ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
प्रथम अध्याय ] ९९
करले। जब मैत्रावरुण आदेश देता है तो वह मन द्वारा वाणी
को प्रेरित करता है। मन द्वारा वाणी को प्रेरित करके वह हव्य
को देवों के ग्रहण के योग्य करता है । (५)
६-अब होता कहता है, "हे शांति करने वाले देवो और
शांति करने वाले मनुष्यो ! आरंभ करो।" इसका तात्पर्य यह है
कि जो देवों में शांति करने वाले हैं और जो मनुष्यों में शांति
करने वाले हैं उन सब को आदेश करता है। "यज्ञ के स्वामी
अर्थात् यजमान और उसकी पत्नी के लिये यज्ञ की सफलता की
प्रार्थना करते हुये यज्ञ के योग्य सुन्दर द्वार बनाओ।"
पशु मेध है। और यजमान मेधपति है। इस प्रकार होता
यजमान को उसी के मेध से बढ़ाता है। इसीलिये वह ठीक कहते
हैं कि जिस देवता के लिये पशु लाया जाता है (आलभ्यते)
वही मेध-पति हैं। यदि एक देवता के लिये पशु हो तो कहना
चाहिये 'मेधपतये' (एकवचन चतुर्थी)। यदि दो देवतों के लिये,
तो "मेधपतिभ्यां" (द्विवचन चतुर्थी)। यदि बहुत से देवतों के
लिये, तो "मेधपतिभ्यः" (बहुवचन चतुर्थी)। यही स्थिति है।
"इसके लिये आग लाओ।" जब पशु को ले जा रहे थे तो उसे
सामने मौत दिखाई दी। उसने देवों के पीछे जाना न चाहा तब
देवों ने उससे कहा, "तू चला आ ! हम तुझे स्वर्ग को ले
जायंगे।" उसने कहा, "अच्छा तुम में से एक आगे-आगे
चलो।" उन्होंने कहा, "अच्छा" और अग्नि उसके आगे-आगे
चला। और वह अग्नि के पीछे चला। इसीलिये कहते हैं कि
प्रत्येक पशु अग्नि का है क्योंकि वह अग्नि का अनुसरण करता
है। इसीलिये अग्नि को आगे-आगे ले जाते हैं।
"दर्भ बिछा दो।" पशु ओषधियों पर जीता है। इस प्रकार
वह पशु को सब आत्मायुक्त करता है (अर्थात् घास पशु का
आत्मा है)।
१०० [ दूसरी पत्रिका
"माँ, बाप, भाई, बहिन, मित्र और साथी इस पशु को दे दें।"
(ऐसा कहकर) वह पशु को लेते हैं मानों माँ बाप ने उसे
हवाले कर दिया। 'इसके पैर उत्तर को करो। इसकी आँखें
सूर्य की ओर करो। इसके प्राण वायु के लिये छोड़ो। जीवन
को अन्तरिक्ष के लिये, कानों को दिशाओं के लिये, शरीर को
पृथिवी के लिये।" इस प्रकार वह उन-उन शरीर के भागों को
उन-उन लोकों के हवाले करता है।
"पूरा चमड़ा उतार लो। नाभि काटने से पूर्व वपा अर्थात्
अंतड़ियों (Omentum) को काट लो। इसको सांस को
(मुँह बन्द करके) भीतर ही रोक दो।"
इस प्रकार होता पशु को प्राण धारण कराता है। 'इसकी
छाती को श्येन (गरुड) की आकृति का कर दो। बाहुओं को
प्रशस (hatchets) की आकृति का। भुजाओं के अगले भागों
को भालों के समान, कन्धों को दो कछुओं की आकृति का,
कमर को न तोड़ो, जांघों को ढालों के समान, दोनों घुटनों को
स्रेकवृक्ष के पत्तों के समान। इसकी छब्बीस पसलियों को क्रम-
पूर्वक निकाल लो। इसके अंग अंग को पूरा रक्खो।" इस
प्रकार यह शरीर के अङ्गों को लाभ पहुँचाता है।
"इसके मल मूत्र के छिपाने के लिये भूमि में गड्ढा खोदो।"
मलमूत्र 'ओषध' अर्थात् वनस्पति का होता है। पृथिवी वनस्पति
की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार होता इस मल मूत्र को उसी की
ठीक जगह में रख देता है। (६)
७—"रुधिर राक्षसों को दे दो।" देवों ने राक्षसों को
यज्ञ की हवियों से वंचित कर दिया और उन को भूसी तथा
छोटे दाने दिये। और यज्ञ से निकाल कर उनको रुधिर अर्पण
किया। इसलिये होता कहता है, "रुधिर राक्षसों को दे दो।"
राक्षसों को रुधिर देकर वह उनको यज्ञ के अन्य भाग से वंचित
प्रथम अध्याय ] १०१
कर देता है। इस विषय में कुछ लोगों का कहना है कि यज्ञ में
राक्षसों का नाम भी न लेना चाहिये, कोई भी राक्षस क्यों न
हो। यज्ञ राक्षसों से सर्वथा मुक्त होना चाहिये। इस पर कुछ
लोगों का उत्तर है कि उनका नाम लेना चाहिये। जो जिसका
अधिकारी है उसको उस भाग से जो वंचित कर देता है वह
दण्डनीय होता है; यदि वह नहीं तो उसका पुत्र, यदि पुत्र नहीं
तो उसका पोता।
परन्तु यदि होता (राक्षसों का) नाम ले तो धीरे से ले।
क्योंकि जो धीमी आवाज है वह भी छिपी हुई है और जो
राक्षस हैं वह भी छिपे हुये हैं। यदि जोर से नाम लेगा तो उसकी
आवाज राक्षसों की सी हो जायगी। जो कोई क्रोध में बोलता
है या उन्मत्त होकर बोलता है उसकी राक्षसी बोली हो जाती
है। जो इस रहस्य को समझता है वह न तो स्वयं क्रुद्ध होगा,
न उसकी सन्तान में कोई ऐसा होगा। "उल्लू के समान आकृति
वाली अंतड़ियों को न काटो ! हे वध करने वालो (शमितारः),
और न तुम्हारे पुत्रों या सन्तान में कोई ऐसा हो जो इनको
काटे।" ऐसा कह कर वह इन अंतड़ियों को वध करने वाले
देवतों और वध करने वाले मनुष्यों को दे देता है।
अब कहता है।
"हे अध्रिगु ! मारो, अच्छी तरह मारो। हे अध्रिगु मारो।"
अब तीन बार कहे "अपाप" (अर्थात् पाप न लगे ! अप !
