ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
दूसरा अध्याय ] ३६५
यदि इस प्रकार समझकर 'ब्राह्मणाच्छंसी' हर रोज़ इन्द्र का
आह्वान करता है तो कोई अन्य इन्द्र को ले नहीं जा सकता ।
'यत् सोम आसुते नर' ( ऋ० ७।६४।१० )
यह अच्छावाक् का मंत्र है । इसमें "इंद्राग्नी अजोहवुः"
( इन्द्राग्नी को उन्होंने बुलाया ) ऐसा पद आया है । इस प्रकार
इन्द्राग्नी को उन्होंने हर रोज़ बुलाया । जब अच्छावाक् रोज़
इसको बुलाता है तो कोई और इन्द्राग्नी को ले नहीं जा
सकता ।
यह ऋचायें नावें हैं जो स्वर्गलोक के किनारे तक पहुँचा
देती हैं। इन से यजमान इन लोकों को तरके स्वर्ग लोक को
पहुँच जाते हैं । (३)
७—अब इन के अन्त के मंत्र कहते हैं :—
ते स्याम देव वरुण...( ऋ० ७।६६।६ )
यह मैत्रावरुण का परिधानीय या अन्त का मंत्र है।
इसमें एक पद आया है "इषं स्वश्चधीमहि", ( हम अन्न और
प्रकाश धारण करें ) । इससे वे दोनों लोकों को प्राप्त करते हैं ।
अन्न से यह लोक और प्रकाश ( स्वः ) से दूसरा लोक ।
“व्यंतरिक्षमतिरद्” ( ऋ० ८।१४।७-६ )
यह तीन ऋचायें विवृत हैं । इन से ब्राह्मणाच्छंसी स्वर्ग
के द्वार खोल देता है ।
“अत्यंतरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना ।
इंद्रो यदभिनद्वलम्” (ऋ० ८।१४।७ )
( इंद्र ने सोम के मद में सूराख को खोल दिया और प्रकाश
आने दिया ) इससे दीक्षित लोगों का जोश प्रकट होता है।
इसीलिये इस ऋचा को बलवती ( बलवाली । इस मंत्र में 'वल'
शब्द है 'बल' नहीं ) कहते हैं ।
३६६ [छठी पञ्चिका
उद्गा आजदंगिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहासतीः ।
अर्वाञ्चं नुन्नु दे वलम् । (ऋ० ८।१४।८)
( गायों को निकाल लाया और अंगिराओं के लिये उन
को जो अब तक छिपी थीं प्रकट कर दिया । और वल को
निकाल कर फेंक दिया ) । इस मंत्र में अंगिरों के लिये भेंट
का उल्लेख है ।
"इन्द्रेण रोचना दिवि” (ऋ० ८।१४।३) से स्वर्ग लोक की ओर
संकेत है ।
दृ॒ढानि दृ॑हि तानि च । स्थिराणि न पराणुदे । (८।१४।६)
( इन्द्र ने स्वर्ग के प्रकाशों को दृढ़ किया है । वह स्थिरों
को नहीं फेंकता ) ।
इस मंत्र से यजमान रोज स्वर्ग को जाते और वहाँ चलते
फिरते हैं ।
आहं सरस्वती वतोः (ऋ० ८।३८।१०)
अच्छावाक् का मंत्र है, वाक् ही सरस्वती है ।
"वतोः" द्विवचन में है 'इन्द्र और अग्नि का" ।
“इन्द्राग्न्योरवोवृधे”
यह जो वाक् है वह इन्द्र और अग्नि का प्रिय धाम है ।
इस प्रिय धाम से समृद्धि को प्राप्त होता है । जो इस रहस्य को
समझता है वह अपने प्रिय धाम के द्वारा समृद्ध होता है । (४)
८—होत्रकों के प्रातः सवन और मध्य सवन के परिधानीय
( अन्त के ) मंत्र दो तरह के होते हैं:—
अहीन और एकाहिक । मैत्रावरुण एकाहिक से अन्त करते
हैं । जिससे यजमान इस लोक से च्युत न हो । अच्छावाक्
"अहीनों" से स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । ब्राह्मणाच्छंसी
दोनों से । इससे दोनों लोकों को जोड़ता है और उनमें चलता
है । इस प्रकार मैत्रावरुण और अच्छावाक् को तथा अहीनों
दूसरा अध्याय ] ३६७
को और एकाहिकों को, अग्निष्टोम को और संवत्सर को
दोनों को थामे हुये चलता है ।
तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र “एकाहिक”
ही होते हैं । “एकाहः” प्रतिष्ठा हैं, इस प्रकार अन्त को यज्ञ को
प्रतिष्ठावान् करता है ।
प्रातः सवन में याज्य मंत्रों को लगातार ( अनवानं )
