ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें. प्रथम अध्याय ] १०५
नीचे के मंत्र से स्विष्टकृत पुरोडाश की आहुति दी जाती
है :-
स्वदस्व हव्या समिषोदीदीह्यस्मद्रयवसं मिमीहि श्रवांसि ।
विश्वाँ अग्ने पृत्सु ताञ्जेषु शत्रूनहा विश्वा सुमना दीदिही नः ॥
( ऋ० ३।५४।२२ )
इसके द्वारा होता यजमान को आहुति का फल प्राप्त करा
देता है और अपने लिये अन्न और ऊर्ज (दूध आदि रस) प्राप्त
कराता है ।
अब वह इला कहता है । पशु ही इला हैं । इस प्रकार वह
पशुओं को बुलाता है और उनको यजमान की प्राप्ति करा
देता है । (६)
१०-अब अध्वर्यु होता से कहता है :-"मनोता* के लिये
हवि देने के निमित्त जो भाग काटे जाते हैं उनके प्रसंग का मंत्र
पढ़ो । वह ऋग्वेद मंडल ६ का पहला सूक्त पढ़ता है जिसमें तेरह
मंत्र हैं :---
त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता । त्वं सीं वृषन्न-
कृणोर्दुष्टरीतु सहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै ॥ (ऋ० ६।१।१)
(हे अग्नि ! तू पहला मनोता अर्थात् विचारों का बुनने वाला,
Weaver of Thoughts, है । हे दस्म अर्थात् दर्शनीय अग्नि ! तू
इस बुद्धि का होता अर्थात् बुलाने वाला है । हे वृषन् अर्थात्
बलवान अग्नि ! तू ऐसा है जिसको कोई सता नहीं सकता ।
तूने सब बलवान शत्रुओं को पराजित करने के लिये बल धारण
किया है) ।
अधा होता न्यसीदो यजीयानिलस्पदे इषयन्नीड्यः सन् । तं त्वा नरः
प्रथमं देवयन्तो महो राये चितयन्तो अनुग्मन् ॥ . (ऋ० ६।१।२)
*ब्राह्मण में मनोता स्त्रीलिङ्ग है (मनोतायै) और ऋग्वेद में
पुँल्लिंग (प्रथमो मनोता) !