आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि चतुःशिखरशून्यमेव चित्रम्, आश्चर्य्यरूप-
त्वात्, एकानेकत्वविरहेऽपि सत्त्वमित्याश्चर्य्यार्थो हि चित्रशब्द
इति चेन्, अथ चतुःशिखरशेखरमेव किं न स्यात् ? आश्चर्य्य-
रूपतायुक्तस्तुल्यत्वात् । एकैकपक्षानुपपत्तिश्च यथा तन्निषेध-
पर्य्यवसायिनी तथा तदितरविधिपर्य्यवसायिन्यपि स्यादिति ।
अपि चात्र वस्तुतश्चतुष्कोटिविरहे चेतसो भाषान्तरेणे-
दमुक्तम्, यदनात्मान एवैताश्चतस्रः कोट्यो भासन्ते न वा
प्रतिभान्तीति । तत्र प्रतिभासनमनुत्तरम् । प्रतिभासने तु ग्राह्य-
बाधा भी नहीं है, क्योंकि इसे हम आश्चर्य्यरूप मानते हैं। कारण,
भेद और अभेदके अभावमें भी अस्तित्वका होनारूप आश्चर्य अर्थमें
ही यहाँपर चित्रशब्द प्रयुक्त है—तो पूर्वोक्त चतुष्कोटिकी प्रधानता ही
चित्रमें क्यों न होवे । क्योंकि आश्चर्य्यरूपतावाली युक्ति इस पक्षमें भी
समान ही है।
यदि कहो कि—एक एक कोटिके न हो सकनेसे सभी कोटियोंका
अभाव हो जाता है, इस प्रकार चित्रमें चतुष्कोटिशून्यता सिद्ध हो जाती
है—तो एक एक कोटिके न हो सकनेसे उस उससे भिन्न दूसरी दूसरी
कोटिकी सत्ता भी तो सिद्ध हो सकती है। इसप्रकार चारों कोटियों
की प्रधानता ही क्यों न सिद्ध हो सकती है ?
एव चित्रज्ञानके वस्तुत उक्त चारों कोटियोंसे रहित होनेकी दशामे
दो तरहकी बातें कही जा सकती हैं कि चित्रज्ञानसे भिन्न चारों कोटियाँ
भासित होती हैं या नहीं भासित होतीं । यदि कहो कि—चित्रज्ञानमें
चतुष्कोटियोंका यदि भान नहीं होता है तो यहाँ चतुष्कोटिशब्दका
प्रयोग भी कैसे हो सकेगा ? यदि चतुष्कोटियोंका भान मानो तो ग्राह्य-
लक्षणके अभावमें भी उन्हें ग्राह्य मानते हो, यह एक द्वितीय चित्र हो
गया । अर्थात् तुम्हारे मतमें ज्ञानसे अभिन्नका ही भान होता है
और यहाँपर चतुष्कोटियोंके ज्ञानसे भिन्न होनेपर भी भान मान लिया ।
अत यह द्वितीय चित्र है ।
इसप्रकार तुम्हें चतुष्कोटियोंके भानके अनुरोधसे एकचित्रके बदले