पढ़े । एक या दो स्तोम अधिक न पढ़े । यह ऐसा ही है जैसे
किसी भूखे प्यासे को झट खाना पानी दे देवे । यह सोचकर
कि मैं देवों को जल्दी से भोजन दे दूँ गा वह इस लोक में
प्रतिष्ठित हो जाता है ।
पिछले दो सवनों में अपरिमित मंत्र पढ़े । स्वर्ग लोक
अपरिमित है । स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । जो मंत्र होत्रकों
ने पहले दिन पढ़े उन्हीं को यदि चाहे तो पढ़े । या जिनको
होता ने पढ़ा उन्हीं को होत्रक पढ़े । होता प्राण है । होत्र का
अंग हैं । एक ही प्राण का अंगों में संचार है । इसलिये चाहे
तो होता वही मंत्र पढ़े जो होत्रकों ने पहले दिन पढ़े थे । या
जो होता ने पढ़े उनको होत्रक पढ़े ।
तृतीय सवनों में होत्रक जो परिधानीय मंत्र पढ़ते हैं उन्हीं
सूक्त के अन्तिम मंत्रों से होता समाप्त करता है । होता आत्मा
है । होत्रक अंग हैं । अंगों के अन्त समान होते हैं । इसीलिये
तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र समान ही होते हैं ॥५॥
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।
तीसरा अध्याय
१—आत्वा वहंतु हरय......( ऋ० १।१६।१ )
इस सूक्त को मैत्रावरुण प्रातः सवन में पढ़ता है । जब सोम
के प्यालों को उठाते हैं । इस सूक्त के मंत्रों में वृषन्, पीत,
सुत, मद, शब्द आते हैं । इसलिये इनमें रूपसमृद्धता है । यह
इन्द्र के मंत्र हैं । यज्ञ इन्द्र का है । गायत्री पढ़ता है । प्रातः
सवन गायत्री का है । प्रातः सवन में नौ मंत्र ( "न्यून" दस से
एक कम ) पढ़े जाते हैं । वीर्य भी 'न्यून' अर्थात् तंग अवकाश
में सींचा जाता है । मध्य दिन में दस मंत्र पढ़ता है । क्योंकि
जो वीर्य 'न्यून' स्थान में सींचा गया था वह स्त्री के मध्य भाग
में पहुँच कर बड़ा हो जाता है । तीसरे सवन में नौ ( "न्यून",
दस से एक कम ) मंत्र पढ़ता है । क्योंकि 'न्यून' अर्थात् तंग
जगह से ही बच्चे पैदा होते हैं । जब पूरे २ सूक्त पढ़े जायँ
तो यजमान को यज्ञ की योनि से गर्भ रूप में उत्पन्न करता है ।
कुछ लोग सात सात मंत्र पढ़ते हैं । सात प्रातःसवन में,
सात मध्यसवन में और सात तीसरे सवन में । जितने पुरोनु-
( ३६८ )
तीसरा अध्याय ] ३६९
वाक्य हों उतने ही याज्य हों। सात होता सामने मुख करके
याज्य पढ़ते और वषट् करते हैं। वे कहते हैं कि वे सात मंत्र
इन सात याज्यों के पुरोनुवाक्य हैं। लेकिन होता ऐसा न करे,
क्योंकि इससे यजमान का वीर्य लुप्त हो जाता है और यजमान
भी। यजमान सूक्त है।
मैत्रावरुण नौ मंत्रों से यजमान को इस लोक से अन्तरिक्ष
को ले जाता है और दसवें मंत्र से अन्तरिक्ष से भी ऊपर।
क्योंकि अन्तरिक्ष लोक ज्येष्ठ है। उस लोक से नौ मंत्रों द्वारा
स्वर्गलोक को ले जाता है। जो सात ही मंत्र पढ़ते हैं वे यजमान
को स्वर्ग लोक में ले जाना नहीं चाहते। इसलिये पूरे पूरे सूक्त
पढ़ने चाहियें। (१)
१०—इस पर प्रश्न करते हैं। जब यज्ञ इन्द्र का ही है तो
केवल होता और ब्राह्मणाच्छंसी ही प्रातःसवन में प्रस्थित सोम
के लिये ऐसे याज्य क्यों पढ़ते हैं जिनमें प्रत्यक्ष रूप से इन्द्र का
वर्णन हो। होता का याज्य है :—
इदं ते सौम्यं मधु (ऋ० ८।६५।८ )
और ब्राह्मणाच्छंसी का :—
इन्द्र त्वा वृषभं वयम् (ऋ० ३।४०।१ )
जो इतर ऋत्विज् नाना देवतों के लिये पढ़ते हैं वह इन्द्र के
मंत्र कैसे हो जाते हैं ? (प्रश्न का आशय यह है कि 'इन्द्र'
अन्य याज्यों में क्यों नहीं ? केवल दो याज्यों में ही क्यों है ?
