आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
१८८ आत्मतत्त्वविवेके
ग्राह्यग्राहकभागभेदो ग्राह्यनीलादिभेदो वा चकास्ति, स किं
सत्योऽसत्यो वा ? सत्यत्वे स एव दोषः । असत्यत्वे नाय-
मात्मा विज्ञानस्येत्यनात्मन्यपि सहोपलम्भनियमादयोग्यता।
इत्यनेकान्तः ।
भेदो न प्रथत एवेति चेत् , एव तर्हि अस्तु तावत् सर्व-
जनीनप्रतीतिविरोधः स्ववाग्विरोधो वा । असिद्धास्तर्हि
हेतवः । न हि भेदाप्रथने सहार्थं तद्व्याप्यतां वा पश्यामः ।
तदस्फुरणेऽपि पक्षादिप्रविभागोऽपि कथम् ? किं च बोधयितुं
जो यह ग्राह्यभाग ( विषय ) और ग्राहकभाग ( ज्ञान ) का भेद तथा
नीलादि विषयोंका पारस्परिक भेद भासित होता है, वह क्या सत्य है ?
अथवा असत्य है ? यदि भेद सत्य हो तो ग्राह्य-ग्राहकका तथा नील
पीतादि ग्राह्योंका अभेद बाधित ही हो गया । यदि यह भासमान भेद
असत्य हो तो इस असत्य भेदका सत्य ज्ञानके साथ तादात्म्य ( अभेद )
नहीं हो सकता है । इस प्रकार तादात्म्यरूप (अभेद) साध्यके नहीं
रहनेपर भी सहोपलम्भरूप हेतुके होनेसे पूर्वोक्त सहोपलम्भ हेतु व्यभि-
चारी है । अत विषय और ज्ञानका अभेद सिद्ध करनेमे यह हेतु
सर्वथा अयोग्य है ।
यदि कहो कि-ग्राह्यग्राहकका भेद अथवा नीलपीतादिका भेद
भासित ही नहीं होता है-तब तो सर्वजनीन प्रतीतिका विरोध तथा
स्ववचनका विरोध हो जायगा । अर्थात् सभीको ही उक्त भेदकी प्रतीति
होती है । इस प्रकार सर्वजनीन प्रतीतिका विरोध हो जाता है । एव
भेदकी प्रतीति न होनेपर "भेदो न प्रथते" यह वचन भी तुम कैसे कह
सकते हो ?
ऐसी स्थितिमे पूर्वोक्त सहोपलम्भ आदि हेतु भी स्वरूपासिद्ध हो
जाते हैं । क्योंकि भेदकी प्रतीति न होने पर सहोपलब्धिका कोई अर्थ
ही नहीं है । कारण, अभिन्न वस्तुमें साहित्यका व्यवहार नहीं होता है
तथा भेदकी प्रतीति न हो तो सहोपलम्भरूप हेतु अभेदरूप साध्यका
व्याप्य भी नहीं हो सकता है । क्योंकि भेदमें ही व्याप्य-व्यापकभाव
होता है ।
बाह्यार्थभङ्गवादः १८९
प्रवृत्तोऽसि किमर्थं च ? अन्वयव्यतिरेकाप्रतीतौ किं च हेतो-
र्बलम् ? कुतश्च विप्रतिपत्तिः कीदृशे चेति ? सोऽयं विचार-
मारभते, भेदं तु सांप्रतमपि नेच्छति, नूनमुन्मत्तोऽप्यनेन
जितः ।
विकल्पारूढ एव भेदो व्यवहाराङ्गं नानुभवारूढ इति
चेत्, सोऽपि सत्योऽसत्यो वा भासते न वेति विकल्पान्
नातिवर्तते ।
एवं भेदके अस्फुरणसे पक्ष, साध्य, हेतु, दृष्टान्त आदिका विभाग
नहीं हो सकनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति भी कैसे हो सकेगी ? एवं किसे
जनानेके लिये अनुमानमे प्रवृत्त हुए हो ? क्योंकि तुम्हारे मतमे वादि-
प्रतिवादीमे भी भेद नहीं है । एवं तत्त्वनिर्णय विजय आदि उद्देश्योंके
असत् होनेसे किस प्रयोजनके लिये अनुमानमे प्रवृत्ति होगी ?
एवं भेदके अभावमे अन्वय-व्यतिरेककी भी प्रतीति नहीं हो सकनेसे
पक्षसत्त्व विपक्षव्यावृत्तत्व आदि हेतुका बल भी कैसे हो सकेगा ? एवं
विचार प्रवर्तक विप्रतिपत्ति भी कैसे हो सकेगी ? क्योंकि भेदके बिना
प्रतीतियोंमे भी विरोध नहीं हो सकेगा । विरुद्धा प्रतिपत्ति ही तो विप्रति-
पत्ति कहाती है । साथ ही भेदके अभावमे विप्रतिपत्तिके विषय भी
क्या होंगे ? इस प्रकार यह वादी विचार तो प्रारम्भ करता है किन्तु
विचारके लिये अपेक्षित भेद को प्रतीयमान भी नहीं मानना चाहता
है । निश्चित ही, इसने नैयायिकको कौन कहे उन्मत्तको भी जीत
लिया है ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानका विषय (काल्पनिक) जो भेद,
वही पूर्वोक्त विविध व्यवहारोंके लिये अपेक्षित है । इसलिये व्यवहारों
की उपपत्तिके लिये भेदको निर्विकल्पकज्ञानका विषय (पारमार्थिक)
माननेकी आवश्यकता नहीं है—तो वह सविकल्पकज्ञान का विषयभेद
भी सत्य है या असत्य है ? तथा भासित होता है या नहीं भासित होता,
इत्यादि विकल्पोंसे नहीं बच सकता है । अर्थात् भेद यदि सत्य है और
भासित होता है तो हमारा ही अभीष्ट सिद्ध हुआ । सत्य भी भेद यदि
१९० आत्मतत्त्वविवेके
असन्नेवास्फुरन्नेवाध्यवसीयत इति चेत्, अध्यवसीयत
इति विवरणार्र्हमेतत् । तद्विषयव्यवहारजननमध्यवसायार्थ
इति चेत्, व्यवहारोऽपि यद्यज्ञानरूपः कथमसंस्तेन जन्यताम् ?
ज्ञानरूपश्चेत्, कथं नियामकं विना तद्विषयः ? स्वकारण-
सामग्रीसामर्थ्यादिति चेत्, सोऽयं व्यवहृतिरूपज्ञानालीकभेद-
योर्नियामकान्तराभावेऽपि कारणसामर्थ्यमाश्रित्य विषयविप-
यिभावमिच्छति न त्वनुभवानुभाव्ययोरिति क्षीरं विहाय रुचि-
ररोचकग्रस्तस्य सौवीरे ।
भासित न हो तो आभासमानका व्यवहार नहीं हो सकनेसे भेदका
व्यवहार ही लुप्त हो जायगा। यदि असत्य भेदको भासित हुआ
मानो तो तुम्हारे मतानुसार विषय और ज्ञानमें अभेद होनेसे असत्य
ही हो जायगा। यदि उस भेदको असत्य मानते हुए आभासमान भी
मानो तो भी पूर्ववत् भेद व्यवहार लुप्त हो जायगा। क्योंकि जो भासित
ही नहीं होता उसका व्यवहार कैसे हो सकेगा ?
