आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः १९३
मिति चेत्, स्वरूपमस्वरूपं वेति वाच्यम् । आद्ये अनेक-
स्वरूपमेकमिति कोऽन्यो वदेदसुस्थात् । द्वितीयस्त्विष्यत
एवास्माभिः, किं तु त्वयेष्यताम् । भ्रान्तिरसाविति चेत्,
तस्यामपि स्वरूपमस्वरूपं वा प्रकाशेत, प्रकारान्तराभावादिति ।
स्यादेतत्, यथाऽतत् तत्तया परिस्फुरदपि न वस्तुगत्या
तदेव, तथा तदप्यतत्तया परिस्फुरदपि नातदेव । अतः स्वरू-
पस्यातत्तया प्रथनेऽपि न काचिद् ग्राह्यलक्षणक्षतिरिति चेत्,
यदि इसमे प्रथम पक्ष मानो तो अनेकत्वको विज्ञानका स्वरूप बताते
हुए 'विज्ञान एक हे' ऐसा प्रमत्तके सिवाय दूसरा कौन कह सकता
है ? द्वितीय पक्ष तो हमें इष्ट ही है । और मैं चाहता हूँ कि तुम्हें
भी इष्ट हो जाय । अर्थात् अनेकत्व यदि ज्ञानका अस्वरूप होता हुआ
ज्ञानमे उल्लिखित हो तो भेदमे भी ग्राह्य ग्राहकभाव होनेसे मेरा अभीष्ट
सिद्ध ही हो गया और तुम्हारे लिये तो यह अत्यन्त अनिष्ट ही
हो गया ।
यदि कहो कि—यह चित्राकार ज्ञान सविकल्पक होनेसे भ्रमात्मक
है, इसलिये उसमे अनेकत्व असत् ही प्रकाशित होता है । अत उससे
ज्ञानगत वास्तविक एकत्वको कोई विरोध नहीं है—तो भ्रान्ति भी ज्ञान
ही है, इसलिये उसमे भी "वह अनेकत्वस्वरूप होकर अथवा अस्वरूप
होकर प्रकाशित होगा" यह पूर्वोक्त विकल्प बना ही रहा । क्योंकि
स्वरूप और अस्वरूपके अतिरिक्त कोई तीसरा प्रकार हो ही नहीं
सकता है ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु, जैसे असत् (अरजत) भी शुक्तिस्वरूप तद्रूप
(रजतस्वरूप) से स्फुरित होता हुआ भी वस्तुत तत् (रजत) ही नहीं
हो जाता, वैसे ही चित्रस्थलमे तद् (एक) भी विज्ञान अतत् (अनेक)
रूपसे स्फुरित होता हुआ भी वस्तुतः अनेक नहीं हो जाता है । अतः
चित्रस्थलमे विज्ञानस्वरूपके नील पीतादि अनेक आकारसे भासित होनेपर
भी विज्ञानस्वरूपकी ग्राह्यतामे कोई क्षति नहीं होती है । अर्थात् जैसे
शुक्ति शुक्तिरूपमे गृहीत हो अथवा रजतरूपमे गृहीत हो, दोनों ही
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