इसका उत्तर देते हैं ) ।
मैत्रावरुण का याज्य है :—
मित्रं वयं हवामहे (ऋ० १।२३।४ )
परन्तु इसी में एक पद है "वरुणं सोम पीतये"। जहाँ
किसी पद में 'पीत' शब्द आता है वहाँ इन्द्र की ओर संकेत
होता है क्योंकि इस पद से इन्द्र को प्रसन्न करते हैं।
२४
३७० [ छठी पञ्चिका
पोता का याज्य मंत्र यह है :—
मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६।१ )
इसमें एक पद है “स सुगोपातमो जन” यह इन्द्र की ओर
संकेत है क्योंकि इन्द्र गोपातम अर्थात् सबसे अच्छा रक्षक है।
इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है।
नेष्टा का याज्य यह है :—
अग्ने पत्नीरिहा वह......( ऋ० १।२२।६ )
इस मंत्र में 'त्वष्टारं सोमपीतये' आया है। यहाँ इन्द्र का
वर्णन है। क्योंकि इन्द्र 'त्वष्टा' है। यह इन्द्र का रूप है। इस
प्रकार वह उसको प्रसन्न करता है।
अग्नीध्र का याज्य मंत्र यह है :—
उक्षानाय वशानाय ( ऋ० ८।४३।११ )
इसमें 'सोमपृष्ठाय वेधसे' आया है। 'वेधस्' इन्द्र है। यह
इन्द्र का रूप है। इससे इन्द्र को प्रसन्न करता है।
अच्छावाक_के मत्र में तो अन्त में इन्द्राग्नी साक्षात् ही है
इस लिये यह मंत्र स्वयंसमृद्ध है अर्थात् :—
प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जेन्यावसू। इन्द्राग्नी सोमपीतये ॥
( ऋ० ८।३८।७ )
इस प्रकार यह सब मंत्र इन्द्र के हो जाते हैं। जिनमें नाना
देवतों का वर्णन है उनसे अन्य देवताओं को ही प्रसन्न नहीं
करता। यह मंत्र गायत्री छन्द में हैं। यह अग्नि के हैं। इस
प्रकार तीनों की प्राप्ति होती है अर्थात् इन्द्र, अन्य देवते और
अग्नि। (२)
११—मध्य सवन में सोम के उठाने पर होता यह सूक्त
पढ़ता है :—
असावि देवं गो ऋजीकमंध......(ऋ० ७।२१।१)
तीसरा अध्याय ] ३७१
इन मंत्रों में वृषन्, पीत, सुत, मद् आते हैं। इस लिये
इनमें रूप-समृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं। (यज्ञ इन्द्र का है।
छन्द त्रिष्टुभ् है। त्रिष्टुभ् मध्यसवन का छन्द है।
इस पर प्रश्न करते हैं कि 'मद्' तो तीसरे सवन का रूप
हैं'फिर मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में ऐसे मन्त्र
क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि मध्य सवन में देवते
मद युक्त हो जाते हैं और सायंकाल तक और अधिक मद हो
जाता है। इस लिये मध्य सवन के अनुवाक्यों और याज्यों में
ऐसे मंत्र बोले जाते हैं।
सब लोग मध्य सवन में प्रस्थित सोम के लिये प्रत्यक्ष रूप
से ऐसे याज्य मंत्र बोलते हैं जो इन्द्र के हों। कुछ लोग ( होता,
मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) ऐसे मंत्र बोलते हैं जिनमें
'अभितृण्' शब्द भी होते हैं। होता का याज्य मंत्र है :-
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द......( ऋ० ६।१७।१ )
मैत्रावरुण का :-
स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो......( ऋ० ६।१७।२ )
और ब्राह्मणाच्छंसी का...
एवा पाहि प्रत्नथा मंदतु त्वा......( ऋ० ६।१७।३ )
पोता का याज्य यह है :-
अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहूः ( ऋ० १।१०४।६ )
नेष्टा का याज्य यह है :-
तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् । ( ऋ० ३।३५।६ )
अच्छावाक् का याज्य यह है :-
इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना......( ऋ० ३।३६।२ )
अग्नीध्र का है :-
आपूणो अस्य कलशः स्वाहा......( ऋ० ३।३२।१५ )
३७२ [छठी पञ्चिका
इनमें 'अभितृण्ण' वाले मंत्र हैं। इन्द्र ने पहले प्रातःसवन में
विजय पाई थी। परन्तु इन मंत्रों द्वारा मध्यसवन में भेदन
किया (अभितृण्यात्) इस लिये 'अभितृण्ण' वाले मंत्र बोले जाते
हैं। (३)
१२-तृतीय सवन में सोम के उठाने पर होता यह मंत्र
बोलता है:--
इहोप यात शवसो नपातः (ऋ० ४।३५।१)
इनमें वृषन्, पीत, सुत, मद् शब्द आये हैं। इस लिये इनमें
रूपसमृद्धता है। यह इन्द्र के मंत्र हैं और ऋभुओं के हैं।
इस पर प्रश्न है कि जब ऋभुओं की स्तुति नहीं की जाती
तो यह तीसरे सवन के पवमान मंत्र ऋभुओं के क्यों कहलाते
हैं ? (इसका उत्तर यह है) कि पिता प्रजापति ने मर्त्य ऋभुओं
को अमर्त्य करके तीसरे सवन में भाग दिया। इसलिये ऋभुओं
के मन्त्र तो नहीं बोलते किन्तु पवमान स्तोत्रों को आर्भव
कहते हैं।
एक ऋषि का प्रश्न है कि तीसरे सवन में त्रिष्टुप् छन्द
क्यों लाते हैं ? प्रातः सवन का छन्द गायत्री है। मध्य सवन
का त्रिष्टुभ और तीसरे सवन का जगती। इसका उत्तर यह
देना चाहिये कि तीसरे सवन में सोमरस समाप्त हो जाता है
(धीतरसं)। अगर तीसरे सवन में ऐसा छन्द बोला जाय
जिसका रस अभी समाप्त नहीं हुआ (अधीतरस) जैसे त्रिष्टुम््
तो ऐसा करने से तृतीय सवन रस वाला हो जाता है।
इस सवन में इन्द्र को भी भाग मिलता है।
इस पर प्रश्न यह होता है कि जब तीसरा सवन इन्द्र और
ऋभुओं का है, और उपस्थित सोम के लिये होता इन्द्र और
ऋभुओं का ही याज्य मन्त्र बोलता है तो फिर इतर ऋत्विज
नाना देवतों के याज्य क्यों बोलते हैं ?
ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—
तीसरा अध्याय ] ३७३
होता के याज्य में :—
ऋतुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितम् ।
ऋभुओं का स्पष्ट लेख है। लेकिन दूसरों में स्पष्ट लेख
नहीं।
मैत्रावरुण का याज्य यह है :—
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतम् । ( ऋ० ६।६८।१० )
इसमें एक पद है :—युवोरथो अध्वरं देववीतये । इसमें
बहुवचन है । यह ऋभुओं का रूप है ।
ब्राह्मणाच्छंसी का मंत्र यह है :—
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते...( ऋ० ४।५०।१० )
इसमें 'विशंत्विंदवः स्वाभुवः' पद आया है । यह बहुवचन
है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
पोता का याज्य मंत्र है :—
आ वो वहंतु सप्तयो रघुष्यदो...( ऋ० १।८५।६ )
इसमें "रघु पत्वानः प्रजिगात बाहुभिः' आया है । यह बहु-
वचन है । बहुवचन ऋभुओं का रूप है ।
नेष्टा का याज्य मंत्र यह है :—
अमेव नः सुहवा आ हि गंतन...( ऋ० २।३६।३ )
इसमें 'गंतन' बहुवचन है । यह बहुवचन ऋभुओं का रूप
है ।
अच्छावाक् का याज्य यह है :—
इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वोऽस्य...( ऋ० ६।६९।७ )
इसमें "आवामंधांसि मदिराय्यग्मन्"...बहुवचन है । बहु-
वचन ऋभुओं का रूप है ।
अग्नीध्र का याज्य यह है :—
इमं स्तोममहं ते जातवेदसे ( ऋ० १।९४।१ )
३७४ [ छठी पञ्चिका
इसमें 'रथमिव संमहेम' आया है। यह बहुवचन है। बहु-
वचन ऋतुओं का रूप है।
इस प्रकार यह सब मंत्र ऐन्द्र-आर्भव हो जाते हैं।
दूसरे देवतों के मंत्रों से उन उन देवतों को भी प्रसन्न करता
है। वह जगत् के विजेता हैं। इसलिये जगती छन्द की आव-
श्यकता होती है। तीसरे सवन की समृद्धि के लिये। (४)
१३—इस पर प्रश्न होता है कि कुछ होत्रों में उक्थ्य
(शस्त्र) होता है। कुछ में नहीं होता। फिर सब होत्र बराबर
और उक्थ्य वाले कैसे हो जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि
ये उक्थ्य वाले और अनुक्थ्य वाले साथ-साथ पाठ करते हैं।
इसलिये वे सब समान कहलाते हैं। और उनकी विषमता दूर
हो जाती है।
अब प्रश्न होता है कि होत्रक लोग प्रातः सवन और मध्य
सवन में ही शस्त्र पढ़ते हैं। फिर यह तीसरे सवन में पढ़े के
बराबर कैसे हो जाता है ? इसका उत्तर यह है कि वे मध्य सवन
में दो दो सूक्त पढ़ते हैं।
इस पर प्रश्न होता है कि होत्रक होता के बराबर दो सूक्त
क्यों पढ़ते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वे दो देवतों के लिये
होते हैं। (५)
१४—शंका होती है कि जब तीन होत्रक ही उक्थ्य वाले
हैं अन्य नहीं। तो वे उक्थ्य वाले कैसे समझे जा सकते हैं?