यदि कहो कि—असत् होते हुए भी और निर्विकल्पकद्वारा आभास-
मान होते हुए भी भेदका अध्यवसाय होता है—तो अध्यवसायका ही
अर्थ यहाँ विचारणीय है। अर्थात् सविकल्पकद्वारा भेदाध्यवसाय होने
का क्या अर्थ है ?
यदि कहो कि—भेदविषयक व्यवहार करना ही अध्यवसायका अर्थ
है—तो आपके मतानुसार असन् होनेसे वह व्यवहार उस सविकल्पकसे
कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? यदि वह व्यवहार ज्ञानरूप हो तो किसी
नियामकके बिना असत् और आभासमान भेद उसका विषय कैसे
हो सकेगा ?
यदि कहो कि—व्यवहारस्वरूपज्ञान अपने कारणबलसे ऐसा ही
उत्पन्न होता है कि अलीकभेदको भी अपना विषय बना लेता है—तो
यह किसी अन्य नियामकके अभावमें भी कारणसामर्थ्यका आश्रयकर
व्यवहाररूप ज्ञान और मिथ्याभेदमें तो परस्पर विषय विषयिभाव
(ग्राह्य-ग्राहकभाव) चाहता है, किन्तु निर्विकल्पक और वस्तुभूत
बाह्यार्थभङ्गवादः १९१
भेदोऽपि विकल्पाकार, न तु बाह्य इति चेत्, यद्यसन्ने-
वासौ, कथं विकल्पाकारः ? तदाकारश्चेत्, कथमसन्निति
परिभावय ।
अस्तु तर्हि सन्नेवेति चेत्, नन्वद्वयदर्शि चेद् विज्ञानम्
कथं भेदप्रथा ? आकारद्वयदर्शि चेत्, कथमेकं सद्द्वयात्मकम् ?
चित्राकारमिति चेत्, चित्रमेकमनेकं वेति विकल्पगलितमेव
नीलादिमें ग्राह्य-ग्राहकभाव नहीं चाहता । इस प्रकार अरुचिरोगसे
ग्रस्त इस वादीकी रुचि दूध छोड़कर सौवीर¹ (कांजी) में ही हो
रही है ।
यदि कहो कि—नील-पीतादिका भेद तथा स्वयं नील-पीतादि भी
सविकल्पकद्वारा भासित तो होता है किन्तु वह भी विकल्पका ही आकार
है, न कि उससे भिन्न बाह्य वस्तु है—तो यदि वह भेद असत् ही है
तो वह सत्रूप विकल्पका आकार कैसे हो सकता है ? यदि वह
विकल्पका आकार है तो वह असत् कैसे हो सकता है ?
१९२ आत्मतत्त्वविवेके
तव पश्यतः । अनेकत्वे क्व एकविज्ञानतादात्म्यम् ? विज्ञान-
स्यापि यावदाकारमनेकत्वे क्व चित्राकारसंवेदनम् ? स्वस्व-
मात्रमग्नत्वात् । एकत्वे क्व भेदप्रतीतिः ?
अनीलाद्यनेकव्यावृत्तिकृतोऽनेकत्वाध्यवसाय एवेति चेत् ,
अतादात्म्ये कथं व्यावृत्तीनामुल्लेखः ? तादात्म्ये कथम-
नेकत्वम् ? एकत्वेऽपि क्व तत्कृतोऽपि भेदाध्यवसायः ? उल्ले-
खोऽयमस्य विज्ञानस्य यदनेकत्वं नाम, न पुनस्तत्त्वान्तर
सकेगा ? क्योंकि प्रत्येक विज्ञान नील पीत रक्त आदि अपने अपने
आकारोंके साथ पृथक् पृथक् सम्बद्ध होनेके कारण सभी विज्ञान एकैका
कार ही होंगे, चित्राकार कोई भी नहीं हो सकेगा । यदि वह चित्राकार
एक हो तो उस विज्ञानद्वारा नील और पीत आदिकी तथा उनके भेदकी
प्रतीति कहाँ हो सकेगी ?
यदि कहो कि—जैसे •न्यायमतमें नील पीतादिसे विलक्षण चित्ररूप
माना गया है वैसे ही तुम्हारे मतमें भी समूहालम्बन विज्ञानका नीलादि
आकारोंसे विलक्षण एक चित्र कार माना गया है और उस चित्राकारक
एक होनेपर भी अनीलादि अनेक व्यावृत्तियोंके कारण ही उस चित्राकार
विज्ञानमें अनेकत्व ( भेद ) का उल्लेख होता है—तो वे व्यावृत्तियाँ
यदि विज्ञानसे भिन्न हों तो विज्ञानद्वारा उनका ग्रहण कैसे हो सकता
है ? और ग्रहण नहीं होनेपर व्यावृत्तियोंके कारण भेदका भी उल्लेख
नहीं हो सकना है । व्यावृत्तियोंका यदि विज्ञानके साथ तादात्म्य हो
तो विज्ञानके एक होनेसे व्यावृत्तियोंमें भी अनेकत्व ( भेद ) कैसे हो
सकेगा ? यदि विज्ञानके समान व्यावृत्तियोंमे भी एकत्व हो तो क्या
व्यावृत्तियोंके कारण विज्ञानद्वारा पूर्वोक्त भेदाध्यवसाय (अनेकत्वोल्लेख)
भी कैसे हो सकेगा ?
यदि कहो कि—विज्ञानद्वारा भासित होनेवाला जो अनेकत्व है,
वह काल्पनिक उल्लेखभर है न कि वास्तविक है । इसलिये उस
काल्पनिक अनेकत्वसे विज्ञानके वास्तविक एकत्वमें कोई बाधा नहीं
आ सकती है—तो वह काल्पनिक अनेकत्व विज्ञानका स्वरूप है अथवा
अस्वरूप है ?
