आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पुनः एकबार उदयनाचार्य भगवान् जगन्नाथका दर्शन करनेकी
इच्छासे पुरी गये । वहाँपर मार्कण्डेय हृद आदि तीर्थजलसे स्नानकर
मन्दिरके द्वारपर आ गये । भगवान्के दर्शनहेतु जब मन्दिरके भीतर
प्रवेश करना चाहे तो अपने आप कपाट बन्द हो गया । यह देखकर
उदयनाचार्य दूसरे द्वारपर गये, वहाँ भी वैसा ही हुआ । तीसरे द्वारपर
जानेपर भी वैसा ही हुआ । तब आचार्य चतुर्थ द्वारपर जाकर मन्दिर मे
जानेको तत्पर हुए । किन्तु उस कपाटको भी बन्द देखे ।
इस कौतुकको देखकर वे सभी जन खड़े रहे । किन्तु उदयनाचार्य
जी मुस्कुराते हुए बोले—
जगन्नाथ ! सुरश्रेष्ठ !
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्तसे ।
उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थिति ॥ ६८-६९ ॥
( भवि० पु० परिशिष्ट अ० ३० )
इतना कहते ही तुरन्त सभी बन्द कपाट खुल गये । जगन्नाथके सभी
पुजारी चकित हो गये तथा आदरपूर्वक उदयनाचार्यको ले जाकर
मन्दिरमें भगवान् जगन्नाथका दर्शन कराये । उदयनाचार्यने भगवानका
दर्शन, पूजन और स्तुति करते हुए वहाँ कई रात निवास किया । तथा
भगवान्ने स्वप्नमे पूजारियोंसे कहा कि मेरा उत्कृष्ट पीताम्बर उदयनाचार्य
को दो, वह मेरा अत्यन्त प्रिय है और मेरा ही अश है, इसमे सन्देह
नहीं है । बौद्धसिद्धान्तवादियोंद्वारा तिरस्कृत होनेपर इसने ही मुझे
कायम रखा है । तब प्रात उठ कर पुजारीजन जगन्नाथकी आज्ञासे
उनका पीताम्बर लाकर आचार्यको दे दिये । आचार्यने उस प्रसादको
शिरोधार्य कर लिया । और प्रसाद प्राप्त कर मिथिलामे आ गये ।
और वहाँ सर्वशास्त्रोंको पढाने लगे । बहुत समयके बाद वृद्ध हो
काशी आकर कुछ दिन रहकर उन्होंने मणिकर्णिकामे मङ्गानालमें लीला-
पूर्वक प्राणत्याग कर दिया । इस प्रकार उदयनाचार्य धर्मकी स्थापना
तथा नास्तिक्यकी निवृत्तिके लिये पृथिवीपर अवतरित हुए थे ।
( भवि० पु० परिशिष्ट अध्याय ३० )
प्रस्तुत पुस्तक आत्मतत्त्वविवेकका अनुवाद करने एव इसके प्रका-
शनकी प्रवृत्ति मेरे अन्दर तभी हुई थी, जब मैं मारवाड़के सिरोही
प्रस्तुत ग्रन्थ आत्मतत्त्वविवेकमे आत्मतत्त्वका विशद विवेचन
किया गया है। क्योंकि आस्तिक नास्तिक सभी अध्यात्मवादियोंको
इस बातमे समान मान्यता है कि सर्वानुभवसिद्ध दुःखके नाशका एक-
मात्र उपाय तत्त्वज्ञान ही है। और वह ज्ञेय तत्त्व आत्मा ही है। भले
ही वह ज्ञेय आत्मा निरात्मवादियोंके लिये निषेध्यरूपमे ज्ञेय हो या
आत्मवादियोंके लिये विधिरूपमे ज्ञेय हो । अर्थात् वह आत्मा क्या
है ? जिसका नैरात्म्यवादी निषेध करते हैं और आत्मवादी अस्तित्व
प्रतिपादित करते हैं। इस प्रकार उभयदृष्टिसे उस आत्मतत्त्वका विवेचन
करना आवश्यक होनेसे इस ग्रन्थमें उसका विवेचन किया गया है।
इसीलिये इसका नाम आत्मतत्त्वविवेक रखा गया है। इसका अन्य
नाम बौद्धाधिकार या बौद्धधिकार भी है। यद्यपि उदयनाचार्यके सभी
ग्रन्थ बौद्धोंकी आलोचना करते हैं, किन्तु उन सबोंमे आत्मतत्त्वविवेक
बौद्धमत खण्डनमें अकेला तत्पर है।
यह ग्रन्थ चार अधिकरणोंमें पूर्ण होता है—क्षणभङ्गवाद, बाह्यार्थ
भङ्गवाद, गुणगुणिभेदभङ्गवाद एव अनुपलम्भवादके रूपमे । उक्त
चारो वाद बौद्धोंके हैं, जिनका श्रीमदुदयनाचार्यने प्रबल प्रतिवाद
प्रस्तुत किया है। सिद्धान्तकी दृष्टिसे इन चारो अधिकरणों को क्षण
भङ्गभङ्ग बाह्यार्थभङ्गभङ्ग गुणगुणिभेदभङ्गभङ्ग और अनुपलम्भभङ्ग
प्रकरण नामसे भी कहा जाता है।
क्षणभङ्गवाद—
इस प्रकरणमें क्षणिकवाद का खण्डन किया गया है, जिससे नित्य
आत्मा स्वतः सिद्ध हो जाता है। बौद्धमतके अनुसार जब सभी पदार्थ
क्षणिक हैं, तो आस्तिकोंका नित्य आत्मा कैसे सिद्ध हो सकता है। उनका
यह अनुमान है कि—"यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर, सन्तश्च भावा
अमी। इत्यादि। अर्थात् जो सत् है, वह क्षणिक है, जैसे मेघ और
घटादि। विवादका विषय शब्दादि भी सत् हैं, इस लिये वे सभी क्षणिक
हैं। इस अनुमानप्रमाण से जब सभी पदार्थ क्षणिक सिद्ध हैं तब
नित्य आत्माके अस्तित्वका प्रश्न ही कहाँ है। यह बौद्धका पूर्वपक्ष है।
यहाँ सिद्धान्तीका कहना है कि "जो सत् है वह क्षणिक है" यह
