साल की क़ैद हो गयी।
श्री शचीन्द्र के बाद अत्यन्त प्रसिद्ध वीर श्री रामप्रसाद हैं। आप जैसा सुन्दर,
मज़बूत जवान खोजने से मिलना भी मुश्किल है। बहुत योग्य आदमी है। हिन्दी का
बड़ा लेखक है। आपने ‘कैथराइन’, ‘बोल्शेविकों के काम’, ‘मन की लहर’ आदि
अनेक पुस्तकें लिखीं। आप उर्दू के माने हुए शायर हैं। आपकी उम्र 28 बरस की
108 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
है। पहले 1919 में मैनपुरी षड्यन्त्र में आपके वारण्ट निकले और आपके गुरु श्री
गेंदालाल जी आदि पकड़े गये, लेकिन आप नेपाल की ओर चले गये और वहाँ बड़ी
मुश्किलें सहन कर गुज़ारा करते रहे। पूरा दिन हल चलाना, कुदाल चलाना,
मेहनत-मशक़्कत करना और रात में सिर्फ़ डेढ़ आना पाना, जिससे पेटभर रोटी भी
नहीं खा सकते थे। कई बार तो घास तक खाना पड़ा। लेकिन मज़ा यह, फिर भी
बैठकर कविता लिखना, और भारतमाता की याद और प्रेम में आँसू बहाने और गीत
गाने। ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध-विद्या में बड़े कुशल हैं और
आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर
को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर
जवान, ऐसा योग्य और उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना मुश्किल
है।
तीसरे वीर श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी हैं। 24 वर्ष का अत्यन्त सुन्दर जवान
एम.ए., बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। जज कहता है कि यह
युगान्तर दल का एक मज़बूत स्तम्भ है। आप गाड़ी रोकने वालों में थे। बाहर से
था – कमज़ोर सूखा-सा। कलकत्ते के पास दक्षिणेश्वर बम फ़ैक्टरी में पकड़ा गया,
वहीं दस साल क़ैद हुई। खुशी में मोटा होने लगा। काकोरी के मुक़दमे में तो शरीर
ख़ूब भर गया था और अब फाँसी की सज़ा हो गयी है।
वीर रोशन सिंह को भी फाँसी की सज़ा हुई है। आप पहले पुलिस की मदद
करते थे और बहुत-से डकैत आपने पकड़वाये थे। आप भी फँस गये। लेकिन कोई
डकैत तो नहीं है। जज भी कहता है, यह नौजवान सच्चे देशसेवक थे! अच्छा! इस
वीर को भी बार-बार नमस्कार।
इसके बाद श्री मन्मथनाथ गुप्त की बारी है। आप काशी विद्यापीठ के बी.ए.
के विद्यार्थी थे। 18 बरस की उम्र है। बंगाली, गुजराती, मराठी, उड़िया, हिन्दी,
अंग्रेज़ी और फ़्रेंच आदि अनेक भाषाएँ आपने सीख ली थीं। जज ने आपको भी
डकैतियों में शामिल कर 14 साल की सख़्त सज़ा दी है। आप बड़े निर्भय हैं और
यह सज़ा सुनकर हँस दिये। आजकल जेल में भूख हड़ताल किये बैठे हैं। आपसे
गैर-सरकारी सदस्य ने जेल में आकर पूछा कि खाना क्यों नहीं खाते, तो आपने
उत्तर दिया कि हम मनुष्य हैं। हमारे साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार होना चाहिए। मैं नहीं
समझता कि इस पशुओं जैसे व्यवहार को सहन कर मैं 14 साल तक जी सकूँगा।
तिल-तिल कर मरने से एक बार मर जाना अच्छा है। आप पहले असहयोग में भी
जेल जा चुके हैं।
अब जिस नौजवान का ज़िक्र होगा उसे यदि हम महापुरुष कह दें तो कुछ झूठ
न होगा। वह वीर श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी हैं। आप कोमिल्ला (ढाका) के रहने वाले
हैं। वह बी.ए. में फ़िलासफ़ी के विद्यार्थी थे। प्रोफेसर आप पर बहुत खुश थे और
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 109
कहते थे कि लड़का बड़ा होनहार है। लेकिन आपने कॉलेज तो क्या, पूरी दुनिया
की फ़िलासफ़ी पर लात मार दी और सबकुछ छोड़कर युगान्तर दल में जा मिले।
आपको डिफेंस ऑफ़ इण्डिया एक्ट के अनुसार गिरफ़्तार किया गया और
अकथनीय व असहनीय कष्ट दिये गये। एक दिन आपके सर पर पाखाना डाल
दिया गया और चार दिन तक कोठरी में बन्द रखा गया। मुँह धोने तक के लिए
पानी नहीं दिया गया और बुरी तरह मार-मारकर पूरा बदन ज़ख़्मी कर दिया गया।
लेकिन आपके पास चुप से अधिक क्या रखा था।
1920 में छूटे तो एक मामूली कार्यकर्ता की तरह कांग्रेस में काम करते रहे।