अप ! दूर ! दूर !)
देवों में अध्रिगु वह है जो 'शमिता' अर्थात् पशु को चुप
करता है। और अपाप वह है जो उसे नीचे डालता है। इन
शब्दों को कह कर वह पशु को उनके हवाले कर देता है जो
उसे चुप करते हैं या जो इसका वध करते हैं। होता तब कहता
है कि "हे वध करने वालो (शमितारः), जो कुछ भी सुकृत
१०२ [ दूसरी पञ्चिका
अर्थात् पुण्यकर्म है वह इसमें रहे, और दुष्कृत है वह अन्यत्र
चला जाय ।” इस वाचा से (अर्थात् इन शब्दों से) होता
(पशु वध का) आदेश देता है, क्योंकि जब अग्नि देवताओं
का होता था, तब उसने भी इन्हीं शब्दों से (पशु के) वध का
आदेश दिया था ।
इन शब्दों से ही होता (समस्त दुष्परिणामों को) उनसे
अलग कर देता है जो पशु का दम घोंटते हैं और जो उसका
वध करते हैं और जो कई प्रकार से नियमों का उल्लंघन करते
हैं, जैसे एक टुकड़े को अति शीघ्र काट डालना और दूसरे को
अति विलम्ब से, अथवा एक टुकड़े को बहुत बड़ा काट डालना,
और दूसरे को बहुत छोटा । इस प्रकार सुख प्राप्त करता हुआ
होता अपने को (पापों से) मुक्त कर लेता है, और सर्वायु
अर्थात् पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, पूर्णायु प्राप्ति के लिए
(वह समर्थ होता है) । जो इस (रहस्य को) जानता है, वह
पूर्णायु प्राप्त करता है ।
८—देवताओं ने (यज्ञ के लिये) पुरुष पशु को प्राप्त किया
(या मारा) । पर उसका वह अंश जो मेध बनने या आहुति
के योग्य था, उसमें से निकल गया और घोड़े में प्रविष्ट हो
गया । और तब घोड़ा मेध्य पशु बन गया । तब देवताओं ने
पुरुष को निकाल दिया, क्योंकि उसमें से वह भाग निकल चुका
था, जो मेध्य था, और जिसके निकल जाने पर वह “किंपुरुष”
अर्थात् सर्वथा अयोग्य हो चुका था ।
देवताओं ने तब घोड़े को मारा, पर मेध उसमें से निकल
कर गौ (गाय या बैल) के शरीर में पहुँच गया, और तब गौ
मेध्य बन गई । देवताओं ने अश्व को निकाल दिया क्योंकि
अश्व के शरीर में से वह अंश निकल गया था जिसके कारण
प्रथम अध्याय ] १०३
वह मेध्य था और जिसके निकल जाने पर वह "गौरमृग" बन
गया था।
देवताओं ने तब गौ को मारा, पर गौ में से भी मेध निकल
गया, और भेड़ के शरीर में प्रविष्ट हुआ, और तब भेड़ मेध्य
बन गयी। जिस गाय में से मेध निकल चुका था उसको देवों ने
निकाल दिया। और वह नील गाय बन गई। उन्होंने भेड़ को मार
डाला। मरी हुई भेड़ में से मेध निकल कर बकरी में प्रविष्ट हुआ
और बकरी मेध्य हो गई। जिस भेड़ में से मेध निकल चुका था
उसे देवों ने निकाल दिया और वह ऊँट बन गई। बकरी में मेध
बहुत दिनों तक रहा। इसलिये सब पशुओं में बकरी सब से
अधिक बलि के योग्य है। उन्होंने बकरी को मारा। उस मरी हुई
बकरी से मेध निकल कर पृथिवी में घुस गया। इसलिये पृथिवी बलि
के योग्य हो गई। मरी हुई बकरी से जो मेध निकल गया तो देवों
ने उसे निकाल दिया और वह शरभ बन गया।
जिन पशुओं में से मेध निकल चुका वह अमेध्य हो गये।
इसलिये उनका मांस न खाना चाहिये।
जब मेध पृथिवी में चला गया, तो देवों ने उसे घेर लिया।
वह चांवल (व्रीहि) हो गया। जब पशु के वध के पश्चात्
पुरोडाश को बांटते हैं तो यह इच्छा करते हैं कि हमारी पशु-
इष्टि मेधयुक्त हो। जो इस रहस्य को समझता है उसका
पशु मेधयुक्त हो जाता है और उसमें इष्टि का पूर्ण रूप आ
जाता है। (८)
९-(पशु-इष्टि में) जो पुरोडाश होता है वही मारा जाने
वाला पशु है। चावल की जो किंशारु अर्थात् भूसी है वही पशु
के लोम के तुल्य है। जो तुषा है वह खाल के। जो छोटे-छोटे
कण हैं वह रुधिर के, चावल की पिट्ठी मांस के। जो कसार या
कठोर भाग है वह हड्डियों के। जो चावल के पुरोडाश से
१०४ [ दूसरी पत्रिका
यज्ञ करता है वह मानो सब पशुओं के मांस से यज्ञ करता
है। इसीलिये कहते हैं कि पुरोडाश का सत्र या यज्ञ करना
चाहिये।
अब वपा के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :—
युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम संक्रतू अबद्धतम् ।
युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान् ॥
(ऋ० १।६३।५)
(हे अग्नि और सोम ! तुम दोनों ने संयुक्त परिश्रम से
आकाश में इन प्रकाश-युक्त पदार्थों को रक्खा है। हे अग्नि और
सोम ! तुम दोनों ने (राक्षसों द्वारा) ली हुई नदियों को अपवित्र