व्याप्ति ही असिद्ध है। यदि कहा जाय कि क्षेत्रस्थ बीज अङ्कुर जननमें
( २० )
स्टेटमे एक जैनमुनिको न्याय पढ़ानेके लिए उनके आग्रहपर कुछ
समयके लिये वहाँ गया था। वहाँ अनेक न्यायग्रन्थोंके अध्यापनके
साथ साथ आत्मतत्त्वविवेकके भी अध्यापनका सुअवसर प्राप्त हुआ।
अनुवादकार्यकी पूर्णता मैंने गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज, भागलपुर (बिहार)
में अपने कार्यकालमें कर ली थी। किन्तु प्रकाशनकी चेष्टा काशी-हिन्दू
विश्वविद्यालयमें आनेके बाद ही की।
अनुवादकी पाण्डुलिपि मैंने वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालयमे
अनुसन्धान विभागके तत्कालीन डाइरेक्टर श्रीक्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय
को दिखलाई। इस कार्यसे बहुत प्रसन्न हो उन्होंने सुझाव दिया कि
आत्मतत्त्वविवेकमें आये पूर्वपक्षोंके मूलवचनोंका ससन्दर्भ उल्लेख
टिप्पणीमें या स्वतन्त्ररूपमें कर देना महत्त्वपूर्ण होगा। उनके निर्देश-
नुसार मैंने उसे भी यथाप्राप्त बौद्धग्रन्थोंका आलोडन कर परिशिष्टके रूप-
मे सन्निविष्ट कर दिया। बादमें इस पाण्डुलिपिको मैंने सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालयके प्रकाशनविभागको प्रकाशनकी स्वीकृतिहेतु दे
दिया। पाण्डुलिपि लगभग दो वर्ष रखी रह गई और प्रकाशनके लिए
पहलेसे स्वीकृत पुस्तकोंकी लम्बी परम्परामें इसके शीघ्र प्रकाशनकी आशा
न देखकर मैंने अपनी पाण्डुलिपि वहाँसे वापस ले ली। अन्तत उत्तर-
प्रदेश संस्कृत अकादमी, लखनऊकी आर्थिक सहायता पाकर मैंने स्वयं
प्रकाशनका निर्णय कर लिया। प्रकाशनके पूर्व विद्वानोंके प्राप्त सुझावके
अनुसार इसकी भाषाको भी यथासम्भव परिमार्जित किया। फलतः
बहुत कालके अन्तरालमे भी इसका प्रकाशनकार्य सम्पन्न हो सका यह
भगवान् विश्वनाथकी कृपा ही थी।
विषयकी दृष्टिसे गम्भीर एव भाषाकी दृष्टिसे दुरूह इस महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थका अनुवादकार्य मैंने अध्यापनके साथ साथ लगभग दो वर्षों में पूर्ण
किया था। उस समय मेरे पास महामहोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़
द्वारा सम्पादित एशियाटिक सोसाइटी, बङ्गालसे प्रकाशित हुई शङ्कर-
मिश्र, रघुनाथशिरोमणि एव भगीरथठक्कुरकी टीकाओंसहित आत्मतत्त्व
विवेक पुस्तक प्राप्त थी। उसमे शङ्करमिश्रकी कल्पलता, भगीरथठक्कुरकी
प्रकाशिका एव रघुनाथशिरोमणिकी दीधिति टीकायें सन्निविष्ट थी।
मथुरानाथ तर्कवागीशकी भी 'रहस्य' नामक टीका प्रारम्भकी कुछ
पंक्तियों तक ही होकर रह गयी मिली, यह आश्चर्य है। प्रकाशिका एव
( २१ )
दीधिति टीकायें ग्रन्थके अन्ततक हैं, किन्तु बीच-बीचमें कही नहीं भी
हैं। किन्तु शङ्करमिश्रकी कल्पलता टीका साद्यन्त अविकल है।
अनुवाद करते समय मैंने उक्त सभी टीकाओंका सहारा लिया है।
किन्तु जहाँपर व्याख्याओमे भेद प्रतीत हुआ है, वहाँ मूलके अत्यन्त
निकट और अक्लिष्ट व्याख्याका ही अनुगमन किया है। ग्रन्थके
अस्फुट विषयको स्फुट करनेकी मेरी यथाशक्ति चेष्टा रही है। उसमें
भी मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसे विद्वज्जन ही बता सकते हैं। मेरा
प्रयास विषयके विवेकके साथ पंक्त्यर्थ का विवेक करनेका भी रहा है।
ताकि ऐसा न हो कि विषयका ज्ञान हो जानेपर भी किसी पंक्तिका
अर्थ अज्ञात रह जाय या एक भी पद का अर्थ छूट जाय। इसी मानीमें
यह अनुवाद विवेचनात्मक है तथा मूल और अनुवादमें बिम्बप्रतिबिम्ब-
भाव जैसा है।
इस संस्करणमें दी गयी टिप्पणियां, जैसे "१ पु० पा०, २ पु० पा०,
३ पु० पा०" एशियाटिकसोसाइटी कलकत्ताद्वारा प्रकाशित आत्मतत्त्व-
विवेकके अनुसार ही मैंने भी दी हैं। कलकत्तावाला संस्करण महा-
महोपाध्याय लक्ष्मणशास्त्री द्राविड़ एव विन्ध्येश्वरीप्रसादद्विवेदीद्वारा
सम्पादित होनेसे प्रामाणिक है।
यहाँ टिप्पणीमें अङ्कित १ पु० से जयनारायणतर्कपञ्चानन एवं
मदनमोहन शर्मन्द्वारा सम्पादित ( कलकत्ता १८४७ ) आत्मतत्त्व-
विवेक लिया गया है। तथा २ पु० जीवानन्द विद्यासागर, कलकत्ता
सम्पादित ( १८७३ ) आत्मतत्त्वविवेक लिया गया है। तथा टिप्पणीमें
अङ्कित ३ पु० पा० से यदुनाथसार्वभौमकी पुस्तकका पाठ लिया गया
है। यह बात रायल एशियाटिक-सोसाइटी, बङ्गालके तत्कालीन जेनरल