बाह्यार्थभङ्गवादः १९३
मिति चेत्, स्वरूपमस्वरूपं वेति वाच्यम् । आद्ये अनेक-
स्वरूपमेकमिति कोऽन्यो वदेदसुस्थात् । द्वितीयस्त्विष्यत
एवास्माभिः, किं तु त्वयेष्यताम् । भ्रान्तिरसाविति चेत्,
तस्यामपि स्वरूपमस्वरूपं वा प्रकाशेत, प्रकारान्तराभावादिति ।
स्यादेतत्, यथाऽतत् तत्तया परिस्फुरदपि न वस्तुगत्या
तदेव, तथा तदप्यतत्तया परिस्फुरदपि नातदेव । अतः स्वरू-
पस्यातत्तया प्रथनेऽपि न काचिद् ग्राह्यलक्षणक्षतिरिति चेत्,
यदि इसमे प्रथम पक्ष मानो तो अनेकत्वको विज्ञानका स्वरूप बताते
हुए 'विज्ञान एक हे' ऐसा प्रमत्तके सिवाय दूसरा कौन कह सकता
है ? द्वितीय पक्ष तो हमें इष्ट ही है । और मैं चाहता हूँ कि तुम्हें
भी इष्ट हो जाय । अर्थात् अनेकत्व यदि ज्ञानका अस्वरूप होता हुआ
ज्ञानमे उल्लिखित हो तो भेदमे भी ग्राह्य ग्राहकभाव होनेसे मेरा अभीष्ट
सिद्ध ही हो गया और तुम्हारे लिये तो यह अत्यन्त अनिष्ट ही
हो गया ।
यदि कहो कि—यह चित्राकार ज्ञान सविकल्पक होनेसे भ्रमात्मक
है, इसलिये उसमे अनेकत्व असत् ही प्रकाशित होता है । अत उससे
ज्ञानगत वास्तविक एकत्वको कोई विरोध नहीं है—तो भ्रान्ति भी ज्ञान
ही है, इसलिये उसमे भी "वह अनेकत्वस्वरूप होकर अथवा अस्वरूप
होकर प्रकाशित होगा" यह पूर्वोक्त विकल्प बना ही रहा । क्योंकि
स्वरूप और अस्वरूपके अतिरिक्त कोई तीसरा प्रकार हो ही नहीं
सकता है ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु, जैसे असत् (अरजत) भी शुक्तिस्वरूप तद्रूप
(रजतस्वरूप) से स्फुरित होता हुआ भी वस्तुत तत् (रजत) ही नहीं
हो जाता, वैसे ही चित्रस्थलमे तद् (एक) भी विज्ञान अतत् (अनेक)
रूपसे स्फुरित होता हुआ भी वस्तुतः अनेक नहीं हो जाता है । अतः
चित्रस्थलमे विज्ञानस्वरूपके नील पीतादि अनेक आकारसे भासित होनेपर
भी विज्ञानस्वरूपकी ग्राह्यतामे कोई क्षति नहीं होती है । अर्थात् जैसे
शुक्ति शुक्तिरूपमे गृहीत हो अथवा रजतरूपमे गृहीत हो, दोनों ही
१३
१९४ आत्मतत्त्वविवेके
यद्यतत्ताऽपि परिस्फुरन्ती स्वरूपमेवास्य स्यात्, स्यादप्य-
स्योपन्यासस्य प्रस्तुतपयोगः । अस्वरूपस्य कथं प्रकाश इति
चेद्, यद्यपि तथा वक्ष्यामः, तथाप्यतत्ता कथं तस्य स्वरूप-
मितीतोऽपि दीयतां दृष्टिः । कश्चास्वरूपस्फुरणे दोषः ?
नायं भिन्नयोर्वेद्यवेदकभावो व्यापारनिबन्धनः, निय-
तस्य तस्याभावात् । नापि तज्जातिनिबन्धनः, कश्चित् कश्चित्
दशाओंमे शुक्तिकी ग्राह्यतामें कोई आँच नहीं आती है, वैसे ही विज्ञान
भी एक आकारमें या नील-पीतादि अनेक आकारोंमे गृहीत होनेपर भी
विज्ञानकी ग्राह्यता अक्षुण्ण रहती है ।
( उत्तरपक्ष ) इस कथनका भी तुम्हारे प्रस्तुत पक्षमे उपयोग तब
होता, जब कि स्फुरित होती हुई अतत्ता ( अनेकता ) भी विज्ञानका
स्वरूप ही होती । क्योंकि स्फुरित होनेवाली अनेकता यदि विज्ञानका
स्वरूप न हो तो "तत्ता या अतत्ता ( एकता या अनेकता ) हर दशामे
विज्ञानस्वरूपका ही स्फुरण होता है" यह तुम्हारा पक्ष ही गिर जायगा ।
यदि कहो कि—अनेकता भी विज्ञानका स्वरूप ही है, क्योंकि
अस्वरूपका ( भिन्नका ) प्रकाश ( स्फुरण ) ही कैसे हो सकता है ?—
तो यद्यपि इसके सम्बन्धमें हम आगे कहेंगे कि "अस्वरूपका ही प्रकाश
होता है", फिर भी अतत्ता ( अनेकता ) उसका स्वरूप कैसे हो सकता
है ? इधर भी तुम्हें दृष्टि देनी चाहिये । अर्थात् एक विज्ञानका
स्वरूप अनेकता नहीं हो सकती है ।
एवं, अस्वरूप ( ज्ञानभिन्न बाह्य ) के स्फुरणमे बाधक ही क्या है ?
अर्थात् कोई बाधक नहीं है ।
( शङ्का ) परस्पर भिन्नोंका यह ग्राह्यग्राहकभाव व्यापाराधीन नहीं
हो सकता । क्योंकि ज्ञानके द्वारा अतीतानागत विषयोंमें अथवा अतीता-
नागत विषयोंके द्वारा ज्ञानमें किसी नियत व्यापारका आधान ही नहीं
हो सकता है । वर्तमान विषयस्थलमें यद्यपि ज्ञान और विषयद्वारा
परस्परका आधान सम्भव है, तथापि वह व्यापार यदि योग्य है, तो
योग्यानुपलब्धि ही उसकी बाधिका है । यदि अयोग्य है, तो उसकी
सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है ।
बाह्यार्थभङ्गवादः १९५
प्रति ज्ञेय इति व्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गात् । न हि निसर्ग-
सिद्धानां गोत्वादीनामीदृशी रीतिरिति चेत्—
नन्वयमभेदेऽपि दोषस्तदवस्थ एव । तथाहि स्वस्य
वेदनमिति नायं व्यापारनिबन्धनो व्यवहारः, स्वात्मनि तद-
भावात् । नापि जातिनिबन्धनः, साधारण्यप्रसङ्गात् । न हि
एवं उक्त ग्राह्यग्राहकभावके प्रति जाति भी नियामक नहीं हो सकती
है । क्योंकि जातिको नियामक माननेकी स्थितिमें "कोई विशेष वस्तु
ही किसी विशेष ज्ञानका विषय होगी" यह व्यवस्था नहीं रह जायगी ।
कारण, गोत्वादि-जातिके सर्वसाधारण होनेसे ऐसी व्यवस्था नहीं अपनाई
जा सकती है । गौ और गोज्ञानमें परस्पर ग्राह्यग्राहकभाव ( विषय-
विषयिभाव ) होनेमें यदि गोत्वजाति नियामक हो तो वह गौ सभी
ज्ञानोंका विषय होने लगेगी । क्योंकि घट-पटादिज्ञानोंकी दशामें भी
गौका गोत्व कायम ही रहता है, नष्ट नहीं हो जाता ।
एवं ग्राह्यग्राहकभावके प्रति विषयगत गोत्वादि-जातिको नियामक
न मानकर ज्ञानगत ज्ञानत्व-जातिको नियामक मानो तो ज्ञानत्व-जातिके
भी सर्वसाधारण होनेसे सभी ज्ञान गोविषयक होने लगेंगे । क्योंकि
घटज्ञान गोकी अपेक्षासे ज्ञानजातीय न हो, ऐसी बात नहीं है । अतः
घटज्ञान जैसे घटविषयक है, वैसे गोविषयक भी होने लगेगा ।
( उत्तर ) निश्चित ही यह दोष तुम्हारे ग्राह्यग्राहकके अभेद-पक्षमें
भी वैसे ही कायम है । क्योंकि "ज्ञान अपना ही ग्राहक होता है,
अपनेसे भिन्न किसी विषयका ग्राहक नहीं होता" यह व्यवहार किसी
