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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 592 में से

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पृष्ठ 118

१०४ [ दूसरी पत्रिका
यज्ञ करता है वह मानो सब पशुओं के मांस से यज्ञ करता
है। इसीलिये कहते हैं कि पुरोडाश का सत्र या यज्ञ करना
चाहिये।
अब वपा के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :—
युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम संक्रतू अबद्धतम् ।
युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान् ॥
(ऋ० १।६३।५)
(हे अग्नि और सोम ! तुम दोनों ने संयुक्त परिश्रम से
आकाश में इन प्रकाश-युक्त पदार्थों को रक्खा है। हे अग्नि और
सोम ! तुम दोनों ने (राक्षसों द्वारा) ली हुई नदियों को अपवित्र
और खराब होने से मुक्त किया है)।
जो दीक्षित होता है वह सब देवताओं से ग्रहण किया हुआ
होता है। इसलिये कहते हैं कि दीक्षित के घर में न खाना
चाहिये। इस पर कुछ लोग कहते हैं कि वपा के लिये जो आहुति
दी जाय उसमें से अवश्य खा लेना चाहिये क्योंकि मंत्र में है कि
"अग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान्" इससे वह यजमान को सब
देवताओं से छुड़ा देता है। इसीलिये तो वह यजमान हो जाता
है, देवताओं के लिये दीक्षित नहीं रहता।
अब पुरोडाश के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है :—
अन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रेः ।
अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम् ॥
(ऋ० १।६३।६)
(मातरिश्वा द्यौलोक से अन्य को लाया। श्येन पत्थर से दूसरे
को लाया।)
इन शब्दों से यह अभिप्राय है कि जैसे पत्थर से आग
निकली इसी प्रकार मेघ भी निकल गया था उसे वापिस लाया
गया।