इसका उत्तर यह है कि अग्नीध्र का उक्थ्य आज्य है। पोता
के याज्य का मरुत्वतीय। नेष्टा का वैश्वदेव। इस प्रकार यह
याज्य उक्थ्य वाले हो जाते हैं।
प्रश्न यह है कि अन्य होत्रकों को तो एक बार ही आदेश
दिया जाता है तो पोर्ता को और नेष्टा को क्यों दो बार आदेश
दिया जाता है ? (इसके लिये गाथा है) :—
तीसरा अध्याय ] ३७५
जब गायत्री ने सुपर्ण होकर सोम को निकाला तो इन्द्र ने
इन दोनों के उक्थ काट कर होता को दे दिये और कहा,
"तुम न बुलाना। तुम योग्य नहीं हो।" देवों ने कहा, "इन
दोनों को वाणां से प्रभावित कर दें।" (अर्थात् दो बार आदेश
देकर उसका बदला चुका दें) इसलिये इन (पोता और नेष्टा)
को दो बार आदेश दिये जाने लगे।
अग्नीध्र के याज्य में एक ऋचा वढ़ा दी। इसलिये उसके
याज्य में एक ऋचा अधिक होती है।
कुछ लोग पूछते हैं कि जब मैत्रावरुण आदेश देता है "होता
यक्षत्" "होता यक्षत्" (होता याज्य पढ़े) तो यह आदेश
केवल होता को ही क्यों नहीं देता। उनको क्यों देता है जो
होता नहीं होते, केवल होता के मंत्रों को उच्चारते मात्र हैं?
इसका उत्तर यह है कि होता प्राण है। सब ऋत्विज् भी प्राण
हैं। इस आदेश का प्रयोजन यह है कि "प्राण याज्य पढ़े",
"प्राण याज्य पढ़े।"
क्या यह आदेश उद्गाताओं के लिये भी हैं? हाँ, हैं।
क्योंकि मैत्रावरुण मंत्र जप कर के कहता है "तुम स्तुति करो।"
क्या अच्छावाक् का कुछ प्रवर (विशेषता) होता है?
हाँ होता है। क्योंकि अध्वर्यु उससे कहता है, "अच्छावाक्,
कह जो कुछ तुझे कहना है।"
जब मैत्रावरुण तीसरे सवन में इन्द्र-वरुण का शस्त्र कहता
हैं तो अग्नि के लिए स्तोत्रिय और अनुरूप क्यों पढ़े जाते हैं?
देवों ने अग्नि को मुख बना के ही असुरों को उक्थों से निकाल
दिया। इसलिये स्तोत्रिय और अनुरूप अग्नि के होते हैं।
अब प्रश्न है कि जब तीसरे सवन में ब्राह्मणाच्छंसी इन्द्र
और बृहस्पति के लिये शस्त्र बोलता है और अच्छावाक् इन्द्र
और विष्णु के लिये, तो तीसरे सवन में स्तोत्रिय और अनुरूप
ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक् नाना देवतों के लिये मन्त्र
३७६ [छठी पञ्चिका
इन्द्र के कैसे होते हैं ? ( उत्तर यह है कि ) इन्द्र ने असुरों को
उक्थ्यों से निकाल कर पराजित कर दिया और उसने देवों से
कहा, "मेरा साथ कौन देगा ?" देवों ने कहा, "मैं, मैं।" और
उन्होंने उसका साथ दिया। लेकिन चूँकि इन्द्र ने पहले विजय
पाई, इसलिये स्तोत्रिय और अनुरूप इन्द्र के होते हैं। और
चूँकि देवों ने कहा, "मैं साथ दूंगा" और दिया भी। इसलिये
ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक् नाना देवतों के लिये मन्त्र
पढ़ता है। (६)
१५-फिर प्रश्न यह है कि जब तीसरा सवन वैश्वदेव का
है तो तीसरे सवन के आरम्भ में इन्द्र के और जगती छन्द
वाले मंत्र क्यों बोले जाते हैं ? उत्तर यह है कि इन्द्र से आरम्भ
करके ही चलते हैं। जगती छन्द इसलिये है कि तीसरा सवन
जगती से सम्बन्ध रखता है। जगत् की इच्छा के लिये। और
जो कोई छन्द पीछे पढ़ा जाता है वह भी जगती से सम्बन्धित
हो जाता है। जब तृतीय सवन के आरम्भ में इन्द्र के और
जगती छन्द वाले सूक्त पढ़े जाते हैं।
शस्त्रों के अन्त में अच्छावाक् त्रिष्टुभ् छन्द का सूक्त बोलता
है :- स वां कर्मणा... ( ऋ० ६।६९।१) यह 'कर्म' से तात्पर्य
'सोमपान' की प्रशंसा है। इसमें 'समिषा' पद है। यहाँ 'इष'
का अर्थ है अन्न। अन्न की प्राप्ति के लिये। "अरिष्टैर्नः पथिभिः
पारयंत" इस पद के पढ़ने का तात्पर्य यह है कि वह प्रत्येक दिन
कल्याण के लिये स्तुति करता है।
यहाँ प्रश्न होता है कि जब तीसरा सवन जगती छन्द वाला
है तो तीसरे सवन के अन्त में त्रिष्टुभ् छन्द क्यों पढ़ते हैं ?