घर से ग़रीब हैं, लेकिन अपना घर तबाह करके भी दुनिया में सेवा होती है। आप
1923 में यू.पी. आये और फिर ‘युगान्तर’ दल की नींव रखी। 1924 में बंगाल लौट
गये और पकड़े गये। पहले आपको आर्डिनेंस के तहत पकड़ा था, फिर यहाँ काकोरी
लाया गया। आपको दस बरस क़ैद हुई है। बेहद ख़ूबसूरत नौजवान हैं। जज ने
आपकी बड़ी तारीफ़ की है।
श्री गोविन्द चरणकार उर्फ़ डी.एन. चौधरी लखनऊ से पकड़े गये थे। आप
बहुत पुराने क्रान्तिकारी हैं। 1918 या 1919 में ढाका में पुलिस आपको पकड़ने
आयी। आपने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया और गोलियों में से लड़ते-लड़ाते
भाग निकले, लेकिन गोलियाँ ख़त्म हो चुकी थीं और आप घायल हो गये थे। पकड़े
गये, कालापानी मिला। 1922 में बहुत बीमार हो गये थे, तब छोड़े गये। 1925 में
फिर पकड़े गये और अब 10 साल क़ैद हो गयी है।
अब श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य सम्बन्धी कुछ लिखेंगे। आप भी बनारस के
रहने वाले थे। बनारस षड्यन्त्र के समय आपकी उम्र 16 बरस की थी, पकड़े
गये। लेकिन कुछ प्रमाणित न होने से छूट गये और फिर नज़रबन्द कर
बुन्देलखण्ड में रखे गये। आप हिन्दी के बड़े प्रसिद्ध लेखक हैं। कानपुर के
‘प्रताप’ जैसे प्रसिद्ध अख़बार के सहायक सम्पादक थे। आप बनारस से पकड़े
गये और अब आपको सात साल क़ैद हुई है। आप बहुत सुन्दर गाते हैं। जेल में
आप योगाभ्यास करते थे।
श्री राजकुमार कानपुर के रहने वाले हैं। आप बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में
बी.ए. में पढ़ते थे। पकड़े गये। आपके कमरे से दो रायफ़लें निकलीं। बहुत सुन्दर
गाने वाले और देखने में भी आप काफ़ी सुन्दर हैं। जोशीले बहुत हैं। श्री दामोदर
स्वरूप जब बहुत बीमार होने पर भी कोर्ट में बुलाये गये तो आपको जोश आ गया
और आपने जज को ख़ूब सुनायी। जज ने कहा कि फ़ैसले के समय तुम्हें इसका
मज़ा चखाया जायेगा। वीर युवक को दस साल की सज़ा हो गयी! जीवन एक तरह
से तबाह हो गया, लेकिन आप हँस दिये। धन्य हैं ये वीर और इन्हें जन्म देने वाली
वीर माताएँ।
110 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
श्री विष्णु शरण दुबलिस मेरठ के रहने वाले हैं। वैश्य अनाथालय के अधीक्षक
थे। बी.ए. में असहयोग कर दिया गया था और मेरठ को उन्होंने दूसरा बारदोली बना
दिया था। सिविल नाफ़रमानी के लिए तैयार हो गये थे। बड़े सुन्दर वक्ता थे। आपके
घर युगान्तरकारियों की बैठक हुई थी। आपको सात साल की सज़ा हो गयी है।
श्री रामदुलारे को भी 7 साल की सज़ा हुई है। आप कानपुर निवासी थे।
स्काउट मास्टर, कांग्रेस के जोशीले सेवक थे।
6 अप्रैल को फ़ैसला सुनाया गया, उस दिन सभी वीर गाते आये थे –
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है!
सज़ाएँ लापरवाही से सुनीं और हँस दिये। उसके बाद दुख की घड़ी आ गयी।
जिन वीरों ने एक साथ समुद्र में किश्तियाँ डाली थीं, उनके ही अलग होने का
पल आ गया। “क्रान्तिकारी लोगों में जो अगाध और गम्भीर प्रेम होता है, उसे
साधारण दुनियादार आदमी अनुभव नहीं कर सकते,” श्री रासबिहारी के इस वाक्य
का अर्थ भी हम लोग नहीं समझ सकते। जिन लोगों ने ‘सिर रख तली प्रेम की
गली' में पैर रख दिया हो, उनकी महिमा को हमारे जैसे निकृष्ट आदमी क्या समझ
सकते हैं? उनका परस्पर प्रेम कितना गहन होता है, उसे हम सपने में भी नहीं जान
सकते। डेढ़ साल से अपने जीवन के अन्धकारमय भविष्य के इन्तज़ार में मिलकर
बैठे थे। वह पल आया, तीन को फाँसी, एक को उम्रक़ैद, एक को 14 बरस क़ैद,
4 को दस बरस क़ैद व बाक़ियों को 5 से 10 साल की सख़्त क़ैद सुनाकर जज
उन्हें उपदेश देने लगा, “आप सच्चे सेवक और त्यागी हो। लेकिन ग़लत रास्ते पर
चले हो।” ग़रीब भारत में ही सच्चे देशभक्तों का यह हाल होता है। जज उन्हें अपने
कामों पर पुनर्विचार करने की बात कह चलता बना और फिर...फिर क्या हुआ?