और खराब होने से मुक्त किया है)।
जो दीक्षित होता है वह सब देवताओं से ग्रहण किया हुआ
होता है। इसलिये कहते हैं कि दीक्षित के घर में न खाना
चाहिये। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि वपा के लिये जो आहुति
दी जाय उसमें से अवश्य खा लेना चाहिये क्योंकि मंत्र में है कि
"अग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान्" इससे वह यजमान को सब
देवताओं से छुड़ा देता है। इसीलिये तो वह यजमान हो जाता
है, देवताओं के लिये दीक्षित नहीं रहता।
अब पुरोडाश के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :—
अन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रेः ।
अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम् ॥
(ऋ० १।६३।६)
(मातरिश्वा द्यौलोक से अन्य को लाया। श्येन पत्थर से दूसरे
को लाया।)
इन शब्दों से यह अभिप्राय है कि जैसे पत्थर से आग
निकली इसी प्रकार मेघ भी निकल गया था उसे वापिस लाया
गया।
ब्राह्मण में मनोता स्त्रीलिङ्ग है (मनोतायै) और ऋग्वेद में
. प्रथम अध्याय ] १०५
नीचे के मंत्र से स्विष्टकृत पुरोडाश की आहुति दी जाती
है :-
स्वदस्व हव्या समिषोदीदीह्यस्मद्रयवसं मिमीहि श्रवांसि ।
विश्वाँ अग्ने पृत्सु ताञ्जेषु शत्रूनहा विश्वा सुमना दीदिही नः ॥
( ऋ० ३।५४।२२ )
इसके द्वारा होता यजमान को आहुति का फल प्राप्त करा
देता है और अपने लिये अन्न और ऊर्ज (दूध आदि रस) प्राप्त
कराता है ।
अब वह इला कहता है । पशु ही इला हैं । इस प्रकार वह
पशुओं को बुलाता है और उनको यजमान की प्राप्ति करा
देता है । (६)
१०-अब अध्वर्यु होता से कहता है :-"मनोता* के लिये
हवि देने के निमित्त जो भाग काटे जाते हैं उनके प्रसंग का मंत्र
पढ़ो । वह ऋग्वेद मंडल ६ का पहला सूक्त पढ़ता है जिसमें तेरह
मंत्र हैं :---
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता । त्वं सीं वृषन्न-
कृणोर्दुष्टरीतु सहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै ॥ (ऋ० ६।१।१)
(हे अग्नि ! तू पहला मनोता अर्थात् विचारों का बुनने वाला,
Weaver of Thoughts, है । हे दस्म अर्थात् दर्शनीय अग्नि ! तू
इस बुद्धि का होता अर्थात् बुलाने वाला है । हे वृषन् अर्थात्
बलवान अग्नि ! तू ऐसा है जिसको कोई सता नहीं सकता ।
तूने सब बलवान शत्रुओं को पराजित करने के लिये बल धारण
किया है) ।
अधा होता न्यसीदो यजीयानिलस्पदे इषयन्नीड्यः सन् । तं त्वा नरः
प्रथमं देवयन्तो महो राये चितयन्तो अनुग्मन् ॥ . (ऋ० ६।१।२)
*ब्राह्मण में मनोता स्त्रीलिङ्ग है (मनोतायै) और ऋग्वेद में
पुँल्लिंग (प्रथमो मनोता) !
२०६ [ दूसरी पञ्चिका
( हे अग्नि ! तू आज बड़ा यज्ञ करने वाला होता बनकर
पृथ्वी या वेदी के ऊपर बैठा है, पूज्य होता हुआ और इषयन्
अर्थात् हमारा भला चाहता हुआ । नेता लोग पहले तेरी इच्छा
करते हुये ही और बड़े धन का विचार करते हुये तेरे ही
पीछे चले ) ।
[ (सः अग्निः) वह अग्निः (सपर्य्यण्यः) पूज्य (प्रियः) प्रिय
(विक्षु) लोगों में (होता) होता, (मन्द्रः) सुखकारी (यजीयान्)
यज्ञ का अधिकारी होकर (निषसाद) स्थित है। (वयं) हम लोग
ज्ञुबाधः) घुटने टिकाये हुये (नमसा) नमस्कार द्वारा (तं त्वा
दीदिवांसं) उस तुझ प्रकाश युक्त को (दमे) घर में (उप आसदेम)
प्राप्त होते हैं ]
तं त्वा वयं सुध्यो नव्यमग्ने सुम्नायव ईमहे देवयन्तः । त्वं विशो
अनयो दीद्यानो दिवो अग्ने बृहतारोचनेन ॥ ( ऋ० ६।१।७ )
[ (सुध्यः) बुद्धिमान् (सुम्नायव) सुख चाहने वाले (देवयन्तः)
देवों की पूजा करने वाले (वयं) हम लोग (तं त्वा नव्यम् ) उस
तुझ पूजनीय को (ईमहे) खोजते हैं। (त्वं) तू (दीद्यानः) प्रकाश-
वान् (अग्ने) हे अग्नि, (बृहता रोचनेन) बहुत प्रकाश के साथ
(विशः) लोगों को (दिवः) दिवा लोक में (अनयः) ले जाता है । ]
विशां कविं विश्पतिं शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेती-
षणिमिषयन्तं पावकं राजन्तमग्निं यजतं रयीणाम् ॥ ( ऋ० ६।१।८ )
[ हम तुझ अग्नि की उपासना करते हैं जो तू (शश्वतीनां
विशां) सदा रहने वाले लोगों का (कविं) उपदेश या प्रकाश
करने वाला (विश्पतिं) स्वामी, (नितोशनं) शत्रुओं का घातक,