व्यापारके अधीन नहीं होगा । क्योंकि अपनेद्वारा अपने ही में किसी
व्यापारका आधान नहीं किया जा सकता है ।
अभेदमें ही उक्तग्राह्यग्राहकभावके होनेमें जाति भी नियामक नहीं हो
सकती है । क्योंकि, जातिके साधारण होनेसे ज्ञानत्व जाति किसी
विशेषमें ग्राह्यग्राहकभावकी नियामिका नहीं हो सकती है । क्योंकि
गोका गोत्व सिर्फ गोज्ञानके प्रति ही है अन्य घटपटादिज्ञानोंके प्रति
नहीं, ऐसा नियम नहीं देखा जाता । ऐसे ही ज्ञानका ज्ञानत्व भी
सबके प्रति साधारण है, इसलिये यह ज्ञान सर्वविषयक होने लगेगा ।
१९६ आत्मतत्त्वविवेके
जात्यैव नो' स्वात्मानं प्रति न तु परं प्रतीति नियमो दृष्टः ।
न च ज्ञानं स्वस्येव परस्यापि वेदनम्, सर्वसर्वज्ञत्वापत्तेः ।
न तत् कस्यचित् , किन्तु वेदनमात्रमिति चेत् , तथापि
स्वात्मन्यजडवत् परत्राप्यजडं स्यात् , परस्मिन्नन्धवत् स्वात्म-
न्यप्यन्धं प्रसज्येत, जात्यैव तद्रूपत्वात् ।
जात्यापि स्वकारणात् क्वचिन्नियतरूपमेव तदुत्पन्नमिति
चेत् , नैवमुच्चैर्ब्रूयाः, परैरपि कदाचिदेवं श्रूयेत ।
यदि कहो कि—जात्या ( स्वभावसे ) ही सभी ज्ञान स्वविषयक ही
होंगे—तो यहाँ स्वका अर्थ एक विज्ञानव्यक्ति लो तो सभी ज्ञान उस
विज्ञानव्यक्तिविषयक हो जायगा । यदि स्वका अर्थ विज्ञानमात्र लो
तो सभी विज्ञान सभी विज्ञानोंके ज्ञाता होने लगेंगे। यहाँ इष्टापत्ति
नहीं कह सकते, क्योंकि तुम्हारे मतमे भी ज्ञान अपना ही ज्ञाता होता
है, न कि दूसरेका भी ।
यदि कहो कि—विज्ञान न परका प्रकाशक होता है और न अपना ।
फिर भी घटादि विषयोंसे विज्ञानमे यही विशेषता है कि विज्ञान वेदन-
मात्र अर्थात् अजडरूप है और घटादि जडरूप हैं—तो भी विज्ञान
जैसे अपने प्रति अजडरूप है, वैसे ही उसे दूसरोंके प्रति भी अजड
होना चाहिये । अथवा वह जैसे घटादिकोंके प्रति अन्ध है, वैसे उसे
अपने प्रति भी अन्ध होना चाहिये । क्योंकि जातिवशात् वह एक जगह
जिसरूपसे होगा, दूसरी जगह भी स्वजातिका परित्याग न होनेसे उसी-
रूपका होगा ।
यदि कहो कि—स्वजातिका परित्याग न करनेपर भी अपने कारणके
प्रभावसे वह कहीं नियतरूपमे ही उत्पन्न होगा न कि सर्वत्र । अर्थात्
विज्ञान स्वकारणबलसे अपने प्रति ही अजडरूप होगा, घटादिके प्रति
नहीं—तो ऐसी बात ऊँचे स्वरसे न बोलना, क्योंकि दूसरा भी कहीं इसे
सुन लेगा । अर्थात् भेदमें भी ग्राह्यग्राहकभाव होनेमे स्वकारण ही
नियामक हो जायगा । अतः भेदपक्षमे भी कोई अतिप्रसङ्गादि दोष
नहीं आ सकेगा ।
१७
अभेदोऽस्तु मा वा, भेदं तु प्रकाशमानत्वेन व्यासेधाम
इति चेन्, न, वस्तुनि भेदनिवृत्तेरेवाभेदरूपत्वात् ।
अस्तु तर्हि भेदाभेदविधुरमेव चित्रम्, चेतोभेदे प्रकाश-
मानत्वायोगात्, अभेदे चित्रत्वानुपपत्तेरिति चेत्, न, मिथो-
विरुद्धविधिद्वयविधानवत् तदुभयनिषेधस्याप्येकत्र विरुद्धत्वात् ।
न च सोऽप्यस्त्विति वाच्यम्, स्याद्वादावतारे तवापि दिगम्ब-
रत्वप्रसङ्गात् ।
यदि कहो कि—विषयके साथ विज्ञानका अभेद हो या मत हो किन्तु
विषयका प्रकाशक होनेके कारण उसमे ज्ञानके भेदका हम प्रतिषेध करते
हैं—तो वस्तुमे भेदकी निवृत्ति ही तो अभेद है। इसलिये यह कथन
भी पूर्वोक्तके तुल्य ही हुआ। अत पूर्वोक्त दोष ज्योंके त्यों स्थिर
रह गये।
(पूर्वपक्ष) यदि पूर्वकथन ठीक नहीं है तो भेद और अभेदसे
रहित ही चित्र माना जाय। क्योंकि यदि नील-पीतादि विषय विज्ञानसे
भिन्न हो तो वह विज्ञानद्वारा प्रकाशित नहीं हो सकता है। और यदि
अभिन्न हो तो विज्ञानसे अभिन्न होनेके कारण वे नील और पीतादि
आपसमे भी अभिन्न ही हो जायेंगे। इससे उनकी चित्रता भग्न
हो जायगी।
(उत्तरपक्ष) इस प्रकारका प्रतिपादन भी ठीक नहीं है। क्योंकि
जैसे परस्पर विरोधी दो विधियोंका एकमें विधान नहीं हो सकता है,
वैसे ही परस्पर विरोधी दो विधियोंका एक जगह निषेध भी नहीं हो
सकता है। यहाँ यह नहीं कह सकते कि “विरोधी दो विधियोंका एक
जगह निषेध भी रहे और निषेधके रहनेमे जो विरोध आता है, वह
विरोध भी रहे, क्या हानि है?” क्योंकि हरेक अनिष्टापत्तिको यदि इष्ट
ही मानते जायो तो इस प्रकारके स्याद्वादका अङ्गीकार करनेसे अपने
बौद्धपनसे सन्यास लेकर तुझे भी दिगम्बर (जैन) बन जाना पड़ेगा।
यदि कहो कि—भेदविधि, अभेदविधि, भेदनिषेध और अभेदनिषेध
इन चारों कोटियोंसे विनिर्मुक्त ही चित्राकार हो। ऐसा होनेमें कोई
१९८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि चतुःशिखरशून्यमेव चित्रम्, आश्चर्य्यरूप-
त्वात्, एकानेकत्वविरहेऽपि सत्त्वमित्याश्चर्य्यार्थो हि चित्रशब्द
इति चेन्, अथ चतुःशिखरशेखरमेव किं न स्यात् ? आश्चर्य्य-
रूपतायुक्तस्तुल्यत्वात् । एकैकपक्षानुपपत्तिश्च यथा तन्निषेध-
पर्य्यवसायिनी तथा तदितरविधिपर्य्यवसायिन्यपि स्यादिति ।
अपि चात्र वस्तुतश्चतुष्कोटिविरहे चेतसो भाषान्तरेणे-
दमुक्तम्, यदनात्मान एवैताश्चतस्रः कोट्यो भासन्ते न वा
प्रतिभान्तीति । तत्र प्रतिभासनमनुत्तरम् । प्रतिभासने तु ग्राह्य-
बाधा भी नहीं है, क्योंकि इसे हम आश्चर्य्यरूप मानते हैं। कारण,
भेद और अभेदके अभावमें भी अस्तित्वका होनारूप आश्चर्य अर्थमें
ही यहाँपर चित्रशब्द प्रयुक्त है—तो पूर्वोक्त चतुष्कोटिकी प्रधानता ही
चित्रमें क्यों न होवे । क्योंकि आश्चर्य्यरूपतावाली युक्ति इस पक्षमें भी
समान ही है।
यदि कहो कि—एक एक कोटिके न हो सकनेसे सभी कोटियोंका
अभाव हो जाता है, इस प्रकार चित्रमें चतुष्कोटिशून्यता सिद्ध हो जाती
है—तो एक एक कोटिके न हो सकनेसे उस उससे भिन्न दूसरी दूसरी
कोटिकी सत्ता भी तो सिद्ध हो सकती है। इसप्रकार चारों कोटियों
की प्रधानता ही क्यों न सिद्ध हो सकती है ?
