भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोली के दिन रक्त के छींटे
घर से भागकर भगतसिंह कानपुर चले गये। वहाँ वे गणेशशंकर विद्यार्थी के
साप्ताहिक ‘प्रताप’ के सम्पादकीय विभाग में काम करने लगे। कानपुर में ही
क्रान्तिकारी पार्टी से उनके गहरे सम्बन्ध बने। शिव वर्मा, जयदेव कपूर, बटुकेश्वर
दत्त, विजयकुमार सिन्हा व क्रान्तिकारी पार्टी के अन्य साथियों के साथ राजनीतिक
बहसें और अध्ययन चलता रहा।
पंजाब में बब्बर अकाली आन्दोलन चल रहा था। उस आन्दोलन के छह
कार्यकर्ताओं की फाँसी पर ‘एक पंजाबी युवक’ के नाम से 15 मार्च, 1926 के
‘प्रताप’ में यह लेख हिन्दी में छपा था। उस आन्दोलन की जानकारी तो लेख से मिलती
ही है, साढ़े अठारह वर्षीय भगतसिंह की मानसिक परिपक्वता भी इस लेख से
झलकती है। – स.
होली के दिन – 27 फ़रवरी, 1926 के दिन, जब हम लोग खेल-कूद में व्यस्त
हो रहे थे, उसी समय इस विशाल प्रदेश के एक कोने में एक भीषण काण्ड किया
जा रहा था। सुनोगे तो सिहर उठोगे! काँप उठोगे!! लाहौर सेण्ट्रल जेल में ठीक उसी
दिन छह बब्बर अकाली वीर फाँसी पर लटका दिये गये। श्री किशन सिंह जी
गड़गज्ज, श्री सन्त सिंह जी, श्री दिलीप सिंह जी, श्री नन्द सिंह जी, श्री करम सिंह
जी व श्री धरम सिंह जी लगभग दो वर्ष से अपने इसी अभियोग में जो उपेक्षा, जो
लापरवाही दिखा रहे थे, उसी से जाना जा सकता था कि वे इस दिन की प्रतीक्षा
कितने चाव से करते थे। महीनों बाद जज महोदय ने फ़ैसला सुनाया। पाँच को
फाँसी, बहुतों को कालापानी अथवा देश-निकाला और लम्बी-लम्बी कैदें।
अभियुक्त वीर गरज उठे। उन्होंने आकाश को अपने जयघोषों से गुंजायमान कर
दिया। अपील हुई। पाँच की जगह छह मृत्युदण्ड के भागी बने। उस दिन समाचार
पढ़ा कि दया के लिए अपील भेजी गयी है, पंजाब सचिव ने घोषणा की कि अभी
फाँसी नहीं दी जायेगी।
प्रतीक्षा थी, परन्तु एकाएक क्या देखते हैं कि होली के दिन शोकग्रस्त लोगों
का एक छोटा समूह उन वीरों के मृत शवों को शमशान में लिये जा रहा है। चुपचाप
उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया समाप्त हो गयी।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 101