ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] ३७७
मैत्रावरुण का अन्त का मंत्र यह है :—
इयमिन्द्रं वरु॑णमष्ट मे॒ गीः ( ऋ० ७।८४।५ )
ब्राह्मणाच्छंसी का :---
वृहस्पतिर्नः परि॑ पातु प॒श्चात् (ऋ० १०।४२।११)
अच्छावाक् का :—
उभा जिग्यथुः (ऋ० ६।६९।८)
वे दोनों ही जीते थे । कोई पराजित नहीं हुआ । अर्थात्
उन्होंने हार नहीं मानी । उनमें से कोई नहीं हारा ।
“इंद्रश्च विष्णो यद॑ पस्पृधेथां त्रे॑धा सह॑स्रं वितदै॑रयेथाम्”
से तात्पर्य है कि इन्द्र और विष्णु दोनों ही असुरों से लड़े । और
उनको जीत कर कहा, “लाओ, बाँट लें ।” असुरों ने कहा,
“अच्छा” । इन्द्र ने कहा, “यह विष्णु तीन पैर में जितना नाप
ले वह हमारा, शेष तुम्हारा” । वह इन लोकों में चला, फिर
वेदों में, फिर वाणी में ।
इस पर शंका करते हैं कि सहस्र का क्या अर्थ है । इसका
उत्तर देना चाहिये कि “यह लोक, वेद और वाक्” ।
अच्छावाक उक्थ्य के अन्त में कहता है:—
“ऐरयेथां, ऐरयेथां” ( तुम दोनों ने जीता ) ।
अच्छावाक् का काम अन्त का है । अग्निष्टोम और अति-
रात्र में होता अन्त के भाग को पढ़ता है । ‘षोडशी’ में सन्देह
है कि अन्त के चार अक्षर पढ़े जायें या न पढ़े जायें । कुछ
कहते हैं कि अवश्य पढ़े जायें । जब अन्य कृत्यों में पढ़े जाते हैं
तो इसमें क्यों न पढ़ा जाय ।” (७)
१६—अब प्रश्न है कि जब तीसरा सवन नाराशंसी का है
तो अच्छावाक् शिल्पों में उन मंत्रों को क्यों पढ़ता है जो नारा-
शंसी के नहीं होते ? इसका उत्तर यह है कि नाराशंसी विकार