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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

३८० [ छठी पञ्चिका
विचरता है ) । इस प्रकार यज्ञ के सब दिनों में इन्द्र के विचरने
से समानता या सिलसिला हो जाता है । ( १ )
१८—इन संपात सूक्तों का सबसे पहला ऋषि ( दृष्टा )
विश्वामित्र हुआ । विश्वामित्र के देखे हुये उन मंत्रों को वाम-
देव ने फैलाया ( असृजत ) । यह सूक्त यह हैं :--
एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्......( ऋ० ४।१६ )
यन्न इन्द्रो जुजुषेयच्च वष्टि......( ऋ० ४ । २२ )
कथा महामवृधत् कस्य होतुः ( ऋ० ४।२३ )
उसने झट उनका पीछा किया ( समपतत् ) और अपने
शिष्यों को पढ़ाया । इसलिये उनका संपात सूक्त नाम पड़ गया ।
( समपतत् का अर्थ है मंत्रों को देखकर शिष्यों को पढ़ाना ) ।
विश्वामित्र ने इन संपात सूक्तों को देखा और कहा कि मेरे
देखे हुये मंत्रों को वामदेव ने फैला दिया । मैं इन सूक्तों के
प्रतिमान के लिये ऐसे ही अन्य सूक्त बना दूँ । इसलिये उसने
यह सूक्त प्रतिमान रूप बना दिये :—
सद्यो ह जातो वृषभः ( ऋ० ३।४८ )
इन्द्रः पूर्भिदातिरत् ( ऋ० ३।३४ )
इमामु षु प्रभृतिम् ( ऋ० ३।३६ )
इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः ( ऋ० ३।३० )
शासद् वह्नि र्दुहितुः ( ऋ० ३।३१ )
अभितष्टेव दीधया मनीषा ( ऋ० ३।३८ )
दूसरे संपात सूक्त यह हैं :—
भरद्वाज का सूक्त—य एक इद्धव्यः ( ऋ० ६।२२ )
वशिष्ठ के दो सूक्त अर्थात्
यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम ( ऋ० ७।१९ )
उदु ब्रह्माण्यैरत......( ऋ० ७।२३ )
नोधा का सूक्त :—