(वृषभं) कामनों की वर्षा करने वाला, (चर्षणीनाम् ) स्तुति करने
वालों का (प्रेतीषणिं) प्राप्ति के योग्य (इषयन्तं) अन्न देने वाला,
(पावकं) पवित्र करने वाला (राजन्तं) प्रकाशयुक्त (रयीणाम)
धनों द्वारा (यजतं) पूजनीय है । ]
प्रथम अध्याय ] १०७
सो अग्न ईजे शशमे च मर्तो यस्त आनट् समिधा हव्यदातिम् ।
य आहुतिं परि वेदा नमोभिर्विश्वेत्स वामा दधते त्वोतः ॥
( ऋ० ६ । १ । ६ )
[ (अग्ने) हे अग्नि ! (सः मर्त्तो) वह मनुष्य (ईजे) पूजता है
(शशमे) और स्तुति करता है (यः) जो (ते) तुझको (समिधा)
समिधा के साथ (हव्य दातिम् ) हवियों को ( आनट् ) लाता है ।
(यः) जो (नमोभिः) स्तुतियों द्वारा (आहुतिं) पूजा को (परिवेद)
समझता है । (सः) वह (त्वोतः) तुझसे रक्षा किया हुआ होकर
( विश्वेत् ) सब (वामा) सुखों को (दधते) धारण करता है ।
अस्मा उ ते महि महे विधेम नमोभिरग्ने समिधोत हव्यैः । वेदी
सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैरा ते भद्रायां सुमतौ यतेम ॥ (ऋ० ६।१।१०)
घृतेव यन्तं बहुभिर्वसव्यैस्त्वे रयिं जागृवांसो अनुग्मन् ।
रुशन्तमग्निं दर्शतं बृहन्तं वपावन्तं विश्वहा दीदिवांसम् ॥
( ऋ० ६।१।१३ )
[ (बहुभिर्वसव्यैः) बहुत धनों के साथ (घृता इव यन्तं) मार्ग
पर जाते हुये के समान तेरे (अनुग्मन् ) पीछे चलते हैं, (त्वे रयिं
जागृवांसो) वे लोग जो तुझ में अपने धन को अर्पण कर देते
हैं । तू कैसा है ? रुशन्तम् अर्थात् प्रकाशवान, अग्नि, दर्शतं
अर्थात् सुन्दर, बृहन्तं अर्थात् बड़ा, वपावन्तं* अर्थात् बीज को
बोने की शक्ति रखने वाला है, विश्वहा दीदिवांसम् अर्थात् सदा
चमकने वाला है ]
पदं देवस्य नमसायन्तः श्रवस्यवः श्रव आपन्नमृक्तम् ।
*‘वपा’ का अर्थ चटनी किया जाता है । परन्तु वप् धातु में अच्
प्रत्यय करके ‘वपा’ बनाता है । वप् का अर्थ है बीज बोना । अग्नि को
चर्बीवाला कहने का कोई तात्पर्य नहीं । इस दृष्टि में केवल ‘वपा’ शब्द
के कारण इस को पशु की वपा के साथ सम्बद्ध किया है ।
१०८ [ दूसरी पत्रिका
नामानि चिद्दधिरे यज्ञियानि भद्रायां ते रणयन्त संदृष्टौ ॥
( ऋ० ६।१।४ )
[ (नमसा) नमस्कार द्वारा (देवस्य पदं व्यन्तः) देव के पद
को प्राप्त होते हुये (श्रवस्यवः) अन्न चाहने वालों ने (अमृक्तम्)
अक्षय (श्रवः) अन्न को (आपन्) प्राप्त किया । (ते भद्रायां
सन्दृष्टौ रणयन्तः) तेरी कल्याणकारक स्थिति में रमण करते हुये
लोगों ने (यज्ञियानि नामानि) पूज्य नामों को (दधिरे) धारण
किया । ]
त्वां वर्धन्ति क्षितयः पृथिव्यां त्वां राय उभयासो जनानाम् ।
त्वं त्राता तरणे चेत्यो भूः पिता माता सदमिन् मानुषाणाम् ॥
( ऋ० ६।१।५ )
[ हे अग्नि ! (त्वां) तेरी (क्षितयः) मनुष्य (पृथिव्यां) पृथिवी
पर (वर्धन्ति) प्रशंसा करते हैं । (जनानाम्) मनुष्यों के
(उभयासः) दोनों लोक सम्बन्धी (रायः) धन (त्वां) तुझको बढ़ाते
हैं। (तरणे) हे तारने वाले (चेत्यः) चिन्तन करने के योग्य होकर
(त्राता अभूः) तू रक्षक हो गया है । (सदमित्) सदा (मानुषा-
णाम्) मनुष्यों का (पिता) बाप और (माता) माता है। ]
सपर्यंण्यः स प्रियोविक्ष्वग्निर्होता मन्द्रोनिषसादा यजीयान् । तं त्वा वयं
दम आ दीदिवांसमुप ज्ञुबाधो नमसा सदेम ॥ ( ऋ० ६।१।६ )
[ (अग्ने) हे अग्नि ! (सहसः सूनो) साहस के उत्पन्न करने
वाले हम (अस्मै ते मन्हे) उस तुझ बड़े की (महि विधेम)
बहुत पूजा करें (समिधा) समिधा द्वारा (नमोभिः) स्तुतियों
द्वारा (हव्यैः) हव्य द्वारा । (वेदी) वेदी में (गीर्भिः) गीतों
द्वारा (उक्थैः) स्तोत्रों द्वारा । (ते भद्रायां सुमतौ यतेम) तेरी
कल्याणकारक सुमति के लिये कोशिश करें । ]
आदस्ततन्थ रोदसी वि भासा श्रवोभिश्च श्रवस्यस्तरुत्रः । बृहद्भि-
र्वाजैः स्थविरेभिरस्मे रेवद्द्भिरग्ने वितरं वि भाहि ॥ ( ऋ० ६।१।११ )
पहला अध्याय ] १०९
[ ( यः ) जिसने ( रोदसी ) द्यौ और पृथ्वी को ( भासा )
प्रकाश से ( वि ततन्थ ) ढांप रक्खा है। ( च ) और ( तरुतः )
तारने वाला तू ( श्रवोभिः ) स्तुतियों द्वारा ( श्रवस्यः ) प्रशंसित
होता है। ( अग्ने ) हे अग्नि ! तू ( अस्मे ) हमारे लिये ( बृहद्भिः
वाजैः ) बड़े अन्नों द्वारा ( स्थविरेभिः देवद्भिः ) और स्थूल धनों
द्वारा ( वितरं ) विशेष रीति से ( वि भाहि ) प्रकाश युक्त हो । ]