एव चित्रज्ञानके वस्तुत उक्त चारों कोटियोंसे रहित होनेकी दशामे
दो तरहकी बातें कही जा सकती हैं कि चित्रज्ञानसे भिन्न चारों कोटियाँ
भासित होती हैं या नहीं भासित होतीं । यदि कहो कि—चित्रज्ञानमें
चतुष्कोटियोंका यदि भान नहीं होता है तो यहाँ चतुष्कोटिशब्दका
प्रयोग भी कैसे हो सकेगा ? यदि चतुष्कोटियोंका भान मानो तो ग्राह्य-
लक्षणके अभावमें भी उन्हें ग्राह्य मानते हो, यह एक द्वितीय चित्र हो
गया । अर्थात् तुम्हारे मतमें ज्ञानसे अभिन्नका ही भान होता है
और यहाँपर चतुष्कोटियोंके ज्ञानसे भिन्न होनेपर भी भान मान लिया ।
अत यह द्वितीय चित्र है ।
इसप्रकार तुम्हें चतुष्कोटियोंके भानके अनुरोधसे एकचित्रके बदले
लक्षणायोगेऽपि ग्राह्यभाव इति चित्रमेतत् । तथा च चित्रा-
द्वैताद्वरं चित्रद्वैतमस्तु प्रतिभासानुरोधादिति ।
स्यादेतत्, बहिरन्तरुभयथापि ग्राह्यलक्षणक्षतिरस्तु ।
प्रकाशमानत्वं तु नीलादीनामशक्यापह्नवम् । तावन्मात्रं
चास्माकमभिमतमिति चेत्, तदेतद् विक्रीतगवीरक्षणम् ।
किमिद(हि) प्रकाशमानत्वं यत् सर्वथा ग्राह्यलक्षणक्षतावपि न
क्षीणम् । न प्रकाशसम्बन्धः, नियमानुपपत्तेरित्युक्तम् । न
प्रकाशतादात्म्यम्, चित्रत्वानुपपत्तेरित्युक्तम् ।
दो चित्र मानने होंगे। एक यह कि अभेदरूप ग्राह्यलक्षणके अभावमें
भी चतुष्कोटियों को ग्राह्य माना। दूसरा चित्र यह हुआ कि वह ग्रहण
भी पूर्ववत् विषयके भेद और अभेद दोनोंसे रहित होगा।
(शङ्का) अस्तु, ज्ञानसे भिन्न या अभिन्न दोनों ही रूपोंमे नील
पीतादि विषय ग्राह्यलक्षणसे रहित भले ही हो, फिरभी नीलादिकी प्रकाश-
मानता तो नहीं छिपायी जा सकती है, और उतना ही हमारा अभीष्ट भी
है। अर्थात् "नीलादि विषय प्रकाश ( ज्ञान ) स्वरूप है" यह बात उसके
प्रकाशमान होनेमात्रसे ही सिद्ध हो जाती है।
(उत्तर) इसप्रकारका कथन बेंच दी गयी गौको पुन रखनेके
समान है। अर्थात् नीलादिकमे ग्राह्यलक्षणका अभाव स्वीकार करते
हुए तुम ही उसमें प्रकाशमानत्वको समाप्त कर चुके हो और पुन
नीलादिको ज्ञानाभिन्न सिद्ध करनेके लिये तुम ही नीलादिमे प्रकाश-
मानत्वको हेतु बना रहे हो। अतः तुम्हारी यह प्रक्रिया विक्रीत-
गवीरक्षणके समान हुई। एव, यह कैसा प्रकाशमानत्व है, जो ग्राह्य-
लक्षणके अभावमे भी नीलादिमें कायम रहा। यदि कहो कि प्रकाशसे
सम्बन्ध होना ही प्रकाशमानत्व है, तो तुम ही कह चुके हो कि
"नीलादिका ही प्रकाशसे सम्बन्ध होगा पीतादिका नहीं" यह नियम
नहीं हो सकता। अतः नीलकालमे पीतकी प्रतीति और पीतकालमें
नीलकी प्रतीति होने लगेगी।
यदि कहो कि—प्रकाशके साथ तादात्म्य होना ही नीलादिका प्रकाश-
मान होना है—तो इसके सम्बन्धमें मैं कह चुका हूँ कि चित्रज्ञानकी
२०० आत्मतत्त्वविवेके
तस्मान्नीलादीनां प्रकाशमानत्वं परिपालयता ग्राह्यलक्षणे
यत्नः कर्तव्यः परिहर्तव्यं वा प्रकाशमानत्वम् । अन्यथा तप-
नीयमपनीय वाससि ग्रन्थिकर्त्तारमुपहससि, स्वयं च गगना-
ञ्चले ग्रन्थि करोषीति । सेयं सर्वप्रकारमसिद्धिः सर्वप्रकारश्चा-
नैकान्तिकत्वमिति ।
एकता भग्न हो जायगी । अर्थात् चित्रात्मक ज्ञान यद्यपि एक होता है
किन्तु नील पीत, हरित, श्वेत आदि विभिन्न विषयोंसे तादात्म्य होनेके
कारण वह चित्रज्ञान एक न होकर विषयभेदसे भिन्न भिन्न अनेक ज्ञान
हो जायगा, जो अनुभव विरुद्ध है ।
अतः नीलादिमे यदि प्रकाशमानत्व की रक्षा चाहते हो तो उसमे
ग्राह्यलक्षणके लिये यत्न करना पडेगा । अर्थात् भेदमे भी विषय-
विषयिभाव मानना होगा नहीं तो नीलादिमे प्रकाशमानत्वका परि-
त्याग कर देना पडेगा । यदि ऐसा नहीं करते हो तो यही कहा
जायगा कि सुवर्ण फेंककर खाली वस्त्रमे गठरी बाँधनेवालेको तुम
हँस रहे हो और स्वय कनक लेकर भी आकाशमें गाँठ बाँधते हो ।
अर्थात् ज्ञानश्रीके मतानुसार नीलादिका ज्ञानाकार होना ही स्वर्ण है,
जिसे नैयायिक छोड देता है । तथा बाह्य वस्तुका स्वीकार करना ही
वस्त्रमे गाँठ देना है, जिसे नैयायिक अपनाता है । यही ज्ञानश्रीके
उपहासका अभिप्राय है । जिसका उत्तर नैयायिक भी उपहासके द्वारा
ही देता है कि अपने स्वर्ण को लेकर भी ज्ञानश्री वस्त्रमे गाँठ न बाँधकर
आकाशमे ही गाँठ बाँधता है । क्योंकि जैसे भेदमे ग्राह्यलक्षणका
अभाव है, वैसे ही अभेदमे भी ग्राह्यलक्षणका अभाव है, इसप्रकार
सर्वथा ग्राह्यलक्षणाभावमे भी नीलादिमे प्रकाशमानत्व मानना ही