सेक्रेटरी जोह्न-वान-मेननद्वारा लिखित भूमिकासे विदित है। इन
तीन संकेतोंके अतिरिक्त सभी टिप्पणियाँ स्वयं मेरी दी हुई हैं।
प्रस्तुत पुस्तकके शुद्ध सम्पादनका भी प्रयास मैंने किया है। मूल-
ग्रन्थके अनुच्छेदोंका निर्धारण प्रायः मैंने अपने ढङ्गसे किया है, ताकि
पाठकोंको विषयबोधमें सुविधा हो। अत्यन्त सावधानीसे इस संस्करण
को शुद्ध बनानेका प्रयास करनेपर भी मानवसुलभ मेरी अनवधानतासे
या मुद्रणके दोषसे यदि त्रुटियाँ रह गई हों तो सहृदय विद्वज्जन कृपया
स्वयं शुद्ध कर लेंगे, यह मेरी विनम्र प्रार्थना है।
दीधिति टीकायें ग्रन्थके अन्ततक हैं, किन्तु बीच बीचमें कहीं नहीं भी
हैं । किन्तु शङ्करमिश्रकी कल्पलता टीका सायन्त अविकल है ।
अनुवाद करते समय मैने उक्त सभी टीकाओका सहारा लिया है ।
किन्तु जहाँपर व्याख्याओंमे भेद प्रतीत हुआ है, वहाँ मूलके अत्यन्त
निकट और अक्लिष्ट व्याख्याका ही अनुगमन किया है । ग्रन्थके
अस्फुट विषयको स्फुट करनेकी मेरी यथाशक्ति चेष्टा रही है । उसमे
भी मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, इसे विद्वज्जन ही बता सकते हैं । मेरा
प्रयास विषयके विवेकके साथ पक्त्यर्थ का विवेक करनेका भी रहा है ।
ताकि ऐसा न हा कि विषयका ज्ञान हो जानेपर भी किसी पक्तिका
अर्थ अज्ञात रह जाय या एक भी पद का अर्थ छूट जाय । इसी मानिये
यह अनुवाद विवेचनात्मक है तथा मूल और अनुवादमे बिम्बप्रतिबिम्ब
भाव जैसा है ।
इस सस्करणमे दी गयी टिप्पणियों, जैसे "१ पु० पा०, २ पु० पा०,
३ पु० पा०' एशियाटिकसोसाइटी कलकत्ताद्वारा प्रकाशित आत्मतत्त्व
विवेकके अनुसार ही मैने भी दी हैं । कलक
( २४ )
कहनेका क्या अभिप्राय है ? क्या विनाश प्रतियोगीरूप है ? या
अलीक है ? या प्रतियोगीका कार्य है ? अथवा प्रतियोगीका व्यापक है ?
अर्थात् विनाशके ध्रुवभावी होनेके उपर्युक्त कारण हो सकते हैं । किन्तु
उनमें कोई भी यहाँ नहीं हो सकता है । प्रथम इसलिये नहीं हो सकता
कि निषेध्य एव उसका निषेध दोनोंका एकत्व अनुपपन्न है । क्योंकि—
विधिरात्माऽस्य भावस्य निषेधस्तु ततः परः ।
सोऽपि चात्मेति कः प्रेक्षः शृण्वन्नपि न लज्जते ॥
निषेध अलीक रूप है, यह द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि विनाश यदि तुच्छ है तो उसके अहेतुकत्वमे क्या आया ?
ऐसी स्थितिमे घटका विनाश क्वचित्क या कादाचित्क न होकर सर्वत्र
एव सदा होने लगेगा ।
प्रतियोगीका कार्य भी विनाश नहीं हो सकता है । क्योंकि वैसा
माननेपर विरोधमे असिद्धिदोष हो जायगा । विनाश प्रतियोगीका
व्यापक है, इसलिये वह ध्रुवभावी है, यह चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं
है । क्योंकि प्रतियोगी और उसके विनाशका भिन्न भिन्न समय होनेसे
व्यापकत्व असम्भव है ।
यदि पूछो कि भाव यदि क्षणिक नहीं है तो स्थिर भी कैसे है ?
तो यही उत्तर होगा कि 'स एवायम्' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होनेसे भाववस्तु
स्थिर है ।
इसके अतिरिक्त क्षणिकत्व अनुपपन्न भी है । क्योंकि सभी भावोंको
क्षणिक माननेपर अनेक देश कालमे अनुगत गवादि व्यवहार नहीं बन
सकेगा । यदि कहा जाय कि—अनुगत व्यवहारका कारण भावरूप
गोत्वादि नहीं है किन्तु अभावरूप अगोपोह ( अगोव्यावृत्ति ) आदि ही
है । अतः सभी भाव वस्तु क्षणिक है, इसमें कोई बाधा नहीं है—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योकि अपोहवाद अनुभवविरुद्ध होनेसे
अप्रामाणिक है ।
बाह्यार्थभङ्गवाद—
इस प्रकरणमें विज्ञानवादका खण्डन कर बाह्यार्थकी सिद्धि की
गयी है, जिससे विज्ञानातिरिक्त आत्माकी सिद्धि हो जाती है । बौद्ध
के मतमें आन्तर क्षणिकविज्ञान वास्तविक है, उससे अतिरिक्त सभी
( २५ )
बाह्यपदार्थ असत् हैं । उसीके अन्तर्गत नैयायिकोंका नित्य आत्मा भी
है और वह असत् है ।
यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या ग्राह्यतत्त्व बाह्यार्थ एवं ग्राहकतत्त्व
आन्तरविज्ञान ये दोनों ही परमार्थतः सत् हैं और इनका अभेद
विवक्षित है ? अथवा ये दोनोंमें भेद होनेपर भी दोनों एक जातिके हैं ?
अर्थात् बाह्यार्थ भी ज्ञानजातिका ही है ? अथवा ज्ञान परमार्थसत् है
और बाह्यार्थ अलीक है अर्थात् असत् है ?