नृवद्वसो सदमिद्धेह्यस्मे भूरि तोकाय तनयाय पश्वः ।
पूर्वीरिषो बृहतीरारे अघा अस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु ॥
( ऋ० ६।१।१२ )
[ (वसो) हे वसु ! ( अस्मे ) हमारे लिये ( सदमिद् ) सदा
( भूरि ) बहुत ( पश्वः ) पशुओं को ( नृवद् ) जिनकी मनुष्यों
को आवश्यकता होती है ( तोकाय ) सन्तान के निमित्त (तनयाय)
पुत्र के निमित्त ( देहि ) दीजिये। (अस्मे ) हमारे लिए (पूर्वीः)
पूर्ण ( बृहतीः ) बड़े ( आरे अघा ) पापों से मुक्त ( भद्रा )
कल्याण करने वाले ( सौश्रवसानि ) यश को प्राप्त कराने वाले
( इषः ) अन्न ( सन्तु ) होवें ]
पुरूण्यग्ने पुरुधा त्वाया वसूनि राजन् वसुता ते अश्याम् । पुरूणि
हि त्वे पुरुवार सन्त्यग्ने वसु विधते राजनि त्वे ॥ ( ऋ० ६।१।१३ )
( राजन् अग्ने ) हे अग्नि राजा ! ( त्वाया ) तेरे ( पुरूणि )
बहुत से ( पुरुधा ) गाय घोड़े रूपी ( वसूनि ) धन ( ते ) तेरी
( वसुता ) कृपा से ( अश्यां ) मैं भोगूँ । ( पुरुवार अग्ने ) हे
वरण करने योग्य अग्नि ! ( त्वे राजनि ) तुझ राजा में ( विधते )
गुरु, उपासक या सेवक के लिए ( पुरूणि ) बहुत से ( वसु )
धन ( सन्ति ) हैं ।
यहाँ पर एक आक्षेप है कि जब पशु अन्य देवता का है तो
मनोता के लिये अङ्ग काटने में अग्नि के सूक्त को क्यों पढ़ते हैं ।
इसका उत्तर यह है कि देवों में तीन मनोता हैं जिनमें त्रिचार
११० [ दूसरी पञ्चिका
ओत प्रोत हैं । देवों में वाणी मनोता है जिसमें उनके विचार
ओतप्रोत हैं । देवों में गौ मनोता है जिसमें उनके विचार ओत-
प्रोत हैं । इन तीनों में अग्नि पूरा मनोता है । क्योंकि इसमें सब
मनोता शामिल हैं । इसलिये मनोता के लिए हव्य काटने में
अग्नि-सम्बन्धी सूक्त पढ़ा गया ।
अग्नीषोमा हविषः प्रस्थितस्य वीतं हर्यतं वृषणा जुषेथाम् । सुशर्माणो
स्ववसा हि भूतमथाधत्तं यजमानाय शं योः । ( ऋ० १।९३।७ )
हवि के लिए नीचे का याज्य मन्त्र पढ़ता है :-
( हे अग्नि और सोम ! बलवान् आप इस उपस्थित हवि को
खाइये, ग्रहण कीजिये और प्रसन्न हूजिये । हमको कल्याण और
कृपा से युक्त कीजिये । यजमान के लिये कल्याण दीजिये । )
इसमें 'हविष' शब्द है यह रूपसमृद्धता है । 'प्रस्थितस्य'
शब्द भी रूपसमृद्धता देता है । जो इस रहस्य को समझता है
उसका हवि समृद्धि को देता और देवों को पहुँचाता है ।
वह वनस्पति के लिये आहुति देता है । प्राण ही वनस्पति
है । जो इस रहस्य को समझ कर वनस्पति को आहुति देता है
उसका हव्य जीवयुक्त होकर देवों को प्राप्त होता है ।
अब वह स्विष्टकृत आहुति देता है । स्विष्टकृत प्रतिष्ठा है ।
इसी प्रतिष्ठा अर्थात् स्विष्टकृत में अन्त में वह यज्ञ को स्थापित
करता है ।
अब इला का आह्वान करता है । पशु ही इला हैं । इस
प्रकार पशुओं का आह्वान करता है । पशुओं को यजमान में
धारण कराता है । (१०)
ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त
दूसरा अध्याय
११—देवों ने यज्ञ फैलाया। वह जब यज्ञ पूर रहे थे उस
समय असुरों ने आक्रमण किया कि हम यज्ञ को रोक दें। उन्होंने
पूर्व की ओर से यूप पर आक्रमण किया जब आप्रि मंत्र पढ़े
जा चुके थे और अग्नि पशु के चारों ओर नहीं ली जाई गई थी।
देव जग पड़े और अपनी तथा यज्ञ की रक्षा के निमित्त
अग्नि रूपी तीन दीवारें चारों ओर बना दीं। असुरों ने इन
दीवारों को जलता हुआ और चमकता हुआ देखकर आक्रमण
न किया। वे भाग गये। देवों ने असुरों को पूर्व में भी हरा दिया
और पश्चिम में भी। इसीलिये यजमान लोग अग्नि को पशु के
चारों ओर ले जाते हैं और मन्त्र पढ़ते हैं। क्योंकि वह जलती
हुई आग के रूप में तीन दीवारें बना देते हैं, अपनी रक्षा के
लिए और यज्ञ की रक्षा के लिये।
जब पशु को आप्रि मंत्र पढ़कर पवित्र कर लिया और अग्नि
को चारों ओर फिरा लिया तो वह उसे उत्तर की ओर ले जाते
हैं। उसके आगे आगे जलती हुई लकड़ी ले जाते हैं मानो पशु
( १११ )
११२ [ दूसरी पञ्चिका
अन्त को यजमान ही तो है। वह मानते हैं कि इस प्रकाश द्वारा
यजमान स्वर्ग को जायगा और इस प्रकार यजमान स्वर्ग को
जाता है।
जहाँ पशु मारा जाने वाला है वहाँ अध्वर्यु दर्भ छोड़ देता
है। जब आप्री मंत्र पढ़कर और अग्नि को चारों ओर फिरा कर,
पशु को वेदी के बाहर लाते हैं तो दर्भों पर बिठा देते हैं। उसके
