आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अभेदोऽस्तु मा वा, भेदं तु प्रकाशमानत्वेन व्यासेधाम
इति चेन्, न, वस्तुनि भेदनिवृत्तेरेवाभेदरूपत्वात् ।
अस्तु तर्हि भेदाभेदविधुरमेव चित्रम्, चेतोभेदे प्रकाश-
मानत्वायोगात्, अभेदे चित्रत्वानुपपत्तेरिति चेत्, न, मिथो-
विरुद्धविधिद्वयविधानवत् तदुभयनिषेधस्याप्येकत्र विरुद्धत्वात् ।
न च सोऽप्यस्त्विति वाच्यम्, स्याद्वादावतारे तवापि दिगम्ब-
रत्वप्रसङ्गात् ।
यदि कहो कि—विषयके साथ विज्ञानका अभेद हो या मत हो किन्तु
विषयका प्रकाशक होनेके कारण उसमे ज्ञानके भेदका हम प्रतिषेध करते
हैं—तो वस्तुमे भेदकी निवृत्ति ही तो अभेद है। इसलिये यह कथन
भी पूर्वोक्तके तुल्य ही हुआ। अत पूर्वोक्त दोष ज्योंके त्यों स्थिर
रह गये।
(पूर्वपक्ष) यदि पूर्वकथन ठीक नहीं है तो भेद और अभेदसे
रहित ही चित्र माना जाय। क्योंकि यदि नील-पीतादि विषय विज्ञानसे
भिन्न हो तो वह विज्ञानद्वारा प्रकाशित नहीं हो सकता है। और यदि
अभिन्न हो तो विज्ञानसे अभिन्न होनेके कारण वे नील और पीतादि
आपसमे भी अभिन्न ही हो जायेंगे। इससे उनकी चित्रता भग्न
हो जायगी।
(उत्तरपक्ष) इस प्रकारका प्रतिपादन भी ठीक नहीं है। क्योंकि
जैसे परस्पर विरोधी दो विधियोंका एकमें विधान नहीं हो सकता है,
वैसे ही परस्पर विरोधी दो विधियोंका एक जगह निषेध भी नहीं हो
सकता है। यहाँ यह नहीं कह सकते कि “विरोधी दो विधियोंका एक
जगह निषेध भी रहे और निषेधके रहनेमे जो विरोध आता है, वह
विरोध भी रहे, क्या हानि है?” क्योंकि हरेक अनिष्टापत्तिको यदि इष्ट
ही मानते जायो तो इस प्रकारके स्याद्वादका अङ्गीकार करनेसे अपने
बौद्धपनसे सन्यास लेकर तुझे भी दिगम्बर (जैन) बन जाना पड़ेगा।
यदि कहो कि—भेदविधि, अभेदविधि, भेदनिषेध और अभेदनिषेध
इन चारों कोटियोंसे विनिर्मुक्त ही चित्राकार हो। ऐसा होनेमें कोई