इनमें प्रथम अभेदपक्षमें सहोपलम्भ, ग्राह्यत्व या प्रकाशमानत्व जो
भी हेतु दिया जायगा, वह सभी हेतु आभास होगा । क्योंकि परामर्श-
हेतु-पक्ष-साध्य और अनुमिति सभी परस्पर अभिन्न हैं तो इनमे हेतु-
हेतुमद्भाव कैसे होगा ? साथ ही नील-पीत आदि परस्पर-विरुद्ध
धर्मोंका एक विज्ञानके साथ अभेद कैसे होगा ? ग्राह्यत्व या प्रकाश-
मानत्व भी भेदमें ही बन सकेगा, अभेद में नहीं ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थका विज्ञानके साथ न भेद है और न
अभेद है, किन्तु उभयसे रहित चित्ररूप है, तो यह भी नहीं हो सकता
है । क्योंकि परस्पर-विरुद्ध भेद और अभेद जैसे एक जगह नहीं रहता
है, वैसे दोनोंका निषेध भी एक जगह नहीं रह सकता है ।
एवं बाह्यार्थको ज्ञानसजातीय भी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि
ज्ञानसजातीय होनेपर उसमें ग्राह्यत्व नहीं रह सकता है । साथ ही
घटपटादि सभीके ज्ञानसजातीय होनेसे घटज्ञानमें पटविषयकत्वका
प्रसङ्ग हो जायगा ।
यदि कहा जाय कि बाह्यार्थ न ज्ञानसे अभिन्न है और न ज्ञान-
सजातीय है, किन्तु सर्वथा अलीक है । क्योंकि उसमें ग्राह्यलक्षणका
सर्वथा अभाव है । जैसे शशशृङ्ग सर्वथा ग्राह्यलक्षणसे रहित होनेके
कारण अलीक होता है, वैसे सभी बाह्यार्थोंको समझना चाहिये । किन्तु
यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि किसी वस्तुके लक्षणका ज्ञान
न होनेसे उस वस्तुकी सत्ता नहीं समाप्त हो सकती है । कारण, लक्षण
का अपरिज्ञान वस्तुकी दुरूहताके कारण भी हो सकता है ।
यदि माध्यमिकमतका अवलम्बन कर बाह्यार्थके समान विज्ञान भी
नहीं है, और सर्वशून्यता ही परमतत्त्व है, ऐसा कहा जाय तो यह भी
सभव नहीं है। क्योंकि शून्यतामे यदि कोई प्रमाण है, तो सर्वशून्यता
कहाँ हुई ? यदि शून्यतामे प्रमाण नहीं है तो सर्वसत्ता ही सिद्ध हो
गयी।
एवं, लोकव्यवहारमें बाह्यार्थकी सत्ता व्यवस्थित होनेपर भी विश्वमें
अलीकत्व शून्यत्व या विचारासहत्वका सिद्ध करनेका उपक्रम किया जाय
तो बौद्धकी अपनी प्रतिज्ञा भी अनवस्थित हो जायगी। अर्थात् बौद्धका
विज्ञान, उसका दर्शन और उसका सिद्धान्त भी अव्यवस्थित हो जायगा।
इसलिये यह विश्व तथ्य है।
गुणगुणिभेदभङ्गवाद—
बौद्धमतानुसार गुण और गुणीमे भेद नहीं होता है। ज्ञानगुण
है। अत ज्ञानगुण और गुणी आत्मामे भेद नहीं है। अर्थात् ज्ञान
से भिन्न गुणी आत्मा नहीं है। यही उनका नैरात्म्यपक्ष है।
किंतु यह पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि गुणसे गुणी भिन्न
होता है। कारण, "यमहमद्राक्षं तमहं स्पृशामि अथवा यमस्प्राक्षं त
पश्यामि" इस प्रतीतिमें दर्शन और स्पर्शनके द्वारा एक ही विषयका
ग्रहण होता है। यहाँ गुण दो हैं—दर्शन और स्पर्शन। और ये
दोनों ही परस्परमे भिन्न हैं। जैसे चैत्रके द्वारा गृहीत विषयका
प्रतिसंधान मैत्र नहीं कर पाता और मैत्रद्वारा दृष्ट विषयका प्रति
संधान चैत्रको नहीं होता है वैसे ही नेत्र द्वारा देखो गया वस्तुका
प्रतिसन्धान त्वगिन्द्रिय नहीं कर सकती है और त्वगिन्द्रियद्वारा छुए
गये पदार्थका प्रतिस धान आखका नहीं हो सकता है। त्रिन्तु उक्त
प्रतीतिमे प्रतिसन्धान होता है कि जिसे मैने देखा था, उसे ही छू
रहा हूँ या जिसका स्पर्श किया था उसे ही देख रहा हूँ। यहाँ दो
प्रकारके भिन्न भिन्न ज्ञानोंमें एक ही विषयका प्रतिस धान होता है।
इससे सिद्ध है कि उक्त दोनों ज्ञानोंसे अतिरिक्त गुणी आत्मा है,
जो "दोनों भिन्न भिन्न ज्ञानोंमें एक ही विषय है" ऐसा आकलन कर
लेता है। यदि दर्शन और स्पर्शन गुणोंसे भिन्न एक गुणी आत्मा नहीं
होता तो उक्त प्रकारका एकार्थका प्रतिसन्धान नहीं होता।
यहाँ ज्ञानका विषय क्या है, यह विचारणीय है। क्या दोनोंका
केवल रूप या केवल स्पर्श विषय है ? या दो भिन्न भिन्न विषयोंका
एक समुदाय या समुदायातिरिक्त कोई विषय गृहीत होता है ? अथवा
वस्तुविहीन ज्ञानका ही आकारविशेष उल्लिखित होता है ? या वस्तु-
शून्य अलीक ही भासित होता है ? जैसे रज्जुसर्पभासित होता है।
इनमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है।
