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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 530 में से

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पृष्ठ 244

बाह्यार्थभङ्गवादः १९५
प्रति ज्ञेय इति व्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गात् । न हि निसर्ग-
सिद्धानां गोत्वादीनामीदृशी रीतिरिति चेत्—
नन्वयमभेदेऽपि दोषस्तदवस्थ एव । तथाहि स्वस्य
वेदनमिति नायं व्यापारनिबन्धनो व्यवहारः, स्वात्मनि तद-
भावात् । नापि जातिनिबन्धनः, साधारण्यप्रसङ्गात् । न हि
एवं उक्त ग्राह्यग्राहकभावके प्रति जाति भी नियामक नहीं हो सकती
है । क्योंकि जातिको नियामक माननेकी स्थितिमें "कोई विशेष वस्तु
ही किसी विशेष ज्ञानका विषय होगी" यह व्यवस्था नहीं रह जायगी ।
कारण, गोत्वादि-जातिके सर्वसाधारण होनेसे ऐसी व्यवस्था नहीं अपनाई
जा सकती है । गौ और गोज्ञानमें परस्पर ग्राह्यग्राहकभाव ( विषय-
विषयिभाव ) होनेमें यदि गोत्वजाति नियामक हो तो वह गौ सभी
ज्ञानोंका विषय होने लगेगी । क्योंकि घट-पटादिज्ञानोंकी दशामें भी
गौका गोत्व कायम ही रहता है, नष्ट नहीं हो जाता ।
एवं ग्राह्यग्राहकभावके प्रति विषयगत गोत्वादि-जातिको नियामक
न मानकर ज्ञानगत ज्ञानत्व-जातिको नियामक मानो तो ज्ञानत्व-जातिके
भी सर्वसाधारण होनेसे सभी ज्ञान गोविषयक होने लगेंगे । क्योंकि
घटज्ञान गोकी अपेक्षासे ज्ञानजातीय न हो, ऐसी बात नहीं है । अतः
घटज्ञान जैसे घटविषयक है, वैसे गोविषयक भी होने लगेगा ।
( उत्तर ) निश्चित ही यह दोष तुम्हारे ग्राह्यग्राहकके अभेद-पक्षमें
भी वैसे ही कायम है । क्योंकि "ज्ञान अपना ही ग्राहक होता है,
अपनेसे भिन्न किसी विषयका ग्राहक नहीं होता" यह व्यवहार किसी
व्यापारके अधीन नहीं होगा । क्योंकि अपनेद्वारा अपने ही में किसी
व्यापारका आधान नहीं किया जा सकता है ।
अभेदमें ही उक्तग्राह्यग्राहकभावके होनेमें जाति भी नियामक नहीं हो
सकती है । क्योंकि, जातिके साधारण होनेसे ज्ञानत्व जाति किसी
विशेषमें ग्राह्यग्राहकभावकी नियामिका नहीं हो सकती है । क्योंकि
गोका गोत्व सिर्फ गोज्ञानके प्रति ही है अन्य घटपटादिज्ञानोंके प्रति
नहीं, ऐसा नियम नहीं देखा जाता । ऐसे ही ज्ञानका ज्ञानत्व भी
सबके प्रति साधारण है, इसलिये यह ज्ञान सर्वविषयक होने लगेगा ।