ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३६५
यदि इस प्रकार समझकर 'ब्राह्मणाच्छंसी' हर रोज़ इन्द्र का
आह्वान करता है तो कोई अन्य इन्द्र को ले नहीं जा सकता ।
'यत् सोम आसुते नर' ( ऋ० ७।६४।१० )
यह अच्छावाक् का मंत्र है । इसमें "इंद्राग्नी अजोहवुः"
( इन्द्राग्नी को उन्होंने बुलाया ) ऐसा पद आया है । इस प्रकार
इन्द्राग्नी को उन्होंने हर रोज़ बुलाया । जब अच्छावाक् रोज़
इसको बुलाता है तो कोई और इन्द्राग्नी को ले नहीं जा
सकता ।
यह ऋचायें नावें हैं जो स्वर्गलोक के किनारे तक पहुँचा
देती हैं। इन से यजमान इन लोकों को तरके स्वर्ग लोक को
पहुँच जाते हैं । (३)
७—अब इन के अन्त के मंत्र कहते हैं :—
ते स्याम देव वरुण...( ऋ० ७।६६।६ )
यह मैत्रावरुण का परिधानीय या अन्त का मंत्र है।
इसमें एक पद आया है "इषं स्वश्चधीमहि", ( हम अन्न और
प्रकाश धारण करें ) । इससे वे दोनों लोकों को प्राप्त करते हैं ।
अन्न से यह लोक और प्रकाश ( स्वः ) से दूसरा लोक ।
“व्यंतरिक्षमतिरद्” ( ऋ० ८।१४।७-६ )
यह तीन ऋचायें विवृत हैं । इन से ब्राह्मणाच्छंसी स्वर्ग
के द्वार खोल देता है ।
“अत्यंतरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना ।
इंद्रो यदभिनद्वलम्” (ऋ० ८।१४।७ )
( इंद्र ने सोम के मद में सूराख को खोल दिया और प्रकाश
आने दिया ) इससे दीक्षित लोगों का जोश प्रकट होता है।
इसीलिये इस ऋचा को बलवती ( बलवाली । इस मंत्र में 'वल'
शब्द है 'बल' नहीं ) कहते हैं ।