द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि उक्त समुदाय एकदेश-
प्रयुक्त या एककालप्रयुक्त या एककार्यप्रयुक्त अथवा एककारणप्रयुक्त
होगा ? प्रथम कोटिमें अन्योन्याश्रयदोष हो जायगा। क्योंकि एक
आधारताका प्रतिसन्धान होनेपर समुदायका अनुसन्धान होगा और
समुदायका प्रतिसन्धान होनेपर एकदेशताका प्रतिसन्धान हो सकेगा।
एककालता रूप द्वितीयकोटि तब होती यदि रूप और स्पर्श एक ही
इन्द्रियसे ग्राह्य होता। एककार्यता रूप तृतीय कोटि भी संभव नहीं है।
क्योंकि रूप और स्पर्शका एक कार्य नहीं है। एककारणतारूप चतुर्थ
कोटि भी नहीं हो सकती है, क्योंकि रूप-स्पर्शादिका एक कारण होनेमें
प्रमाण नहीं है।
चतुर्थ आकारपक्षमें या पञ्चम अलीकपक्षमें रूप स्पर्शादिका विलोप-
प्रसङ्ग हो जायगा। इसलिये तृतीयपक्ष हो सकता है। अर्थात् उक्त
प्रतिसन्धानका विषय रूपस्पर्शादिसे अतिरिक्त एक अवयवी है। ऐसी
स्थितिमें उस एक अवयवी वस्तुका ग्रहण करनेवाला अतिरिक्त आत्मा
सिद्ध हो जाता है।
गुण और गुणीका सहोपलम्भ होनेसे दोनोंमें अभेद है, यह नहीं
कह सकते। क्योंकि 'पीतः शङ्खः' इस स्थलमें श्वेत्यगुणका अनुपलब्ध
होनेपर भी शङ्खका उपलब्ध होता है।
अनुपलम्भाद्—
इस प्रकरणमें "आत्मा नहीं है, क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती
है" इस बौद्धपक्षका खण्डन किया गया है। जैसे, सभीको आत्माकी
उपलब्धि नहीं होती है, इसमें सन्देह है। यदि कहो कि एक व्यक्तिको
उपलब्धि नहीं होती है, तो यह व्यभिचारदोषसे ग्रस्त है। क्योंकि
किसी एक व्यक्तिको उपलब्धि न होनेपर उस वस्तुका अभाव नहीं हो
जाता है।
( २८ )
इसके विपरीत अनुमानद्वारा आत्माकी उपलब्धि होती है । यह
अनुमान प्रतिसन्धान है । जैसे, "स एवाय देवदत्त, यमह पाटलि-
पुत्रेऽद्राक्षम्" इत्यादि । यहाँ पूर्वमे पाटलिपुत्रमें देवदत्तको देखनेवाला
और यहाँ काशीमें उसका प्रतिसन्धान करनेवाला एक ही स्थिर
आत्मा है । अर्थात् यहाँ स्मरण और प्रत्यक्षका कर्त्ता एक ही स्थिर
आत्मा है ।
उक्त प्रतिसन्धानका कर्ता देह है यह नहीं कह सकते, क्योंकि
देहके प्रतिदिन परिवर्तित होनेसे वह दूसरेके द्वारा दृष्टका प्रतिसन्धान
नहीं कर सकता है । "नान्यदृष्ट स्मरत्यन्य यह नियम है ।
न्यायाभिमत आत्माके सम्बन्धमे तर्क भी हैं। जैसे, आत्मा यदि
सादि हो तो इष्टसाधनताज्ञानके अभावमें प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
ऐसी स्थितिमें सर्वथा अप्रवृत्तिका प्रसङ्ग हो जायगा । अतः आत्मा
अनादि है । आत्मा यदि सान्त हो तो अनादि सान्त होनेसे वह अभाव
( प्रागभाव ) बन जायगा । अत आत्मा अनन्त भी है । यदि वह
द्रव्य न हो तो निर्गुण हो जायगा । अत आत्मा द्रव्य भी है । यदि
वह व्यापक न हो तो अग्नि पवनादिमे क्रिया नहीं हो सकेगी । अत
आत्मा व्यापक है । यदि वह मूर्त हो तो मूर्त नित्य परमाणुकी तरह
अस्मदादिको प्रत्यक्ष होनेवाले सुख दु खादिका वह आधार नहीं हो
सकेगा । अतः आत्मा अमूर्त है। यदि वह सक्रिय हो तो मूर्त
होने लगेगा । अतः आत्मा निष्क्रिय है।
यहाँ यह शङ्का करना कि—आत्मा यदि कथञ्चित् सिद्ध भी हो तो
वह हेय ही है । क्योंकि आत्मदर्शी व्यक्ति उसके उपकारीके प्रति राग
करेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा। राग द्वेष ससारका
मूल है । अत मुमुक्षुजन को भी नैरात्म्यकी ही भावना करनी चाहिये—
ठीक नहीं है। क्योंकि अनात्मदर्शीका मुमुक्षु होना ही अनुपपन्न है।
कारण, आत्माको विना स्वीकार किये कोई न तो दुख को छोडना
चाहेगा और न सुखको प्राप्त करना चाहेगा । साथ ही यह नैरात्म्य
दृष्टि नास्तिक्यको बढावा देगी । एव प्रबल विषयतृष्णाको जगाता
हुई अनन्त अनर्थको पैदा करेगी। इसीलिये तो "यावज्जीवेत् सुख
जीवेत्" ,त्यादि निश्शङ्क प्रलाप होते हैं। यह जो कहा कि आत्म-
दर्शी व्यक्ति उपकारीमें राग और अपकारीमे द्वेष करेगा—तो यह
ठीक ही हैं। क्योंकि जो मोक्षको उपकार मानता है, वह उसके
हेतुके प्रति रागवान् हो और उसके बाधकके प्रति द्वेषवान् हो तो यह
समुचित ही है।
