ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ [ छठी पञ्चिका
यह पाँच दिनों में पढ़े जाते हैं :—चतुर्विंश, अभिजित् ,
विषुवत्, विश्वजित् और महाव्रत । यह दिन 'अहीन' हैं । क्योंकि
इनमें कुछ छूटता नहीं ( न हि एषु किंचन हीयते ) । यह दिन
'परांचि' हैं । अभ्यावर्त्ति नहीं । अर्थात् यह बार बार नहीं
आते । इस लिये इन दिनों अहीन सूक्त पढ़े जाते हैं । इनको
पढ़ते हुये वह समझते हैं "हम स्वर्ग लोक को पूर्ण रूप से और
समृद्धता से प्राप्त होवें" । जब यह इनका पाठ करते हैं तो इंद्र
को बुलाते हैं जैसे गाय के पास बैल को बुलाते हैं । यह पाठ
सिलसिले को क़ायम रखने के लिये करते हैं । इससे सिलसिला
कायम रहता है ॥(२)
१९—इसलिये मैत्रावरुण षडह के पहले तीन दिनों में से
हर दिन इन तीन संपातों को विपर्यास अर्थात् उल्टे क्रम से
पढ़ता है । पहले दिन "एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्", दूसरे दिन
"यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टी", तीसरे दिन "कथा महामवृधत्
कस्य होतुः" ।
ब्राह्मणाच्छंसी तीन संपात सूक्तों को एक करके एक-एक
दिन ( दूसरे तीन दिनों में ) विपर्यास अर्थात् उलटे क्रम से
पढ़ता है :—पहले दिन, "इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्कैः"; दूसरे
दिन, "एक इदद्व्योश्चर्षणीनाम", तीसरे दिन, "यस्तिग्मशृङ्गो
वृषभो न भीम" ।
अच्छावाक तीन संपात सूक्तों को एक एक करके विपर्यास
( उलटे क्रम ) से एक एक दिन पढ़ता है :--
पहले दिन, "इमामूषु प्रभृति सातयेधा"; दूसरे दिन
"इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः"; तीसरे दिन, "शासद् वह्नि-
र्दुहितुर्नप्त्यंगात्" ।
यह नौ और तीन सूक्त जो प्रतिदिन पढ़े जाते हैं बारह हो
जाते हैं । बारह मासों का संवत्सर होता है । संवत्सर प्रजा-