आकाशमें गाँठ देनेके समान है, जिसे ज्ञानश्री अपनाये हुए है ।
इसप्रकार यहाँ बौद्धके अनुमानमे सभी प्रकारसे असिद्धि एव सभी
प्रकारसे व्यभिचार दोष आ जाता है अर्थात् “नील ज्ञानाभिन्न, प्रकाश-
मानत्वात्, सहोपलम्भाद् वा” इस अनुमानमें नीलादि-बाह्यको नहीं
माननेके कारण नीलस्वरूप पक्षके असिद्ध होनेसे आश्रयासिद्धि हुई ।
भेद और अभेद दोनों ही स्थितियोंमें ग्राह्य-लक्षणका अभाव होनेसे
प्रकाशमानत्व आदि हेतु असिद्ध हैं । अतः स्वरूपासिद्धि हुई ।
एतेन द्वितीयः पक्षः प्रत्युक्तः । न हि सजातीयत्वेन
ग्राह्यलक्षणवैधुर्यमुत्सार्यते, अतिप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात् ।
जडत्वे प्रकाशासम्भवेनेति चेत्, न, तुल्यत्वात् । यथा
तथा ज्ञानाभेदको साध्य करनेमे ज्ञानवृत्ति 'यावद्धर्मवत्त्व उपाधि है,
इसलिए सोपाधिक होनेमे व्याप्यत्वासिद्धि हुई । एवं प्रकाशमानत्वादि
हेतुके अलीक भेदमे भी चले जानेके कारण साधारण व्यभिचार हुआ ।
अथवा पूर्वोक्त रीतिसे सपक्ष विपक्ष दोनों ही से प्रकाशमानत्व हेतुके
व्यावृत्त होनेके कारण असाधारण व्यभिचार हुआ । एवं सभी पदार्थको
पक्ष माननेके कारण अनुपसंहारीनामक व्यभिचार दोष हुआ ।
इससे द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो जाता है । अर्थात् लक्षणका
अभाव होनेसे नीलादि विषय जैसे ज्ञानसे अभिन्न नहीं सिद्ध होता,
वैसे ही यह ज्ञान से अभिन्नजातीय भी नहीं सिद्ध हो सकता है ।
क्योंकि सजातीय माननेसे भी नीलादिमे ग्राह्यलक्षणका अभाव नहीं
हटता है । कारण, सजातीय ही यदि ग्राह्य हो तो तुम्हारे मतानुसार
घटपट आदि सभी विषय एकसा ज्ञानके सजातीय हैं । इसलिये
जिस ज्ञानमें पट विषय हो रहा है, उसमें घट भी अनिवार्यतः विषय
होने लगेगा । इसप्रकार अतिप्रसङ्ग दोष यथास्थित ही रह जाता है ।
यदि कहो कि--नीलादि-विषयको ज्ञान-सजातीय न मानकर जड़
माना जाय तो उसका प्रकाश ही नहीं हो सकता है । अर्थात् नीलादि
चूँकि प्रकाशमान होता है, इसीलिये यह ज्ञान सजातीय सिद्ध हो
१. जो साध्यका व्यापक हो और साधनका अव्यापक हो, उसे उपाधि
कहते हैं । प्रकृतमे नीलादि-विषयमे ज्ञानाभिन्नत्व साध्य है और प्रकाश-
मानत्व हेतु है । जो जो ज्ञानाभिन्न होता है, उस उसमे ज्ञानवृत्ति-
यावद्धर्मवत्त्व होता है । इसप्रकार ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्व उपाधि साध्य-
व्यापक हुआ । तथा जो जो प्रकाशमान हैं, उस उसमे ज्ञानवृत्तिया-
वद्धर्मवत्त्व नही रहता, जैसे घटादिमे । अतः साधनाव्यापक भी हुआ ।
इसप्रकार प्रकृत अनुमानमे ज्ञानवृत्तियावद्धर्मवत्त्वके उपाधि होनेसे
यहांका हेतु सोपाधिक होकर व्याप्यत्वासिद्ध हुआ ।
२०२ आत्मतत्त्वविवेके
ह्यस्वसंवेदनवादिनः परं प्रति प्रकाशमपि ज्ञानमात्मनि जड-
मेव, तथा स्वसंवेदनवादिनोऽपि स्वात्मनि प्रकाशमपि ज्ञानं
परं प्रति जडमेव । कथञ्चिद् बुद्ध्यन्तरेऽप्यजड चेत् , बाह्येऽपि
तथा किं न स्यादिति सन्दिग्धविपक्षवृत्तित्वम् ।
ननु बाह्ये सर्वथैव ग्राह्यलक्षणक्षतिः, इह तु समानोपादान-
तानियमेन चित्राकाराणां परमार्थभिन्नानामेव व्यतिवेदन-
सिद्धि; न, मिथः प्रथानियमे ह्युपादानमुखेन सामान्यतो वा
जायगा-तो यह नहीं कह सकते हो । क्योंकि वह बात ज्ञानके सम्बन्धमें
भी समान ही है । क्योंकि जैसे ज्ञानको अस्वप्रकाश माननेवाले
नैयायिकोंके यहाँ विषयोंके प्रति प्रकाशात्मक भी ज्ञान अपने प्रति जड़ ही
होता है, वैसे ही ज्ञानको स्वप्रकाश माननेवाले बौद्धोंके यहाँ भी अपने
लिये प्रकाशात्मक भी ज्ञान अपनेसे भिन्न ज्ञानके प्रति जड ही होता है ।
अर्थात् स्वप्रकाश होनेके कारण ज्ञान अपनेको तो भासित कर देता है
किन्तु अन्य ज्ञानको भासित करनेमें तो वह भी जड ही है । अतः
जैसे जड होते हुए भी ज्ञानका प्रकाश (भान) असम्भव नहीं
है, वैसे ही जड होते हुए भी नीलादि-विषयका भी भान असम्भव
नहीं होगा ।
यदि कथञ्चित् अन्य ज्ञानके प्रति भी वह ज्ञान अजड ही हो तो
नीलादि बाह्यविषयोंके प्रति भी वह अजड़ क्यों न होगा ? अर्थात्
अपनेसे भिन्न होते हुए भी नीलादि विषयको ज्ञान प्रकाशित कर
दे सकता है । इस प्रकार "नीलादिकं ज्ञानसजातीयं प्रकाशमान
त्वात्" इस अनुमानमे प्रकाशमानत्व हेतुमे विपक्षवृत्तित्वका सन्देह हो
जाता है ।
"बाह्यपक्षमें अर्थात् ग्राह्य ग्राहकके भेदपक्षमें अतिप्रसङ्ग दोषसे