ऐसे (शरीरादिसे भिन्न) आत्मामें न्याय (अनुमान) और आम्नाय
दोनों ही प्रमाण हैं। न्याय प्रतिपादित ही हो चुका है। आम्नाय-
प्रमाणका सार तो "अशरीरं वाव सन्तम्" इत्यादि है, जो शरीरसे भिन्न
आत्माको प्रतिपादित करता है। आप्तोक्त होनेसे उक्त आम्नाय प्रमाण
है। क्योंकि विश्वका कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर अनुमानसे सिद्ध है और उसीके
द्वारा आम्नाय उक्त है। अतः उसमे अप्रामाण्य नहीं है। उपर्युक्त
प्रमाणोंसे अवधारित ऐसे आत्माकी आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्ति ही मोक्ष
है। यह न्यायशास्त्रका सारभूत अर्थ है।
कृतज्ञताज्ञापन—
सर्वप्रथम मैं अपने शिवसायुज्यप्राप्त प्रात स्मरणीय गुरुओ सर्वतन्त्र-
स्वतन्त्र पण्डितप्रवर श्रीसूर्यनारायणशुक्ल एव विद्यानिधि महामहो-
पाध्याय पण्डितपञ्चानन श्रीहरिहरकृपालुद्विवेदीका ऋणी हूँ, जिन्होंने
क्रमशः मुझे न्यायवैशेषिक एव वेदान्तका निरतिशयस्नेहपूर्वक अध्यापन
कर मेरी आखें खोल दीं। उनके लिये इतना ही कहना पर्याप्त होगा
"चक्षुरुन्मीलितं याभ्याम्"। वस्तुत जो कुछ मैं ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ,
उनकी अपारकृपा एवं स्नेहका सुफल है।
उत्तरप्रदेश सस्कृत अकादमीके वर्तमान अध्यक्ष एव सम्पूर्णानन्द
संस्कृतविश्वविद्यालयके भू० पू० कुलपति पण्डित श्रीकरुणापतिजी त्रिपाठी
का उपकार भूल नहीं सकता, जिन्होंने अपने कुलपतित्वकालमे ही इस
ग्रन्थके सानुवाद प्रकाशनको आवश्यक समझा था और इसके लिये
उ० प्र० सस्कृत अकादमीके माध्यमसे पाँच हजार रुपयोंका सरकारी
साहाय्य-अनुदान स्वीकृत कर इसके प्रकाशनार्थ हमे प्रोत्साहित किया
और इसका प्रकाशन सम्भव हो सका।
मैं उन मनीषियोंका अत्यन्त ही अनुगृहीत हूँ, जिन्होंने मौखिक या
लेखनबद्ध अपनी अमूल्य सम्मतियाँ देकर मुझे प्रोत्साहित एव मेरी इस
कृतिको गौरवान्वित किया है। इनमे अनन्तश्रीविभूषित स्वामीकरपात्री-
जी महाराज, सम्पूर्णानन्द सस्कृत विश्वविद्यालयके वर्तमान कुलपति
[Page 30]
( ३० )
पण्डितरत्न श्रीगौरीनाथजी शास्त्री एव सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्या-
लयके भू० पू० कुलपति नैयायिकधुरन्धर पण्डितराज श्रीबदरीनाथजी
शुक्ल, महानुभाव प्रमुख हैं। श्रीशुक्लजीने प्राक्कथन लिख कर मुझे
अत्यन्त ही अनुगृहीत किया है ।
इस ग्रन्थके प्रकाशनमें दूसरी उल्लेखनीय सहायता हमारे भूतपूर्व
शोधच्छात्र एव वर्तमानमें महामण्डलेश्वर स्वामी श्रीशिवचैतन्यपुरीजी
शङ्करआश्रम, वृन्दावनकी प्राप्त हुई, जिन्होंने एक हजार एक सौ एक
रुपये एतदर्थ प्रदान कर अपनी सहज उदारता एव प्रेमको मानो मूर्तरूप
दिया । उनका मैं अत्यन्त आभारी हूँ । अन्तमें सहृदय विद्वज्जनसे
पुनः निवेदन है कि मानव सुलभ त्रुटिको क्षमा करते हुए अपने अमूल्य
सुझावोंसे हमे अनुगृहीत करेंगे ।
इस ग्रन्थके मुद्रण-कार्यको शीघ्र एव सुन्दर बनानेमे सतत संलग्न
श्रीविद्याप्रेसको भी मै हार्दिक आशीर्वाद एव धन्यवाद देता हूँ जिसके
सहयोगसे इसका प्रकाशन कार्य समयपर सम्पन्न हो सका है।
इति शिवम् ।
केदारनाथत्रिपाठी
२०।१२।८३
-※-
विषयानुक्रमणिका
विषयः— पृष्ठसङ्ख्या
मङ्गलाचरणम् १
आत्मतत्त्वज्ञानस्यैव दु खहानोपायत्वनिरूपणम् ०
आत्मतत्त्वविवेचने निमित्तोपपादनम् २
आत्मनि बाधकचतुष्टयनिर्देश ३
क्षणभङ्गवादः ४—१७७
सन्मात्रस्य क्षणिकत्वे पूर्वपक्षिणोऽनुमानम् ४
तत्र व्याप्त्यसिद्धिकथनम् ४
सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्मससर्गेण क्षणिकत्वसाधनम्
तत्र हेत्वसिद्धिकथनञ्च ४
प्रसङ्गविपर्ययाभ्यां विरुद्धधर्मसंसर्गसाधन तत्र सामर्थ्यकारि-
त्वयोर्विशिष्टत्वप्रसङ्गकथनञ्च ५
सामर्थ्यकारित्वयो आक्षेपप्रतिषेपाभ्यामाशिकविरोधकथन
तन्निरासश्च ७
सामर्थ्यकारित्वयोर्भेदे उपाधिनिराकरणम् ८
” ” ” विकल्पभेदनिराकरणम् ९
” ” ” निनिमित्तकत्वखण्डनम् ९
अङ्कुरसामर्थ्यस्याङ्कुरयोग्यतास्वरूपत्वपक्षे
विकल्पोपन्यासस्तद्दूषणञ्च १०
प्रातिस्विकयोग्यतापक्षस्य विकल्पत्रयोपन्यासेन दूषणम् १०
कुर्वद्रूपत्वेऽनुमानखण्डनम् १२
बीजस्याविलम्बकारिस्वभावत्वे कार्यजनने हेतुत्वखण्डनम् १३