इसका उत्तर यह है कि त्रिष्टुभ् वीर्य है। अन्त में वीर्य की
प्रतिष्ठा हो जाती है।
ब्राह्मणाच्छंसी का :---
तीसरा अध्याय ] ३७७
मैत्रावरुण का अन्त का मंत्र यह है :—
इयमिन्द्रं वरु॑णमष्ट मे॒ गीः ( ऋ० ७।८४।५ )
ब्राह्मणाच्छंसी का :---
वृहस्पतिर्नः परि॑ पातु प॒श्चात् (ऋ० १०।४२।११)
अच्छावाक् का :—
उभा जिग्यथुः (ऋ० ६।६९।८)
वे दोनों ही जीते थे । कोई पराजित नहीं हुआ । अर्थात्
उन्होंने हार नहीं मानी । उनमें से कोई नहीं हारा ।
“इंद्रश्च विष्णो यद॑ पस्पृधेथां त्रे॑धा सह॑स्रं वितदै॑रयेथाम्”
से तात्पर्य है कि इन्द्र और विष्णु दोनों ही असुरों से लड़े । और
उनको जीत कर कहा, “लाओ, बाँट लें ।” असुरों ने कहा,
“अच्छा” । इन्द्र ने कहा, “यह विष्णु तीन पैर में जितना नाप
ले वह हमारा, शेष तुम्हारा” । वह इन लोकों में चला, फिर
वेदों में, फिर वाणी में ।
इस पर शंका करते हैं कि सहस्र का क्या अर्थ है । इसका
उत्तर देना चाहिये कि “यह लोक, वेद और वाक्” ।
अच्छावाक उक्थ्य के अन्त में कहता है:—
“ऐरयेथां, ऐरयेथां” ( तुम दोनों ने जीता ) ।
अच्छावाक् का काम अन्त का है । अग्निष्टोम और अति-
रात्र में होता अन्त के भाग को पढ़ता है । ‘षोडशी’ में सन्देह
है कि अन्त के चार अक्षर पढ़े जायें या न पढ़े जायें । कुछ
कहते हैं कि अवश्य पढ़े जायें । जब अन्य कृत्यों में पढ़े जाते हैं
तो इसमें क्यों न पढ़ा जाय ।” (७)
१६—अब प्रश्न है कि जब तीसरा सवन नाराशंसी का है
तो अच्छावाक् शिल्पों में उन मंत्रों को क्यों पढ़ता है जो नारा-
शंसी के नहीं होते ? इसका उत्तर यह है कि नाराशंसी विकार
३७८ [ छठी पञ्चिका
का सूचक है। वीर्य थोड़ा थोड़ा विकृत होता जाता है। तब
पूर्ण विकार के बाद पैदा होता है। नाराशंस छन्द मृदु और
शिथिल है। अच्छावाक् सबसे पिछला बोलने वाला है। इस
लिये ऐसा है। पिछले भाग को भली भाँति स्थापित कर देना
चाहिये। इसलिये अच्छावाक् शिल्पों में नाराशंसी के मन्त्र
नहीं बोलता। जिससे अन्त मजबूत हो जाय। (८)
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।
चौथा अध्याय
१७-प्रातः सवन में अहीन संतति के लिये (अर्थात् वह
सोम यज्ञ जिनमें कई दिन लगते हैं और एक दिन और दूसरे
दिनों में सिलसिला जारी रखना पड़ता है) जो अगले दिन के
स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप करते हैं वह उसी प्रकार
होता है जैसे एकाह् में (जिस सोम यज्ञ में एक ही दिन
लगता है उसे 'एकाह्' कहते हैं)। जैसे 'एकाह्' के सवनों में
सिलसिला होता है उसी प्रकार 'अहीन' के दिनों में भी। प्रातः
सवन में अगले दिन के स्तोत्रिय को पहले दिन का अनुरूप
इसलिये करते हैं कि 'अहीन' के दिनों में सिलसिला हो जाय।
इस प्रकार सिलसिला हो जाता है।
देवों और ऋषियों ने सोचा कि यज्ञ में सिलसिला क़ायम
करें दिनों को समान करके। तब उन्होंने यह समानता सोची
कि प्रगाथ एक ही हों, प्रतिपद् एक ही हों और सूक्त एक ही
हों। इन्द्र घर का व्यापी सा है। वह यज्ञ में पहले भी चलता
है और अगले दिनों में भी। (अर्थात् इन्द्र यज्ञ में सर्वत्र
( ७९ )
३८० [ छठी पञ्चिका
विचरता है ) । इस प्रकार यज्ञ के सब दिनों में इन्द्र के विचरने
से समानता या सिलसिला हो जाता है । ( १ )
१८—इन संपात सूक्तों का सबसे पहला ऋषि ( दृष्टा )
विश्वामित्र हुआ । विश्वामित्र के देखे हुये उन मंत्रों को वाम-
देव ने फैलाया ( असृजत ) । यह सूक्त यह हैं :--
एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्......( ऋ० ४।१६ )
यन्न इन्द्रो जुजुषेयच्च वष्टि......( ऋ० ४ । २२ )
कथा महामवृधत् कस्य होतुः ( ऋ० ४।२३ )
उसने झट उनका पीछा किया ( समपतत् ) और अपने
शिष्यों को पढ़ाया । इसलिये उनका संपात सूक्त नाम पड़ गया ।
( समपतत् का अर्थ है मंत्रों को देखकर शिष्यों को पढ़ाना ) ।