क्या पूछते हैं? जुदाई के पल बड़े बुरे होते हैं। जिन्हें फाँसी की सज़ा मिल गयी,
जिन्हें उम्रभर के लिए जेल में बन्द कर दिया गया, उनके दिलों का हाल हम नहीं
समझ सकते। क़दम-क़दम पर रोने वाले हिन्दुस्तानी, यों ही थर-थर काँपने लग
जाने वाले कायर हिन्दुस्तानी, उन्हें क्या समझ सकते हैं? छोटों ने बड़ों के पैरों पर
झुककर नमस्कार किया। उन्होंने छोटों को आशीर्वाद दिया, ज़ोर से गले मिले और
आह भरकर रह गये। भेज दिये गये। जाते हुए श्री रामप्रसाद जी ने बड़े दर्दनाक
लहजे में कहा –
दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं।
यह कहकर वह लम्बी, बड़ी दूर की यात्रा पर चले गये। दरवाज़े से निकलते
समय उस अदालत के बड़े भारी रैंकन थियेटर हाल की भयावह चुप्पी की एक
आह भरकर तोड़ते हुए उन्होंने फिर कहा –
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 111
हाय, हम जिस पर भी तैयार थे मर जाने को।
जीते जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।
हम लोग एक आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया। हमें
आग नहीं लग उठती, हम तड़प नहीं उठते, हम इतना मुर्दे हो गये हैं। आज वे
भूख-हड़ताल कर बैठे हैं और तड़प रहे हैं और हम चुपचाप सब तमाशा देख रहे
हैं। ईश्वर उन्हें बल व शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों
के बलिदान रंग लायें।
लेखक
'विद्रोही'
112 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के शहीदों की
फाँसी के हालात
जनवरी, 1928 के ‘किरती’ में भगतसिंह ने एक और लेख काकोरी के शहीदों
के बारे में ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा। – स.
‘किरती’ के पाठकों को पहले किसी अंक में हम काकोरी के मुक़दमे के हालात
बता चुके हैं। अब इन चार वीरों को फाँसी दिये जाने का हाल बताते हैं।
17 दिसम्बर, 1927 को श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी को गोण्डा जेल में फाँसी दी
गयी और 19 दिसम्बर, 1927 को श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर जेल में,
श्री अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद जेल में और श्री रोशन सिंह जी को इलाहाबाद
जेल में फाँसी चढ़ा दिया गया।
इस मुक़दमे के सेशन जज मि. हेमिल्टन ने फैसला देते हुए कहा था कि
ये नौजवान देशभक्त हैं और इन्होंने अपने किसी लाभ के लिए कुछ भी नहीं
किया और यदि ये नौजवान अपने किये पर पश्चाताप करें तो उनकी सज़ाओं में
रियायत की जा सकती है। उन चारों वीरों द्वारा इस आशय की घोषणा भी हुई,
लेकिन उन्हें फाँसी दिये बग़ैर डायन नौकरशाही को चैन कैसे पड़ता। अपील में
बहुत-से लोगों की सज़ाएँ बढ़ा दी गयीं। फिर न तो गवर्नर और न ही वायसराय
ने उनकी जवानी की ओर ध्यान दिया और प्रिवी कौंसिल ने उनकी अपील सुनने
से पहले ही ख़ारिज कर दी। यू.पी. कौंसिल के बहुत-से सदस्यों, असेम्बली और
कौंसिल और स्टेट के बहुत-से सदस्यों ने वायसराय को उनकी जवानी पर दया
करने की दरख़्वास्त दी, लेकिन होना क्या था? उनके इतने हाथ-पाँव मारने का
कोई परिणाम न निकला। यू.पी. कौंसिल के स्वराज पार्टी के नेता श्री गोविन्द
वल्लभ पन्त उनके मामले पर बहस के लिए अपना मत वायसराय और लाट
साहिब को भेजने के लिए शोर मचा रहे थे। पहले तो प्रेजिडेण्ट साहिब ही
अनुमति नहीं दे रहे थे, लेकिन बहुत-से सदस्यों ने मिलकर कहा तो सोमवार
को बहस के लिए इजाज़त मिली, लेकिन फिर छोटे अंग्रेज़ अध्यक्ष ने, जो उस
समय अध्यक्ष का काम कर रहा था, सोमवार को कौंसिल की छुट्टी ही कर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 113