प्रातिस्विकयोग्यतापक्षे तृतीयविकल्पे दूषणोपन्यासः १४
समर्थव्यवहारविषयत्वरूपसामर्थ्यनिरास १५
भाववस्तुनः क्षेपाक्षेपस्वभावत्वविकल्पे सिद्धान्तोपपादनम् १६
कुर्वद्रूपत्वजातौ प्रमाणाभावोपपादनम् २४
अङ्कुर प्रति बीजजातीयस्य प्रयोजकत्वसाधनम् २९
अत्रान्वयव्यतिरेकप्रदर्शनम् ३३
( ३२ )
विषय — पृ०सं०
बीजानुभवादिकमेवासाधारणं कार्यं बीजजातीयस्येति पक्षखण्डनम् ३२
कुशूलस्थबीजस्याङ्कुराकरणे प्रयोजकस्य व्यतिरेकानुमानम् ३६
कारणाकरणलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गात् पूर्वापरबीजयोर्भेद
इति पक्षखण्डनम् ३८
वस्तुनि कालभेदेन परिमाणभेदप्रसङ्गन्निवारणम् ४०
सामर्थ्यासामर्थ्ययोर्विरोधो बाधकबलादिति पक्षनिराकरणम् ४२
भिन्नदेशस्थार्थक्रियाभेदात् कारणभेदे दोषोपपादनम् ४७
एकदा कर्तुर्यावत्सत्त्व करणनिराकरणम् ५०
दण्डित्वकुण्डलित्त्ववत् करणाकरणयोर्विरोध इति पक्षनिराकरणम् ५१
तस्यैव बीजस्य तेनैव सहकारिणा सम्बन्धासम्बन्धयोर्विरोध
निराकरणं क्षणिकपरमाणुष्वपि विरोधस्य दुर्वारत्वकथनं च ५२
अवस्तुनि प्रमाणप्रवृत्तिकथन तथात्वेऽपि स्ववचनविरोध
परिहारनिरूपणम् ५६
असत्ख्यातिनिराकरणम् ६६
असत्ख्यातिपक्षेऽपि अवस्तुनि क्रमयौगपद्यव्यतिरेकासिद्धि
प्रतिपादनम् ७३
भूतले घटाभावासिद्धिप्रसङ्गस्य निराकरणम् ७४
काल्पनिकरूपसम्पत्तेरनुमानाङ्गत्वनिरसनम् ७६
क्षणभङ्गसिद्धौ प्रकारान्तरखण्डनम् ७९
ध्रुवभावित्वेन विनाशस्याहेतुकत्वात् क्षणिकत्वसिद्धिरितिपक्षे
विनाशस्य प्रतियोगितादात्म्यखण्डनम् ८०
विनाशस्य निरुपायत्वखण्डनम् ८३
,, ,, प्रतियोगिकार्यत्वखण्डनम् ८४
,, ,, प्रतियोगिव्यापकत्वखण्डनम् ९५
विनाशस्याभावरूपत्वात् अहेतुकत्वमिति पक्षस्य खण्डनम् ९६
स्थैर्यसिद्धौ प्रत्यभिज्ञाप्रमाणोपन्यास ९९
प्रत्यभिज्ञास्थले सतो विरुद्धधर्मसंसर्गस्य दुरुहत्वमिति पूर्वपक्ष
निराकरणम् १०१
प्रत्यभिज्ञास्थले कालभेदेऽपि वस्त्वभेद इत्यत्रानुमानोपन्यास १०३
स्थिरत्वे बाधकस्य बाह्यार्थालीकत्वस्य निराकरणम् १०५
( ३३ )
विषयः पृ० सं०
ज्ञानश्रीसमतापोहवादस्य खण्डनम् १०९
धर्मोत्तरमताशङ्का तत्समाधानञ्च ११५
अन्यापोहसिद्धौ न्यायाभावोपपादनम् ११८
अपोहसिद्धौ विकल्पपक्षकानुमाननिराकरणम् १२३
इन्द्रियासमानविषयत्वेन लिङ्गशब्दौ अपोहविषयकौ इति
पूर्वपक्षतर्कनिराकरणम् १२९
समानविषयत्वेऽपि प्रत्यक्षशाब्दलैङ्गज्ञानानां स्फुटत्वास्फुटत्वो-
पपादनम् १३२
परोक्षापरोक्षरूपतया प्रत्यक्षलैङ्गशाब्दप्रतिभासेषु भेद इति
पूर्वपक्षखण्डनम् १३६
परोक्षत्वापरोक्षत्वे जातिविशेषावित्यत्र प्रमाणोपन्यासः १३७
अपोहकल्पनायाः प्रवृत्त्यादिनिर्वाहकत्वनिराकरणम् १३९
सौत्रान्तिकवाह्याकारवादखण्डनम् १५३
वैभाषिकस्य बाह्यस्वलक्षणवादखण्डनम् १५५
धर्मकीर्तेः पिण्डैक्यवादखण्डनम् १५७
भिन्नस्वलक्षणमतखण्डनम् १५८
गोत्वादिनानासामान्येष्वेकसामान्यत्वव्यवहारस्य
भ्रान्तत्वनिरूपणम् १५९
जात्यादौ बाधकसत्त्वादपोहसिद्धिरिति पक्षखण्डनम् १६१
स्वरूपतोऽनुपलब्धिर्जातिबाधिकेति पक्षखण्डनम् १६२
निर्विकल्पकस्यापि जातिविषयकत्वसाधनम् १६४
विरुद्धधर्माध्यासस्य जातिबाधकत्वखण्डनम् १६६
जातिजातिमतोर्भेदेऽपि सामानाधिकरण्योपपादनम् १६९
ज्ञानतोऽपि जातिबाधनिरसनम् १७०
सामान्यज्ञानस्य प्रामाण्ये बाधकनिरासः १७१
सामान्यज्ञानस्येन्द्रियजत्वसाधनम् १७१
जातिबाधकापोहस्वीकारे प्रयोजनानुरोधनिरसनम् १७३
शब्दवाच्यत्वसम्बन्धे ज्ञानश्रीप्रयुक्तीनां सदोषत्वनिरूपणम् १७६
बाह्यार्थभङ्गवादः— १७८-३१६
ग्राह्यग्राहकभागयोरभेदसाधने सहोपलम्भादिहेतूनां काला-
त्ययापदिष्टत्वप्रदर्शनम् १७८
विषयः पृ० सं०
भासमाननीलादिभेदस्यासत्यत्वे सहोपलम्भादिहेतूनाम-
नैकान्तिकत्वप्रदर्शनम् १८८
नीलादिभेदाप्रथने हेतूनामसिद्धत्वनिरूपणम् १८८
भेदस्य विकल्पारूढत्वे पूर्वोक्तदोषानुवृत्तिकथनम् १८९
असतो भेदस्याध्यवसायस्वीकारे दोषोद्घाटनम् १९०
अद्वयदर्शिविज्ञानस्य सद्भेदविषयकत्वे दोषप्रदर्शनम् १९१
भिन्नयोर्वेद्यवेदकभावेऽनुपपत्तिनिराकरणम् १९४
प्रकाशमानत्वहेतुना भेदनिषेधखण्डनम् १९७