सर्वथा ही ग्राह्यत्वका अभाव हो जाता है । चित्रप्रत्ययके अनुरोधसे
अभेदपक्ष भी असम्भव है। अतः ग्राह्य ग्राहकभावका नियामक यही
मानना चाहिये कि—जो परस्पर समानोपादानक हो अर्थात् जिनका
उपादानकारण समान हो, वे परस्पर ग्राह्य ग्राहक होते हैं-इससे परस्पर
बाह्यार्थभङ्गवाद [२०३]
सामग्रीसामर्थ्यमेव वक्तव्यम्, अन्यथा तथाविधकार्यानुत्पत्तेः ।
तथा च बाह्यग्राह्यनियतस्वभावज्ञानोत्पत्तावपि सुलभमेतदिति
पूर्वक्त एव दोषः ।
अस्तु तर्हि तृतीयः, सर्वथा ग्राह्यलक्षणानुपपत्तेः । तद-
भावे सामग्रीसामर्थ्यस्याप्याश्रयितुमशक्यत्वात् । विचारसिद्धे
हि वस्तुनि कारणचिन्तनावसरो न त्वविवेचित इति चेत्, कि
भिन्न भी नीलपीतादि चित्राकारोंका पारस्परिक ज्ञान हो जायगा ।
कारण, नीलपीतादि आकारोंका उपादान कारण एक ही ज्ञान है" ।
किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि परमार्थत भिन्नोंका
भी पारस्परिक ज्ञान होनेका नियामक सामग्रीगत अपनी सामर्थ्य ही
माननी पड़ेगी । वह सामर्थ्य चाहे विशेष रूपसे उपादानकारणकी हो
अथवा सामान्यरूपसे कारणमात्रकी हो । अर्थात् चित्रस्थलमे भेदमे
भी ग्राह्य ग्राहकभाव तुमने भी मान ही लिया । अन्तर इतना ही है
कि तुम उसका नियामक समानोपादान मानते हो और मैं कारणगत
सामर्थ्यविशेषको ही उसका नियामक मानता हूँ । एसा माने बिना
नियतकार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती है ।
इसप्रकार बाह्यवस्तुको ग्राह्य माननेमें भी उसका नियमित ज्ञान
होनेमे उक्त सामग्रीसामर्थ्य नियामक हो सकता है । अतः पूर्वोक्त
प्रकारसे यहाँ भी संदिग्धविपक्षवृत्तित्वरूप सन्दिग्धव्यभिचार दोष आ
ही जाता है । इसतरह सजातीयत्वरूप द्वितीयपक्ष भी खण्डित हो
जाता है ।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोनों पक्षोंके असंभव होनेसे तीसरा पक्ष
ही मानने योग्य है । इस पक्षम ग्राह्य अंश अलीक है और ग्राहकांश
(ज्ञान) ही वास्तविक है । क्योंकि बाह्यवस्तुमे किसी भी प्रकारसे
ग्राह्य का कोई लक्षण नहीं बन सकता है । अर्थात् नीलादि ग्राह्यपदार्थको
पूर्वपद्धतिके अनुसार ज्ञानसे भिन्न या अभिन्न कुछ नहीं कह सकते ।
और ग्राह्यलक्षणके नही होनेसे ग्राह्यरूप लक्ष्य असंभव होगा । एसी
परिस्थितिमें नियतवस्तुके ग्रहणके लिये सामग्रीगत सामर्थ्यका सहारा
लेना भी अशक्य है । क्योंकि विचारद्वारा जो वस्तु सिद्ध है, उसी
ग्राह्यलक्षणानिर्वक्तव्यतया प्रकाशमानत्वमपीषां निवर्तते ?
सत्त्वं वा ?
न प्रथम, न हि लक्षणापरिज्ञानमात्रेण स्पष्टदृष्टमपि
लक्ष्यमपह्नोतुं शक्यते, अपरिज्ञानस्य दुरूहतयाप्युपपत्तेः ।
तेषामप्रतिभासे तन्निषेधस्यानुपपत्तेः ।
न द्वितीय, तदा हि तल्लक्षणानुपपत्तिः सत्त्वं निवर्तयेत्
यद्यसत्त्वे लक्षणमुपपद्येत । उभयथाप्यनुपपत्तौ कोऽनुरागोऽ
के सम्बन्धमे करण ( सामग्री ) चिंताका अवसर आता है, न कि
उसके सम्बन्धम, जो वस्तु ही असिद्ध है-तो यहाँ मैं पूछता हूँ कि
ग्राह्यलक्षणका निर्वचन नहीं हो सकनेसे क्या बाह्य पदार्थोकी प्रकाश-
मानता ( प्रतीति ) खण्डित हो जाती है ? अथवा उनकी सत्ता
( अस्तित्व ) का खण्डन हो न ता है ?
यहाँ प्रथमपक्ष नहीं हो सकता है । क्योकि केवल लक्षणका ज्ञान
नहीं हो सकनेके कारणमात्रसे स्पष्टरूपसे दीख पडने वाले भी लक्ष्यका
अपलाप नहीं किया जा सकता है । कारण वस्तुका अज्ञान तो उसकी
दुर्ज्ञेयताके कारण भी हो सकता है । साथ ही यदि बाह्यवस्तुकी प्रतीति
न हो तो उसमें ग्राह्यलक्षणका निषेध भी नहीं किया जा सकता है ।
इसलिये ग्राह्य लक्षणका निषेध करनेके लिये भी अनुयोगके रूपमें
बाह्यवस्तुकी प्रतीति मानना पडेगी ।
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि लक्षणकी अनुपपत्तिसे
वस्तुसत्ताकी निवृत्ति तभी होती यदि उसकी असत्त होनेसे लक्षण बन
जाता । यदि सत्ता या असत्ता दोनों दशाओंमें लक्षण न बन सकता हो
तो असत्ताके प्रति ही क्या अनुराग है ?
यदि कहो कि—असत्त्व ही ग्राह्यका लक्षण है—तो सत्त्व ही लक्षण
क्यों न होगा ?
यदि कहो कि—सत्त्वको ग्राह्यका लक्षण माननेमें भी तो वही दोष
है । अर्थात् जैसे, सत्त्वको ग्राह्य का लक्षण माननेपर किसी एक सद्वस्तुके
बाह्यार्थभङ्गवादः २०५
सत्त्वे। तदेव लक्षणमिति चेत्, सत्त्वमेव किं न स्यात् ?
