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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 592 में से

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पृष्ठ 129

दूसरा अध्याय ] १.१५
तानों को होती हैं। इसीलिये पृथ्वी पर बूंद बूंद कर के वर्षा
होती है। (२)
१३—इस पर प्रश्न होता है कि 'स्वाहा' के लिये 'पुरोनु-
वाक्य' क्या हैं, “प्रैषः” क्या है और याज्य क्या हैं ? ( उत्तर
यह है कि जो पढ़े गये वह 'पुरोनुवाक्य' हैं, ऐसे ही 'प्रैष' और
ऐसे ही 'याज्य' । )
फिर प्रश्न होता है कि 'स्वाहाकृति' के देवता क्या हैं ?
इसका उत्तर देना चाहिये "विश्वे देवा" अर्थात् सब देवता ।
क्योंकि याज्य मन्त्र के अन्त में आता है "स्वाहाकृतं हविरदंतु
देवाः ।” देवों ने यज्ञ, श्रम और तप, और आहुतियों द्वारा स्वर्ग
लोक को जीता ।
'वपा' की आहुति देने के अनन्तर ही स्वर्ग लोक उनको दिखाई
दिया। उन्होंने दूसरे कृत्यों को सर्वथा छोड़कर वपा की आहुति
द्वारा ही स्वर्ग लोक की प्राप्ति की। इसके पश्चात् मनुष्य और
ऋषि देवों के यज्ञ स्थान को गये कि कुछ यज्ञ के विषय में ज्ञान
प्राप्त करें। उन्होंने इधर-उधर घूम फिर कर देखा कि एक पशु
मरा पड़ा है जिसकी अंतड़ियां निकली हुई हैं। तब उन्होंने जाना
कि यज्ञ के पशु में वपा का होना आवश्यक है। 'वपा' ही पशु
को पूर्ण बनाती है।
यह जो तीसरी आहुति में (पशु के वपा को छोड़ कर अन्य
भागों को ) भूनते हैं इससे तात्पर्य यह है कि हमारा यज्ञ बहुत
बहुत आहुतियों से पूर्ण हो। हमारा यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा हो।
जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ बहुत बहुत आहु-
तियों से पूरा होता है। उसका यज्ञ पूर्ण पशु से पूरा होता है। (३)
१४—यह जो वपा की आहुति है यह अमृत की आहुति है।
अग्नि की आहुति अमृत-आहुति है। आज्य-आहुति अमृत-
आहुति है।