ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] १०९
[ ( यः ) जिसने ( रोदसी ) द्यौ और पृथ्वी को ( भासा )
प्रकाश से ( वि ततन्थ ) ढांप रक्खा है। ( च ) और ( तरुतः )
तारने वाला तू ( श्रवोभिः ) स्तुतियों द्वारा ( श्रवस्यः ) प्रशंसित
होता है। ( अग्ने ) हे अग्नि ! तू ( अस्मे ) हमारे लिये ( बृहद्भिः
वाजैः ) बड़े अन्नों द्वारा ( स्थविरेभिः देवद्भिः ) और स्थूल धनों
द्वारा ( वितरं ) विशेष रीति से ( वि भाहि ) प्रकाश युक्त हो । ]
नृवद्वसो सदमिद्धेह्यस्मे भूरि तोकाय तनयाय पश्वः ।
पूर्वीरिषो बृहतीरारे अघा अस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु ॥
( ऋ० ६।१।१२ )
[ (वसो) हे वसु ! ( अस्मे ) हमारे लिये ( सदमिद् ) सदा
( भूरि ) बहुत ( पश्वः ) पशुओं को ( नृवद् ) जिनकी मनुष्यों
को आवश्यकता होती है ( तोकाय ) सन्तान के निमित्त (तनयाय)
पुत्र के निमित्त ( देहि ) दीजिये। (अस्मे ) हमारे लिए (पूर्वीः)
पूर्ण ( बृहतीः ) बड़े ( आरे अघा ) पापों से मुक्त ( भद्रा )
कल्याण करने वाले ( सौश्रवसानि ) यश को प्राप्त कराने वाले
( इषः ) अन्न ( सन्तु ) होवें ]
पुरूण्यग्ने पुरुधा त्वाया वसूनि राजन् वसुता ते अश्याम् । पुरूणि
हि त्वे पुरुवार सन्त्यग्ने वसु विधते राजनि त्वे ॥ ( ऋ० ६।१।१३ )
( राजन् अग्ने ) हे अग्नि राजा ! ( त्वाया ) तेरे ( पुरूणि )
बहुत से ( पुरुधा ) गाय घोड़े रूपी ( वसूनि ) धन ( ते ) तेरी
( वसुता ) कृपा से ( अश्यां ) मैं भोगूँ । ( पुरुवार अग्ने ) हे
वरण करने योग्य अग्नि ! ( त्वे राजनि ) तुझ राजा में ( विधते )
गुरु, उपासक या सेवक के लिए ( पुरूणि ) बहुत से ( वसु )
धन ( सन्ति ) हैं ।
यहाँ पर एक आक्षेप है कि जब पशु अन्य देवता का है तो
मनोता के लिये अङ्ग काटने में अग्नि के सूक्त को क्यों पढ़ते हैं ।
इसका उत्तर यह है कि देवों में तीन मनोता हैं जिनमें त्रिचार