ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ३७५
जब गायत्री ने सुपर्ण होकर सोम को निकाला तो इन्द्र ने
इन दोनों के उक्थ काट कर होता को दे दिये और कहा,
"तुम न बुलाना। तुम योग्य नहीं हो।" देवों ने कहा, "इन
दोनों को वाणां से प्रभावित कर दें।" (अर्थात् दो बार आदेश
देकर उसका बदला चुका दें) इसलिये इन (पोता और नेष्टा)
को दो बार आदेश दिये जाने लगे।
अग्नीध्र के याज्य में एक ऋचा वढ़ा दी। इसलिये उसके
याज्य में एक ऋचा अधिक होती है।
कुछ लोग पूछते हैं कि जब मैत्रावरुण आदेश देता है "होता
यक्षत्" "होता यक्षत्" (होता याज्य पढ़े) तो यह आदेश
केवल होता को ही क्यों नहीं देता। उनको क्यों देता है जो
होता नहीं होते, केवल होता के मंत्रों को उच्चारते मात्र हैं?
इसका उत्तर यह है कि होता प्राण है। सब ऋत्विज् भी प्राण
हैं। इस आदेश का प्रयोजन यह है कि "प्राण याज्य पढ़े",
"प्राण याज्य पढ़े।"
क्या यह आदेश उद्गाताओं के लिये भी हैं? हाँ, हैं।
क्योंकि मैत्रावरुण मंत्र जप कर के कहता है "तुम स्तुति करो।"
क्या अच्छावाक् का कुछ प्रवर (विशेषता) होता है?
हाँ होता है। क्योंकि अध्वर्यु उससे कहता है, "अच्छावाक्,
कह जो कुछ तुझे कहना है।"
जब मैत्रावरुण तीसरे सवन में इन्द्र-वरुण का शस्त्र कहता
हैं तो अग्नि के लिए स्तोत्रिय और अनुरूप क्यों पढ़े जाते हैं?
देवों ने अग्नि को मुख बना के ही असुरों को उक्थों से निकाल
दिया। इसलिये स्तोत्रिय और अनुरूप अग्नि के होते हैं।
अब प्रश्न है कि जब तीसरे सवन में ब्राह्मणाच्छंसी इन्द्र
और बृहस्पति के लिये शस्त्र बोलता है और अच्छावाक् इन्द्र
और विष्णु के लिये, तो तीसरे सवन में स्तोत्रिय और अनुरूप