विश्वामित्र ने इन संपात सूक्तों को देखा और कहा कि मेरे
देखे हुये मंत्रों को वामदेव ने फैला दिया । मैं इन सूक्तों के
प्रतिमान के लिये ऐसे ही अन्य सूक्त बना दूँ । इसलिये उसने
यह सूक्त प्रतिमान रूप बना दिये :—
सद्यो ह जातो वृषभः ( ऋ० ३।४८ )
इन्द्रः पूर्भिदातिरत् ( ऋ० ३।३४ )
इमामु षु प्रभृतिम् ( ऋ० ३।३६ )
इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः ( ऋ० ३।३० )
शासद् वह्नि र्दुहितुः ( ऋ० ३।३१ )
अभितष्टेव दीधया मनीषा ( ऋ० ३।३८ )
दूसरे संपात सूक्त यह हैं :—
भरद्वाज का सूक्त—य एक इद्धव्यः ( ऋ० ६।२२ )
वशिष्ठ के दो सूक्त अर्थात्
यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम ( ऋ० ७।१९ )
उदु ब्रह्माण्यैरत......( ऋ० ७।२३ )
नोधा का सूक्त :—
ब्राह्मणाच्छंसी पढ़ता है :—
चौथा अध्याय ] ३८१
अस्मा इदु प्रतवसे तुराय... ऋ० १।६१ )
यह लोग ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक )
षडह के प्रातःसवन में स्तोत्रियों के पढ़ने के बाद मध्य सवन
में अहीन सूक्तों को पढ़ते हैं । यह सूक्त यह हैं :—
आसत्यो यातुमथवाँ ऋजीषी...( ऋ० ४।१६ )
क्योंकि मित्रावरुण सत्य वाला है ।
ब्राह्मणाच्छंसी पढ़ता है :—
अस्मा इदु प्र तवसे तुराय...( ऋ० १।६१ )
इस सूक्त में "इन्द्राय ब्रह्मणा राततम" शब्द आये हैं ।
और
"इंद्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्..."
इसमें 'ब्रह्म' शब्द आया है ।
अच्छावाक यह सूक्त पढ़ता है :—
शासद् वह्निर्जन यंत वह्निम् ।
इसमें "वह्नि" ( नेता ) शब्द आया है ।
इस पर प्रश्न होता है :—कि अच्छावाक "वह्नि" वाले
इस सूक्त को दोनों प्रकार के दिनों में क्यों पढ़ता है । 'परांचि'
दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी । ( एक सत्र में दो
प्रकार के दिन होते हैं । एक तो अकेले दिन जिनको 'परांचि'
कहते हैं । दूसरे 'षडह' आदि जो बारबार आते हैं । इनको
'अभ्यावर्त्ति' कहते हैं) । इसका उत्तर यह है कि वह वृ च ऋत्विज
वीर्यवान होता है । यह सूक्त 'वह्नि' वाला है । 'वह्नि' वह है
जो अगुआ हो ( वहति ) । 'वह्नि' उस घोड़े को भी कहते हैं
जो धुरे को खींचता है जिसमें वह जुता होता है । इसलिये
अच्छावाक इन सूक्तों को दोनों प्रकार के दिनों में पढ़ता है
अर्थात् 'परांचि' दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी ।
ब्राह्मणाच्छंसी तीन संपात सूक्तों को एक करके एक-एक
३८२ [ छठी पञ्चिका
यह पाँच दिनों में पढ़े जाते हैं :—चतुर्विंश, अभिजित् ,
विषुवत्, विश्वजित् और महाव्रत । यह दिन 'अहीन' हैं । क्योंकि
इनमें कुछ छूटता नहीं ( न हि एषु किंचन हीयते ) । यह दिन
'परांचि' हैं । अभ्यावर्त्ति नहीं । अर्थात् यह बार बार नहीं
आते । इस लिये इन दिनों अहीन सूक्त पढ़े जाते हैं । इनको
पढ़ते हुये वह समझते हैं "हम स्वर्ग लोक को पूर्ण रूप से और
समृद्धता से प्राप्त होवें" । जब यह इनका पाठ करते हैं तो इंद्र
को बुलाते हैं जैसे गाय के पास बैल को बुलाते हैं । यह पाठ
सिलसिले को क़ायम रखने के लिये करते हैं । इससे सिलसिला
कायम रहता है ॥(२)
१९—इसलिये मैत्रावरुण षडह के पहले तीन दिनों में से
हर दिन इन तीन संपातों को विपर्यास अर्थात् उल्टे क्रम से
पढ़ता है । पहले दिन "एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्", दूसरे दिन
"यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टी", तीसरे दिन "कथा महामवृधत्
कस्य होतुः" ।
ब्राह्मणाच्छंसी तीन संपात सूक्तों को एक करके एक-एक
दिन ( दूसरे तीन दिनों में ) विपर्यास अर्थात् उलटे क्रम से
पढ़ता है :—पहले दिन, "इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैः"; दूसरे
दिन, "एक इदद्व्योश्चर्षणीनाम", तीसरे दिन, "यस्तिग्मशृङ्गो