मलमूत्र के लिये गड़्ढा खोदते हैं। मलमूत्र वनस्पति से सम्बन्ध
रखते हैं। वनस्पति का उपयुक्त स्थान भूमि है। इस प्रकार
वह इनको उपयुक्त स्थान में रखते हैं। इस पर आक्षेप होता है
कि जब समस्त पशु हवि है और जब उसके बहुत से भाग जैसे,
रोम, त्वचा, रुधिर, अधपचा खाना, खुर, सींग गिर पड़ते हैं तो
यह कमी कैसे पूरी की जाती है। इसका उत्तर यह है कि यदि
पशु के साथ पूरा पूरा पुरोडाश भी आहुति में दिया जाय तो
यह कमी पूरी हो जाती है। जब पशुओं में से मेध निकल गया
तब चावल और जौ उत्पन्न हुये। जब पशु के साथ पूरा-पूरा
भाग करके पुरोडाश डालते हैं तो समझते हैं कि पशु को मेध
के साथ आहुत किया। पूरा पशु आहुत किया।” जो इस
रहस्य को समझता है उसका पशु पूरा पूरा आहुत होता है। (१)
१२—उसकी वपा को निकाल कर (भूनने के लिये) लाते हैं।
अध्वर्यु स्रुवा से घी टपकाता है और जब बूँदें टपकती हैं तो
कहता है, “इसके योग्य मंत्र पढ़ो।” बूँदें सभी देवतों की होती
हैं। शायद वह सोचे कि यह मेरे नहीं हैं। और वे बिना निर्देश
किये ही देवों के पास चली जायें (परन्तु उसको अनुवाक्य
पढ़ना चाहिये)। वह पढ़ता है :—
जुषस्व सप्रथस्तमं वचो देवप्सरस्तमम् । हव्या जुषानि आसनि ॥
(ऋ० १।७५।१)
दूसरा अध्याय ] ११३
हमारी अति विस्तीर्णां और देवों के लिये प्रिय वाणी को
स्वीकार कर। जब तेरे मुँह में आहुतियाँ पड़ती हों)।
इस मंत्र से वह अग्नि के मुख में वह बूँदें डालता है। अब
वह तीसरे मंडल के २१वें सूक्त को पढ़ता है :—
इमं नो यज्ञममृतेषु धेहीमा हव्या जातवेदो जुषस्व। स्तोकानामग्ने
मेदसो घृतस्य होतः प्राशान प्रथमो निषद्य॥ (ऋ० ३।२१।१)
(हमारे इस यज्ञ को अमर लोगों में रख। हे जातवेद अग्नि!
हमारी आहुतियों को स्वीकार कर! हे होता अग्नि! पहले बैठकर
चिकने घी की बूँदों को खा।)
घृतवन्तः पावक ते स्तोकाः श्चोतन्ति मेदसः। स्वधर्मन् देववीतये श्रेष्ठं
नो धेहि वार्यम्॥ (ऋ० ३।२१।२)
(हे पवित्र करने वाले चिकनी घी युक्त बूँदें तेरे लिए पड़
रही हैं। अपने धर्म के अनुसार श्रेष्ठवर को जो देवों के योग्य
है हमको दे)।
तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने विप्राय सन्त्य। ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे
यज्ञस्य प्राविता भव॥ (ऋ० ३।२१।३)
(हे अग्नि तुझ विप्र के लिये घी युक्त बूँदें पड़ रही हैं।
ऋषि और श्रेष्ठ तू प्रज्वलित होता है। तू यज्ञ का रक्षक
बन)।
तुभ्यं श्चोतन्त्यद्रिगो शचीवः स्तोकासो अग्ने मेदसो घृतस्य। कवि-
शस्तो बृहता भानुनागा हव्या जुषस्व मेधिर॥ (ऋ० ३।२१।४)
(हे तेज चलने वाले और शक्तिशाली अग्नि तेरे लिये घी
की चिकनी बूँदें पड़ रही हैं। कवियों द्वारा प्रशंसित और मेधिर
अर्थात् प्रज्ञावान् अग्नि तू बड़े प्रकाश से आया है। हमारी
आहुतियों को स्वीकार कर)।
ओजिष्ठं ते मध्यतो मेद उद्धृतं प्र ते वयं ददामहे। श्चोतन्ति ते
वसो स्तोका अधि त्वचि प्रति तान् देवशो विहि॥ (ऋ० ३।२१।५)
८
११४ [ दूसरी पञ्चिका-
( हम तेरे लिये बीच में से ली हुई और अत्यन्त ओज वाली
चिकनाई को अर्पण करते हैं। हे वसु अग्नि ! तेरी त्वचा पर बूँदें
पड़ती हैं। उनको देवों तक ले जा )।
पहले मंत्र में जो यह शब्द आये हैं "इमा हव्या जातवेदो
जुषस्व" इनसे वह हवि को स्वीकार कराता है। "स्तोकानामग्ने
मेदसो घृतस्य" ✤ इसमें घी और मेद ( चर्बी) की बूँदों का
वर्णन है। "होता प्राक्षान प्रथमो निषद्य" से तात्पर्य यह है कि
देवों का होता अग्नि है। इसलिये होता का अर्थ है अग्नि।
दूसरे मन्त्र में है "घृतवंतः पावक ते स्तोका श्चोतंति मेदसः"
इसमें घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। "स्वधर्म देववीतये श्रेष्ठं
नो धेहि वार्यम्" इससे आशीर्वाद चाहता है।
तीसरे मन्त्र में तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽअग्ने विप्राय सन्त्य"
यहाँ घी की बूँदों से तात्पर्य है। "ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे"
यज्ञस्यप्राविता भव" इससे यज्ञ की पूर्ति के लिये आशीर्वाद
देता है।
चौथे मन्त्र के पहले भाग "तुभ्यं श्चीतन्त्यधिगो...घृतस्य"
में घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। पिछले भाग "कवि...