ग्राह्यग्राहकयोर्भेदाभेदविधुरचित्राकारत्वखण्डनम् १९७
ग्राह्यग्राहकयोरभिन्नजातीयत्वखण्डनम् २०१
ग्राह्यांशस्यालीकत्वनिराकरणम् २०३
विश्वस्य विचारासहत्वखण्डनम् २०६
शून्यतैव परमं निर्वाणमिति माध्यमिकपक्षखण्डनम् २१०
विषयविषयीभावकार्यकारणभावसमर्थनेन बाह्यार्थसद्भावनिरूपणम् २१४
विचारस्य नीलादिवत् विचारासहत्वे जगतः सत्यत्वसिद्धिः
विचारसहत्वे च पक्षसाध्यादीनामेव सत्यत्वसिद्धिरिति
निरूपणम् २२१
युक्त्युपस्थापकबौद्धहेतूनां स्वव्याघातकयुक्त्युपस्थापकत्वप्रदर्शनम् २२१
बौद्धोक्तदृष्टान्तानामप्याभासत्वप्रसङ्गनिरूपणम् २३३
अवयविनिषेधखण्डनम् २३४
पूर्वपक्षनिराकरणपूर्वकं भेदस्वरूपनिरूपणम् २३८
अवयविबाधकविरुद्धधर्माध्यासानामसिद्धत्वोपपादनम् २४७
परमाणुनिषेधखण्डनम् २६५
“षट्केन युगपद्योगात्” इत्यादिपरमाणुबाधकयुक्तीनां निरसनम् २७०
परमाणुवत् बुद्धावपि षट्केन युगपद्योगात् इत्यादिप्रसङ्गोपपादनम् २७४
“अस्तु तर्हि बुद्धेरपि विलोपः” इति पक्षमुत्थापयतो मतखण्डनम् २७५
सर्वशून्यत्ववादिमतनिराकरणम् २७८
अवयविनि अनुपलम्भदूषणनिराकरणम् २७९
परमाणूनामेव तेषां समूहस्यैव वा स्थूलत्वमिति पूर्वपक्षखण्डनम् २८०
ज्ञानस्यैव धर्म एकत्वं स्थूलत्वं चेति मतखण्डनम् २८४
सन्मात्रस्य निरवयवत्वमिति पक्षखण्डनम् २८९
विषयः पृ० सं०
अवयविनि अनुमानोपन्यास २९४
बाह्यार्थविषये सन्देहवादनिराकरणम् २९५
ज्ञानप्रामाण्यस्य स्वतस्त्वनिराकरणम् ३००
धर्मिभूतज्ञानस्यानुव्यवसायतज्जातीयज्ञानयोश्च नियतप्रामाण्ये
तर्कप्रदर्शनम् ३१२
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३१७-३३४
गुणगुणिनोरभेदान्नैरात्म्यमिति पक्षस्य पञ्चविधविकल्पोप-
न्यासैर्निराकरणम् ३१७
द्वितीये विकल्पचतुष्टयोपन्यासः ३१९
तृतीयं स्वीकृत्य चतुर्थे विकल्पद्वयोपन्यासः ३२२
चाक्षुषस्पार्शनप्रत्यक्षयोरलीकविषयकत्वनिरासकथनम् ३२४
गुणगुणिभेदेऽभेदसाधनस्य बाधकत्वनिरसनम् ३२४
गुणगुणिनोर्विरोधधर्मोपपादनम् ३२९
धर्मधर्मिणोर्भेदे युक्त्युपन्यासः ३२९
अनुपलम्भवादः ३३५-४७३
नास्त्यात्मा अनुपलब्धेरिति पक्षनिराकरणम् ३३५
आत्मसद्भावे प्रत्यक्षप्रमाणोपपादनम् ३३७
आत्मसद्भावसिद्धावनुमानप्रमाणोपपादनम् ३४२
सहकारिविशेषात् प्रतिसन्धाननियम इति पक्षखण्डनम् ३५३
आलयविज्ञानेषु भेदाग्रहात् प्रतिसन्धानमिति पक्षखण्डनम् ३५७
आलयवैज्ञानिकविषयदृष्ट्यापि भेदाग्रहप्रतिसन्धानयोरुप-
पादनासम्भव इति निरूपणम् ३६१
स्थिरात्मसाधने प्रकारान्तरोपदर्शनम् ३६३
इन्द्रियात्मवादखण्डनम् ३७४
मनआत्मवादखण्डनं परलोक्यात्मसाधनञ्च ३७४
आत्मनोऽनादित्वानन्तत्वद्रव्यत्वविभुत्वामूर्तत्वनिष्क्रियत्वसाधने
हेतुतर्कोपन्यासः ३७५
आत्मनो मूर्तत्वाणुत्वयोर्दोषप्रदर्शनम् ३७७
आत्मन सिद्धावपि तस्य हेयत्वमेवेति पूर्वपक्षे समाधानोपन्यासो
नैरात्म्येऽनर्थप्रदर्शनञ्च ३७८
( ३६ )
विषयः पृ० सं०
आत्मनो देहातिरिक्तत्वे न्यायाम्नायप्रमाणोपन्यासपूर्वकं
न्यायार्थसाराम्नायसारसंक्षेपप्रदर्शनम् ३८३
आम्नायेऽप्रामाण्यखण्डनपुरःसर प्रामाण्यस्थापनम् ३८४
प्रसङ्गाद् वेदकर्तरि विश्वस्तरीभरेऽनुमानप्रदर्शनम् ३८५
अत्र तार्किकगर्वग्राहोक्तिनिवारणम् ३९२
प्रसङ्गादेव व्याप्तिस्वरूपनिरूपणम् ४१४
प्रतिपद्युपस्थापितायाः प्रतिव दूया.निवारणम् ४१६
नित्यज्ञानासम्भवाक्षेपनिवारणम् ४१८
ईश्वरविषये कतिपयक्षुद्रशङ्कानां निराकरणम् ४२०
ईश्वरस्य सर्वज्ञत्वम् ४२३
ईश्वरस्याशरीरत्वोपपादनम् ४२५
ईश्वरस्य वेदवक्तृत्वोपपादनम् ४२८
सौगताद्यागमेषु महाजनपरिगृहीतत्वस्य साशयिकत्वप्रतिपादनम् ४३४
महाजनपरिगृहीतत्वेन वेदानां सर्वज्ञपूर्वकत्वोपपादनम् ४३७
वेदानां नित्यानुमेयत्वनिवारणम् ४४१
मन्वादीनां वेदपरिग्रहे उपपत्तिप्रदर्शनम् ४४५
न्यायदर्शनरीत्या वेदानां प्रवाहनित्यत्वोपपादनम् ४४८
सुगताद्यागमेषु वैदिकानामादराभावे निमित्तप्रदर्शनम् ४४९
सुगताद्यागमानां मूलविवेचनम् ४५२
मोक्षस्वरूपनिरूपणम् ४५६
नित्यसुखस्यावास्तविकत्वनिरूपणम् ४६१
आत्मन स्वप्रकाशसुखस्वभावत्वजिज्ञासायामाचार्योत्तरम् ४६५
इति विषयानुक्रमणिका
आत्मतत्त्वविवेकः
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