वृषभो न भीम" ।
अच्छावाक तीन संपात सूक्तों को एक एक करके विपर्यास
( उलटे क्रम ) से एक एक दिन पढ़ता है :--
पहले दिन, "इमामूषु प्रभृति सातयेधा"; दूसरे दिन
"इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः"; तीसरे दिन, "शासद् वह्नि-
र्दुहितुर्नप्त्यंगात्" ।
यह नौ और तीन सूक्त जो प्रतिदिन पढ़े जाते हैं बारह हो
जाते हैं । बारह मासों का संवत्सर होता है । संवत्सर प्रजा-
ब्राह्मणाच्छंसी इसको :—"वने न वा यो न्यधायि चाकन्"
चौथा अध्याय ] ३८३
पति है। प्रजापति यज्ञ है। इस प्रकार संवत्सर प्रजापति यज्ञ
को प्राप्त होते हैं और हर दिन के कृत्य को संवत्सर प्रजापति
यज्ञ में प्रतिष्ठित कर देते हैं।
इन सूक्तों के बीच-बीच में 'विमद' ऋषि के विराज मंत्रों
को चौथे दिन बिना 'न्यूङ्ख' के पढ़ना चाहिये। पंक्ति मंत्रों को
पाँचवें दिन, परुच्छेप मंत्रों को छठे दिन।
जो दिन महास्तोम के हों उनमें मैत्रावरुण इस मंत्र को
पढ़े :—को अद्य नर्यो देवकामः ( ४।२५।१ )
ब्राह्मणाच्छंसी इसको :—"वने न वा यो न्यधायि चाकन्"
( १०।२९।१ )
अच्छावाक इस मंत्र को :—"आ याह्यर्वाङ् उप बंधुरेष्ठा"
( ३।४३।१ )
यह आवपन मंत्र हैं। इन्हीं 'आवपन' मंत्रों से देवों और
ऋषियों ने स्वर्गलोक को जीता और इन्हीं के द्वारा यजमान
स्वर्गलोक को प्राप्त करता है (३)।
२०—उन अहीन सूक्तों के पहले हर दिन मैत्रावरुण इस
सूक्त का पाठ करता है :—
"सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः" ( ऋ० ३।४८ )
यह सूक्त स्वर्ग से संबंध रखता है। इसी से देवों ने स्वर्ग
जीता। इसी से ऋषियों ने। इसी से यजमान भी स्वर्ग जीत
सकते हैं।
यह विश्वामित्र का सूक्त है। क्योंकि विश्वामित्र सब का
मित्र था। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी
मित्र हो जाते हैं अगर मैत्रावरुण इसको समझकर अहीन सूक्तों
से पूर्व रोज़ इसका पाठ करता है।
इसमें 'वृषभ' और पशुमत्' शब्द आये हैं। पशुओं की वृद्धि
के लिये।
ब्राह्मणाच्छंसी प्रति दिन इस ब्रह्मासूक्त को पढ़ता है :-
३८४ [ छठी पञ्चिका
इसमें पाँच ऋचायें हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं, पंक्ति
अन्न हैं। अन्न की प्राप्ति के लिये।
ब्राह्मणाच्छंसी प्रति दिन इस ब्रह्मासूक्त को पढ़ता है :-
उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्य (७।२३) इसमें 'ब्रह्मन्' शब्द आने से रूप
समृद्धता प्राप्त होती है। यह स्वर्ग का सूक्त है। इससे देवों ने
स्वर्ग जीता, ऋषियों ने स्वर्ग जीता और यजमान भी स्वर्ग जीत
सकते हैं।
यह वशिष्ठ का सूक्त है। इससे वशिष्ठ इन्द्र के प्रिय धाम
को गया। और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को
समझता है वह इन्द्र के प्रिय धाम को पाता है और परम लोक
को जीतता है। इसमें छः ऋचायें हैं। छः ऋतुयें हैं। ऋतुओं
की प्राप्ति के लिये। संपात सूक्तों के पीछे इनका पाठ करता है।
इस प्रकार यजमान स्वर्ग लोक में जाने के लिए इस लोक में
प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
अच्छावाक हर रोज़ यह सूक्त पढ़ता है :-
अभि तष्टेव दीधया मनीषाम्... (ऋ० ३.३८ )
इसमें 'अभि' शब्द है। इसलिये यह इस लोक और परलोक
के सिलसिले के लिये उपयुक्त है। इस सूक्त में "अभिप्रयाणि
मर्मृशत् पराणि" शब्द आये हैं। इससे तात्पर्य है कि जो
परलोक में आने वाले दिन हैं वह प्रिय हैं। इन्हीं को वह
प्राप्त करता है। 'पर' का अर्थ है स्वर्गलोक जो इस लोक से
परे हैं।
"कवींऽरिच्छामि संदृशे सुमेधा" इन शब्दों से तात्पर्य है
उन ऋषियों से जो गुज़र चुके। वे कवि हैं। इन्हीं के विषय में
यह मंत्र है। यह विश्वामित्र का है। विश्वामित्र सब का मित्र
था। जो इस रहस्य को समझता है उसके सभी मित्र हो
जाते हैं!