मेधिर" में हव्य की स्वीकारी के लिये आशीर्वाद है।
पाँचवें मन्त्र "ओजिष्ठ......वीहि" के पश्चात् बूंदों के लिये
वषट्कार बोलता है।
अब वह अनुवषट्कार बोलता है। "सोमस्य अग्ने वीहि" में
'सोम' के स्थान में "स्तोकानां" ऐसा कहता है। बूंदें सब देव-
✤ ब्राह्मण में "मेदसश्च हि घृतस्य च" ऐसा पाठ है। 'च' वेद
मंत्र में नहीं है। 'च' के अभाव में 'मेदसः' 'घृतस्य' का विशेषण हो
जाता है परन्तु 'च' के द्वारा अलग करने से 'मेदसः' का 'चर्बी' अर्थ
होगा।
दूसरा अध्याय ] १.१५
तानों को होती हैं। इसीलिये पृथ्वी पर बूंद बूंद कर के वर्षा
होती है। (२)
१३—इस पर प्रश्न होता है कि 'स्वाहा' के लिये 'पुरोनु-
वाक्य' क्या हैं, “प्रैषः” क्या है और याज्य क्या हैं ? ( उत्तर
यह है कि जो पढ़े गये वह 'पुरोनुवाक्य' हैं, ऐसे ही 'प्रैष' और
ऐसे ही 'याज्य' । )
फिर प्रश्न होता है कि 'स्वाहाकृति' के देवता क्या हैं ?
इसका उत्तर देना चाहिये "विश्वे देवा" अर्थात् सब देवता ।
क्योंकि याज्य मन्त्र के अन्त में आता है "स्वाहाकृतं हविरदंतु
देवाः ।” देवों ने यज्ञ, श्रम और तप, और आहुतियों द्वारा स्वर्ग
लोक को जीता ।
'वपा' की आहुति देने के अनन्तर ही स्वर्ग लोक उनको दिखाई
दिया। उन्होंने दूसरे कृत्यों को सर्वथा छोड़कर वपा की आहुति
द्वारा ही स्वर्ग लोक की प्राप्ति की। इसके पश्चात् मनुष्य और
ऋषि देवों के यज्ञ स्थान को गये कि कुछ यज्ञ के विषय में ज्ञान
प्राप्त करें। उन्होंने इधर-उधर घूम फिर कर देखा कि एक पशु
मरा पड़ा है जिसकी अंतड़ियां निकली हुई हैं। तब उन्होंने जाना
कि यज्ञ के पशु में वपा का होना आवश्यक है। 'वपा' ही पशु
को पूर्ण बनाती है।
यह जो तीसरी आहुति में (पशु के वपा को छोड़ कर अन्य
भागों को ) भूनते हैं इससे तात्पर्य यह है कि हमारा यज्ञ बहुत
बहुत आहुतियों से पूर्ण हो। हमारा यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा हो।
जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ बहुत बहुत आहु-
तियों से पूरा होता है। उसका यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा होता है। (३)
१४—यह जो वपा की आहुति है यह अमृत की आहुति है।
अग्नि की आहुति अमृत-आहुति है। आज्य-आहुति अमृत-
आहुति है।
११६ [ दूसरी पञ्चिका
ये सब आहुतियाँ अशरीरी अर्थात् शरीर रहित हैं। इन्हीं
अशरीरी आहुतियों द्वारा यजमान अमृतत्व को प्राप्त करता है।
यह जो 'वपा' है वह वीर्य के सदृश है। जैसे वीर्य (गर्भा-
शय में) छिप जाता है उसी प्रकार वपा (अग्नि में) छिप
जाती है। जैसे वीर्य सफेद होता है उसी प्रकार वपा। जैसे
वीर्य अशरीरी होता है वैसे ही वपा। यह जो रुधिर और मांस
है यही शरीर हैं। इसलिये (होता अध्वर्य से) कहे, "जितना
रुधिर-शून्य है उसे काट डालो"। (वपा-आहुति में) पाँच भाग होते
हैं। चाहे यजमान के पास चार ही भाग क्यों न हों (अर्थात्
वपा-आहुति का एक भाग सोने की तश्तरी भी है। यदि यजमान
के पास सोने की तश्तरी न हो तो चार ही भाग रह जाते हैं
फिर भी इन चार के ही पाँच कर लिये जाते हैं) (१) चमचे से
घी डालना अर्थात् उपस्तरण क्रिया, ।(२) सोने की तश्तरी,
(३) वपा, (४) सोने की तश्तरी का घी, (५) घी की बूँदें
टपकाना।
यहाँ प्रश्न होता है कि यदि सोना न हो तो क्या करे।
(इसका उत्तर यह है) कि पहले दो बार घी को चमचे में डाले
अर्थात् दो बार उपस्तरण क्रिया करे, फिर वपा रक्खे, फिर
उस पर दो बार गर्म घी टपकावे। घी अमृत है। सोना भी
अमृत है। इससे घी टपकाने से यजमान का अभिप्राय पूरा हो
जाता है। दो बार के घृत लेने और सोने के सहित वपा-आहुति
के पाँच भाग हो जाते हैं।
