ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ [छठी पञ्चिका
उद्गा आजदंगिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहासतीः ।
अर्वाञ्चं नुन्नु दे वलम् । (ऋ० ८।१४।८)
( गायों को निकाल लाया और अंगिराओं के लिये उन
को जो अब तक छिपी थीं प्रकट कर दिया । और वल को
निकाल कर फेंक दिया ) । इस मंत्र में अंगिरों के लिये भेंट
का उल्लेख है ।
"इन्द्रेण रोचना दिवि” (ऋ० ८।१४।३) से स्वर्ग लोक की ओर
संकेत है ।
दृ॒ढानि दृ॑हि तानि च । स्थिराणि न पराणुदे । (८।१४।६)
( इन्द्र ने स्वर्ग के प्रकाशों को दृढ़ किया है । वह स्थिरों
को नहीं फेंकता ) ।
इस मंत्र से यजमान रोज स्वर्ग को जाते और वहाँ चलते
फिरते हैं ।
आहं सरस्वती वतोः (ऋ० ८।३८।१०)
अच्छावाक् का मंत्र है, वाक् ही सरस्वती है ।
"वतोः" द्विवचन में है 'इन्द्र और अग्नि का" ।
“इन्द्राग्न्योरवोवृधे”
यह जो वाक् है वह इन्द्र और अग्नि का प्रिय धाम है ।
इस प्रिय धाम से समृद्धि को प्राप्त होता है । जो इस रहस्य को
समझता है वह अपने प्रिय धाम के द्वारा समृद्ध होता है । (४)
८—होत्रकों के प्रातः सवन और मध्य सवन के परिधानीय
( अन्त के ) मंत्र दो तरह के होते हैं:—
अहीन और एकाहिक । मैत्रावरुण एकाहिक से अन्त करते
हैं । जिससे यजमान इस लोक से च्युत न हो । अच्छावाक्
"अहीनों" से स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । ब्राह्मणाच्छंसी
दोनों से । इससे दोनों लोकों को जोड़ता है और उनमें चलता
है । इस प्रकार मैत्रावरुण और अच्छावाक् को तथा अहीनों