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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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११६ [ दूसरी पञ्चिका
ये सब आहुतियाँ अशरीरी अर्थात् शरीर रहित हैं। इन्हीं
अशरीरी आहुतियों द्वारा यजमान अमृतत्व को प्राप्त करता है।
यह जो 'वपा' है वह वीर्य के सदृश है। जैसे वीर्य (गर्भा-
शय में) छिप जाता है उसी प्रकार वपा (अग्नि में) छिप
जाती है। जैसे वीर्य सफेद होता है उसी प्रकार वपा। जैसे
वीर्य अशरीरी होता है वैसे ही वपा। यह जो रुधिर और मांस
है यही शरीर हैं। इसलिये (होता अध्वर्य से) कहे, "जितना
रुधिर-शून्य है उसे काट डालो"। (वपा-आहुति में) पाँच भाग होते
हैं। चाहे यजमान के पास चार ही भाग क्यों न हों (अर्थात्
वपा-आहुति का एक भाग सोने की तश्तरी भी है। यदि यजमान
के पास सोने की तश्तरी न हो तो चार ही भाग रह जाते हैं
फिर भी इन चार के ही पाँच कर लिये जाते हैं) (१) चमचे से
घी डालना अर्थात् उपस्तरण क्रिया, ।(२) सोने की तश्तरी,
(३) वपा, (४) सोने की तश्तरी का घी, (५) घी की बूँदें
टपकाना।
यहाँ प्रश्न होता है कि यदि सोना न हो तो क्या करे।
(इसका उत्तर यह है) कि पहले दो बार घी को चमचे में डाले
अर्थात् दो बार उपस्तरण क्रिया करे, फिर वपा रक्खे, फिर
उस पर दो बार गर्म घी टपकावे। घी अमृत है। सोना भी
अमृत है। इससे घी टपकाने से यजमान का अभिप्राय पूरा हो
जाता है। दो बार के घृत लेने और सोने के सहित वपा-आहुति
के पाँच भाग हो जाते हैं।
पुरुष में भी पाँच भाग होते हैं, लोम, त्वचा, मांस, अस्थि,
मज्जा। होता वपा-आहुति द्वारा यजमान को पाँच भाग वाला बना
कर अग्नि में आहुति देता है जो देवों की योनि है। अग्नि देवों की
योनि है। आहुतियों द्वारा अग्नि की योनि में उत्पन्न होकर सोने
के शरीर के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। (४)