पुरुष में भी पाँच भाग होते हैं, लोम, त्वचा, मांस, अस्थि,
मज्जा। होता वपा-आहुति द्वारा यजमान को पाँच भाग वाला बना
कर अग्नि में आहुति देता है जो देवों की योनि है। अग्नि देवों की
योनि है। आहुतियों द्वारा अग्नि की योनि में उत्पन्न होकर सोने
के शरीर के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। (४)
दूसरा अध्याय ] ११७
१५—अध्वर्यु कहता है, "होता ! प्रातःकाल वाले देवों के
लिये अनुवाक्य बोलो।" प्रातःकाल आने वाले देव हैं उषा, अग्नि
और दो अश्विन। यह देव सात सात छन्दों द्वारा आ जाते
हैं और उसके बुलाने से आ जाते हैं जो इस रहस्य को
समझता है।
प्रजापति होता के प्रातःकाल के अनुवाक्य बोलने पर देव
और असुर यज्ञ में आ पहुँचे और कहने लगे, "यह हमारे लिये
कहेगा। यह हमारे लिये कहेगा।" उसने केवल देवों के लिये
कहा। इस प्रकार देव असुरों से जीत गये। जो इस रहस्य को
समझता है वह अपने शत्रु, अहितकारी के ऊपर विजय पा
लेता है। इसको "प्रातरनुवाक्य" कहते हैं। क्योंकि प्रजापति
ने प्रातःकाल इसका उच्चारण किया था।
बड़ी रात से ही इसका पाठ करना चाहिये। जो पूर्ण वाणी
और पूर्ण ब्रह्म का गृहीता होता है और जो श्रेष्ठ होता है उसी की
बात लोग मानते हैं। इसलिये बहुत रात से ही उठ कर सबके
बोलने से पहले ही पाठ करे (अर्थात् प्रातःकाल सब से पहले
उसी की वाणी सुनाई दे)। यदि वह देर से उठकर पाठ करेगा
तो उसका पाठ 'पहले कहा हुआ' न होकर दूसरों का 'अनुवाद'
स्वरूप हो जायगा। इसलिये बड़ी रात से उठकर पाठ करना
चाहिये। मुर्गा से भी पहले बोलना चाहिये। यह जो पक्षी हैं, मुर्गा
सहित सब निर्ऋति (मृत्यु?) के मुख हैं। मुर्गा बोलने से पहले
'प्रातरनुवाक्य' बोलने का तात्पर्य यह है कि यदि अन्य (मनुष्य
या पशु) अपनी बोली सुना चुकेंगे तो यज्ञ सम्बन्धी वाणी नहीं
सुनाई जा सकेगी। इसलिये बड़ी रात से ही अनुवाक का पाठ
होना चाहिये।
जब अध्वर्यु उपाकर्म (कृत्य) करे तभी होता "प्रातरनुवाक"
बोले। जब अध्वर्यु उपाक्रम करता है तो वाणी से ही प्रारंभ
११८ [ दूसरी पञ्चिका
करता है। और होता भी वाणी से ही पाठ करता है। वाणी ही
ब्रह्म है इसलिये वाणी या ब्रह्म से जो कामना सिद्ध हो सकती है
वह सब सिद्ध हो जाती है । (५)
१६—जब प्रजापति स्वयं होता था और वह प्रातरनुवाक
बोलने को था तो सब देवता उत्सुक थे कि “वह सबसे पहले मेरा
नाम लेगा। मेरा नाम लेगा।” उसने इधर-उधर देखकर सोचा कि
यदि एक ही देवता को लक्ष्य करके पढ़ता हूँ तो अन्य देवता
किस प्रकार तृप्त हो सकेंगे ।
तब उसने नीचे की ऋचा को देखा :—
आपो रेवतीः क्षयथा हि वस्वः क्रतुं च भद्रं बिभृथामृतं च ।
रायश्च स्थ स्वपत्यस्य पत्नीः सरस्वती तद् गृणते वयो धात् ॥
( ऋ० १०।३०।१२ )
( हे धनयुक्त “आपः” तुम सब कोशों के ऊपर शासन करते
हो । यज्ञ, कल्याण और अमृत को देने वाले हो । तुम स्वतंत्र
धनों की पत्नी (स्वामिनी) हो । सरस्वती देवी गान करने वाले को
चिरायु करे । )
“आप” सब देवता हैं। और “रेवती” भी सब देवता हैं।
इस प्रकार उसने ऐसे मंत्र से अनुवाक पढ़ा कि सब देवता सन्तुष्ट
हो गये । सबने सोचा, “यह मेरे लिये कहता है। यह मेरे लिये
कहता है।” जब वह अनुवाक पढ़ रहा था तो सब प्रसन्न हुये ।
जो इस रहस्य को समझकर इस मंत्र से अपना अनुवाक
पढ़ता है वह सब देवताओं को लक्ष्य में रखकर पढ़ता है और
सब देवता उससे प्रसन्न होते हैं ।
देवों को भय हुआ कि इस प्रातर्यज्ञ को असुर ले लेंगे क्यों-
कि वह बड़े हैं, बलिष्ठ हैं। परन्तु इन्द्र ने उनसे कहा, “मत
डरो । मैं अपने प्रातःकाल के वज्र की तीन गुनी शक्ति से उनको
मार दूंगा ।” तब उसने ऊपर की ऋचा पढ़ी । यह ऋचा वज्र है