अतिप्रसङ्गादिति चेत्, तुल्यम्।
वेदनाधीनव्यवहारगोचरत्वमिति चेत्, अस्तु तावदिदम्,
तस्यैवेति तु नियमः कुतः? सामग्रीतस्तथा वेदनोत्पत्तिरिति
चेत्, तदेतत्, सम्भाव्यते सति, न त्वसतीति विशेषः। यथा
हि सति ज्ञानेनाभिलापः, तेन यत्नः, तेन प्रवृत्तिः, तया
तत्प्राप्तिः क्रियते, न तथाऽलीके, तस्य प्राप्तुमशक्यत्वात्,
शक्यत्वे वाऽनलीकत्वात्।
व्यवहारोऽप्ययमलीक इति चेत्, तर्हि सुतरा लक्षणाभावः,
तद्द्वारस्याप्यभावात्।
ज्ञान होनेपर सत्के नाते अन्य सभी सत्पदार्थोंका भान होने लगेगा,
वैसे ही असत्को ग्राह्यका लक्षण माननेपर भी किसी एक असत्का ज्ञान
होनेपर असत्के नाते भी अन्य सभी असत्पदार्थोंका भी भान होने
लगेगा। इस प्रकार दोनों ही पक्षोंमें समान न्याय है।
यदि कहो कि—ज्ञानजन्यव्यवहारविषयत्व ही ग्राह्यका लक्षण है,
अर्थात् ज्ञानके कारण ही जिसका व्यवहार होता है, उसे ग्राह्य कहते हैं—
तो यह लक्षण भले ही हो, किन्तु घटज्ञानसे घटका ही व्यवहार होगा,
यह नियम कैसे रहेगा ? यदि कहो कि—सामग्रीगत सामर्थ्यका ही ऐसा
प्रभाव है कि उस वस्तुके ज्ञानसे उसी वस्तुका व्यवहार होगा दूसरे
का नहीं—तो यह सामर्थ्य भी सत्पदार्थमे ही सम्भव है न कि असत्मे,
यह विशेषता है।
जैसे कि—सद्वस्तुमें ज्ञान होनेपर इच्छा होती है, इच्छासे प्रयत्न,
प्रयत्नसे प्रवृत्ति तथा प्रवृत्ति होनेपर उस वस्तुकी प्राप्ति हो जाती है, वैसे
अलीक (असन्) वस्तुमे नही होता। क्योंकि उसमे ज्ञान इच्छादिके
होनेपर भी उस मिथ्यावस्तुकी प्राप्ति नहीं की जा सकती है। अर्थात्
प्राप्त हो सकने वाली वस्तु सत् ही होगी।
यदि कहो कि—यह ज्ञान-इच्छा-प्रयत्न-प्रवृत्ति और प्राप्तिरूप
२०६ | आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि सर्वथा विचारासहत्वमेव विश्वस्येति चेत्,
तत् किमिदानीं तत्त्वोपप्लव एव ? काष्ठाशून्यता¹ वा ? न
प्रथम', इयतीं भूमिमारूढस्यापि विचारस्य निष्फलताया
प्रमाणाभावात् । भावे वा कथं तत्त्वोपप्लवः ? अस्यैव विचार-
स्यानुपप्लवात्, तत्समानन्यायस्यान्यस्यापि तथाभावप्राप्तेः,
व्यवहार भी अलीक ही है, इसलिय अलीकमें अलीकव्यवहार होनेमे
कोई बाधा नहीं है—तब तो बड़ी आसानीसे ग्राह्य लक्षणका अभाव हो
गया। क्योंकि लक्षणघटकीभूत व्यवहार ही असिद्ध है। अर्थात्
ज्ञानजन्यव्यवहारविषयत्वरूप ग्राह्यलक्षणमे व्यवहार घटकीभूत (द्वारी
भूत) है, अत व्यवहारके असिद्ध होनेसे तद्घटित सम्पूर्ण लक्षण
असिद्ध हो गया।
यदि कहो कि—सत्त्व, भिन्नत्व या अभिन्नत्व किसी भी रूपमें ग्राह्य
का लक्षण नहीं हो सकनेके कारण विश्वको विचारायोग्य ही क्यों न मान
लिया जाय—तो क्या, इसप्रकार सम्पूर्ण विश्वको विचारके लिये अयोग्य
माननेकी दशामें जगत्की तात्त्विकता ही लुप्त हो जाती है ? अथवा
तात्त्विकता नष्ट होनेसे जगत्का शून्यतामें पर्यवसान हो जाता है ?
अर्थात् जगत् शून्यरूप सिद्ध हो जाता है ? यहाँ प्रथमपक्ष ठीक नहीं
है। क्योंकि यदि सबकुछ अतात्त्विक है तो अबतक इतनी सीढ़ी तक
पहुँचे हुए इस विचारकी भी, जो सर्वान्तर्गत है, तात्त्विकतामे कोई
प्रमाण नहीं है। यदि इस विचारको तात्त्विकताका साधक कोई प्रमाण
हो तो सब अतात्त्विक कैसे हुआ ? क्योंकि यह एक विचार ही तात्त्विक
सिद्ध हो गया। और जिस न्यायसे यह विचार तात्त्विक सिद्ध हुआ,
उसी न्यायसे विचारका विषय आत्मा तथा उसका ज्ञानसे भिन्न और
नित्य विभु आदि होना भी सिद्ध ही हो गया।
साथ ही आपका यह विचारारम्भ भी निष्फल है। क्योंकि अनियत
रूपसे सर्वत्र प्रवृत्ति कराना इस विचारारम्भका फल नहीं हो सकता।
कारण, अनियत प्रवृत्ति होनेमे गगनास्वादनमें भी प्रवृत्ति होने लगेगी।
कि तु उससे तृप्तिरूप फल होता नहीं। ऐसे ही अनियत प्रवृत्तिपक्षमें
१ माध्यमिकपक्षोऽयम् ।
ऽनिष्फलत्वाच्च । न ह्यस्यातिप्रवृत्तिः फलम्, गगनास्वादने-
नातृप्तेः, ज्वाला (अलीक) कलापालिङ्गनेन तापानपनोदनात् ।
नाप्यतिनिवृत्तिः, जडीभावमात्रेऽप्युपनिपातिदुःखानिवृत्तेः ।
न च दुःखमपि विचारासहमित्यहेयमेव, तथाविधस्य-
तापनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्वालासमूहके आलिङ्गनमे भी प्रवृत्ति होने
लगेगी । किन्तु उससे तापकी निवृत्ति हो नहीं सकती । यहाँ पूर्वपक्ष
का अभिप्राय यह है कि जब तात्त्विकदृष्टिसे सब अलीक है तो समानरूप
से अर्थात् अलीकत्वाविशेषात् किसी भी उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये कहीं
भी प्रवृत्ति हो सकती है । ऐसा नहीं कि तृप्ति चाहनेवाला व्यक्ति नियत-
रूपसे भोजनादिमे ही तथा दुःखकी निवृत्ति चाहनेवाला मोक्षार्थी किसी
खास साधनमें ही प्रवृत्त होवे । यही अतिप्रवृत्ति इस विचारारम्भका
फल हुआ । यहाँ उत्तरपक्षका आशय तो स्पष्ट है । अतिनिवृत्ति भी
विचारारम्भका फल नहीं हो सकता है । अर्थात् यह भी नहीं हो
सकता कि इस विचारद्वारा सबको अतात्त्विक समझता हुआ मुमुक्षु
सबसे निवृत्त होकर दुःखसे छुटकारा पा जायगा । क्योंकि सबसे
निवृत्त होकर जडवत् बन जानेपर भी दैवात् आनेवाले दुःखोंसे पिण्ड
नहीं छूट सकता है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—दुःख भी अतात्त्विक है, अतः वह
अहेय (अत्याज्य) ही है । अर्थात् अतिनिवृत्ति ही विचारका फल
है । तथा जडीभूतको दुःख तब अनिष्ट होता, यदि वह तात्त्विक होनेसे
हेय होता । किन्तु वह तो अतात्त्विक होनेसे हेय भी नहीं है—क्योंकि
हेयोपादेयरहितव्यक्तिका विचारमें भी अधिकार नहीं है । अर्थात्
सबकी प्रवृत्ति दुःखहानिके लिये या सुखप्राप्तिके लिये होती है, और
वह उसके लिये ही विचारमें प्रवृत्त होता है । जिसके लिये न
कोई हेय है और न कोई उपादेय है, उसके लिये तो विचार भी
निष्प्रयोजन ही है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—लोकानुसार व्यवस्था ही विचारका
फल है । अर्थात् लोकसिद्ध पदार्थोंके अलावे कोई तात्त्विक नहीं है—