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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 530 में से

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पृष्ठ 245

१९६ आत्मतत्त्वविवेके
जात्यैव नो' स्वात्मानं प्रति न तु परं प्रतीति नियमो दृष्टः ।
न च ज्ञानं स्वस्येव परस्यापि वेदनम्, सर्वसर्वज्ञत्वापत्तेः ।
न तत् कस्यचित् , किन्तु वेदनमात्रमिति चेत् , तथापि
स्वात्मन्यजडवत् परत्राप्यजडं स्यात् , परस्मिन्नन्धवत् स्वात्म-
न्यप्यन्धं प्रसज्येत, जात्यैव तद्रूपत्वात् ।
जात्यापि स्वकारणात् क्वचिन्नियतरूपमेव तदुत्पन्नमिति
चेत् , नैवमुच्चैर्ब्रूयाः, परैरपि कदाचिदेवं श्रूयेत ।
यदि कहो कि—जात्या ( स्वभावसे ) ही सभी ज्ञान स्वविषयक ही
होंगे—तो यहाँ स्वका अर्थ एक विज्ञानव्यक्ति लो तो सभी ज्ञान उस
विज्ञानव्यक्तिविषयक हो जायगा । यदि स्वका अर्थ विज्ञानमात्र लो
तो सभी विज्ञान सभी विज्ञानोंके ज्ञाता होने लगेंगे। यहाँ इष्टापत्ति
नहीं कह सकते, क्योंकि तुम्हारे मतमे भी ज्ञान अपना ही ज्ञाता होता
है, न कि दूसरेका भी ।
यदि कहो कि—विज्ञान न परका प्रकाशक होता है और न अपना ।
फिर भी घटादि विषयोंसे विज्ञानमे यही विशेषता है कि विज्ञान वेदन-
मात्र अर्थात् अजडरूप है और घटादि जडरूप हैं—तो भी विज्ञान
जैसे अपने प्रति अजडरूप है, वैसे ही उसे दूसरोंके प्रति भी अजड
होना चाहिये । अथवा वह जैसे घटादिकोंके प्रति अन्ध है, वैसे उसे
अपने प्रति भी अन्ध होना चाहिये । क्योंकि जातिवशात् वह एक जगह
जिसरूपसे होगा, दूसरी जगह भी स्वजातिका परित्याग न होनेसे उसी-
रूपका होगा ।
यदि कहो कि—स्वजातिका परित्याग न करनेपर भी अपने कारणके
प्रभावसे वह कहीं नियतरूपमे ही उत्पन्न होगा न कि सर्वत्र । अर्थात्
विज्ञान स्वकारणबलसे अपने प्रति ही अजडरूप होगा, घटादिके प्रति
नहीं—तो ऐसी बात ऊँचे स्वरसे न बोलना, क्योंकि दूसरा भी कहीं इसे
सुन लेगा । अर्थात् भेदमें भी ग्राह्यग्राहकभाव होनेमे स्वकारण ही
नियामक हो जायगा । अतः भेदपक्षमे भी कोई अतिप्रसङ्गादि दोष
नहीं आ सकेगा ।