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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 788 में से

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पृष्ठ 108

नगर में वही धूम थी। आने-जाने वालों पर उसी प्रकार रंग डाला जा रहा था।
कैसी भीषण उपेक्षा थी! यदि वे पथभ्रष्ट थे तो होने दो, उन्मत्त थे तो होने दो। वे
निर्भीक देशभक्त तो थे। उन्होंने जो कुछ किया था, इस अभागे देश के ही लिए
तो किया था। वे अन्याय न सहन कर सके, देश की पतित अवस्था को न देख
सके, निर्बलों पर ढाये जाने वाले अत्याचार उनके लिए असह्य हो उठे, आम जनता
का शोषण वह बरदाश्त न कर सके, उन्होंने ललकारा और वे कूद पड़े कर्मक्षेत्र
में। वे सजीव थे, वे सदृश थे। कर्मक्षेत्र की भीषणते! धन्य है तू!! मृत्यु के पश्चात
मित्र-शत्रु सब समान हो जाते हैं, यह आदर्श पुरुषों का। अगर उन्होंने कोई घृणित
कार्य किया भी हो, तो स्वदेश के चरणों में जिस साहस और तत्परता से उन्होंने
अपने प्राण चढ़ा दिये, उसे देखते हुए तो उनकी पूजा की जानी चाहिए। श्री टेगार्ड
महोदय विपक्षी दल के होने पर भी जतीन मुकर्जी, बंगाल के वीर क्रान्तिकारी, की
मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए उनकी वीरता, देशप्रेम और कर्मशीलता की मुक्त
कण्ठ से प्रशंसा कर सकते हैं, परन्तु हम, कायर नरपशु, एक क्षण के लिए भी
आनन्द-विलास छोड़ वीरों की मृत्यु पर आह तक भरने का साहस नहीं करते।
कितनी निराशाजनक बात है! उन ग़रीबों का जो अपराध नौकरशाही की दृष्टि में
था, उसका उन्होंने पर्याप्त दण्ड, क्रूर नौकरशाही की भी दृष्टि में पा लिया। इस
भीषण दुखान्त नाटक का एक और पर्व समाप्त हो गया। अभी यवनिका-पतन नहीं
हुआ है। नाटक अभी कुछ दिन और भीषण दृश्य दिखायेगा। कथा लम्बी है, सुनने
के लिए ज़रा दूर तक पीछे मुड़ना होगा।
असहयोग आन्दोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब
में सिक्ख भी उठे, बड़ी गहरी नींद से उठे और उठे खूब ज़ोरों के साथ। अकाली
आन्दोलन शुरू हुआ। बलिदानों की लड़ी लग गयी। मास्टर मोता सिंह, खालसा
मिडिल स्कूल, माहलपुर, ज़िला होशियारपुर, के भूतपूर्व मास्टर महोदय ने एक
व्याख्यान दिया। उनका वारण्ट निकला। परन्तु सम्राट का आतिथ्य उन्हें स्वीकार न
था। यों ही जेलों में चले जाने के वे विरोधी थे। उनके व्याख्यान फिर भी होते रहे।
कोट फतूही नामक ग्राम में भारी दीवान हुआ, पुलिस ने चारों ओर से घेरा डाला,
फिर भी मास्टर मोता सिंह ने व्याख्यान दिया। अन्त में प्रधान की आज्ञा से सभी
दर्शक उठ गये। मास्टर जी न जाने किधर पहुँचे। बहुत दिनों तक इसी तरह यह
आँखमिचौनी का खेल होता रहा। सरकार बौखला उठी। अन्त में एक हमजोली ने
धोखा दिया और डेढ़ वर्ष बाद एक दिन मास्टर साहब पकड़ लिये गये। यह पहला
दृश्य था उस भयानक नाटक का।
गुरु का बाग़ आन्दोलन शुरू हुआ। निहत्थे वीरों पर जिस समय भाड़े के टट्टू
टूट पड़ते, उन्हें मार-मारकर अधमरा-सा कर देते, देखने-सुनने वालों में से कौन
होगा जो द्रवित न हो उठा हो! चारों ओर गिरफ़्तारियों की धूम थी। सरदार किशन
102 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़