ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११० [ दूसरी पञ्चिका
ओत प्रोत हैं । देवों में वाणी मनोता है जिसमें उनके विचार
ओतप्रोत हैं । देवों में गौ मनोता है जिसमें उनके विचार ओत-
प्रोत हैं । इन तीनों में अग्नि पूरा मनोता है । क्योंकि इसमें सब
मनोता शामिल हैं । इसलिये मनोता के लिए हव्य काटने में
अग्नि-सम्बन्धी सूक्त पढ़ा गया ।
अग्नीषोमा हविषः प्रस्थितस्य वीतं हर्यतं वृषणा जुषेथाम् । सुशर्माणो
स्ववसा हि भूतमथाधत्तं यजमानाय शं योः । ( ऋ० १।९३।७ )
हवि के लिए नीचे का याज्य मन्त्र पढ़ता है :-
( हे अग्नि और सोम ! बलवान् आप इस उपस्थित हवि को
खाइये, ग्रहण कीजिये और प्रसन्न हूजिये । हमको कल्याण और
कृपा से युक्त कीजिये । यजमान के लिये कल्याण दीजिये । )
इसमें 'हविष' शब्द है यह रूपसमृद्धता है । 'प्रस्थितस्य'
शब्द भी रूपसमृद्धता देता है । जो इस रहस्य को समझता है
उसका हवि समृद्धि को देता और देवों को पहुँचाता है ।
वह वनस्पति के लिये आहुति देता है । प्राण ही वनस्पति
है । जो इस रहस्य को समझ कर वनस्पति को आहुति देता है
उसका हव्य जीवयुक्त होकर देवों को प्राप्त होता है ।
अब वह स्विष्टकृत आहुति देता है । स्विष्टकृत प्रतिष्ठा है ।
इसी प्रतिष्ठा अर्थात् स्विष्टकृत में अन्त में वह यज्ञ को स्थापित
करता है ।
अब इला का आह्वान करता है । पशु ही इला हैं । इस
प्रकार पशुओं का आह्वान करता है । पशुओं को यजमान में
धारण कराता है । (१०)
ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त