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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

६२ ] [ प्रथम अध्याय

६२ ] [ प्रथम अध्याय
महोपनिषद् का आरम्भ किया जाता है कि आदि में केवल एक
नारायण ही थे । ब्रह्मा, रुद्र, जल, अग्नि, सो, आकाश, पृथिवी, नक्षत्र,
सूर्य एवं चन्द्रमा आदि कुछ भी नहीं था । नारायण को अकेले रहना
अच्छा नहीं लगा । तब उन्होंने अन्तःस्थ सङ्कल्प रूपी ध्यान किया ।
वह ध्यान ही यज्ञस्तोम कहा गया है । उस ध्यान से ही चौदह पुरुष
और एक कन्या की उत्पत्ति हुई । वे चौदह पुरुष हैं—दस इन्द्रियाँ,
तेजस्वी मन, अहङ्कार, प्राण और आत्मा । इन चौदहों के अतिरिक्त
बुद्धि रूपिणी कन्या हुई । इनसे भिन्न सूक्ष्म भूत वाली पञ्च तन्मात्राएँ
और पञ्च महाभूत हुये । इन पच्चीसों के योग से एक पुरुष बना ।
उस पुरुष में विराट् पुरुष प्रविष्ट हुआ । परन्तु इस पच्चीस तत्व युक्त
विराट् रूप से संवत्सरों की उत्पत्ति नहीं हुई । संवत्सर तो कालरूप
संवत्सर से ही प्रकट हुये हैं ॥ १-६ ॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायता
लतस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषो जायते
बिभ्रच्छ्रियं यशः सत्यं ब्रह्मचर्यं तपो वैराग्यं मन ऐश्वर्यं सप्रणवा
व्याहृतय ऋग्यजुः सामाथर्वाङ्गिरसः सर्वाणि छन्दांसि तान्यंगे
समाश्रितानि तस्मादीशानो महादेवो महादेवः ॥७॥
अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायत ।
तस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमाः प्रतता
आपः । तत्तस्तेजो हिरण्मयमण्डम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखो-
ऽजायत ॥८॥
सोऽध्यायत् । पूर्वाभिमुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिर्गायत्रं
छन्द ऋग्वेदोऽग्निर्देवता । पश्चिमाभिमुखो भूत्वा भुव इति
व्याहृतिस्त्रिष्टुभं छन्दो यजुर्वेदो वायुर्देवता । उत्तराभिमुखो भूत्वा
स्वरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः सूर्योदेवता । दक्षिणाभि-

[Header] महोपनिषद् [ ६३ ]

मुखो भूत्वा मह इति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः सोमो
देवता ॥६॥
सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥१०
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।
पतिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रें क विश्वरूपिणम् ॥११॥

फिर उन नारायण ने अन्य सङ्कल्पयुक्त अन्तःस्थ ध्यान किया ।
उनके उस ध्यान से एक ऐसे पुरुष की उत्पत्ति हुई जो तीन नेत्रों वाला
था तथा वह अपने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये था । यश, सत्य,
तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, नियन्त्रित मन, ऐश्वर्य, प्रणव युक्त व्याहृतियां,
चारों वेद और सम्पूर्ण छन्द उस सिद्ध पुरुष में समाश्रित थे । इसीलिए
उसका नाम ईशान एवम् महादेव हुआ । उन प्रसिद्ध नारायण ने पुनः
अन्तःस्थ ध्यान किया, उस समय उनके ललाट से पसीना टपकते लगा ।
वह पसीना ही जल रूप में फैल गया । उस जल में ही एक अणुकार
हिरण्यमय तेज की उत्पत्ति हुई । उस तेज से ही ब्रह्माजी उत्पन्न
हुये । ब्रह्मा जी पूर्व की ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द,
ऋग्वेद और अग्नि का ध्यान करने लगे । पश्चिम की ओर मुख करके
भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप छन्द, यजुर्वेद और वायु का ध्यान करने लगे ।
उत्तराभिमुख होकर स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद और सूर्य का
ध्यान करने लगे । फिर उन्होंने दक्षिणाभिमुख होकर महः व्याहृति,
अनुष्टुप्त छन्द, अथर्ववेद और सोम का ध्यान किया । फिर उन ब्रह्मा ने
सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र वाले, सर्व मङ्गलों के कारण, सर्वत्र व्याप्त,
परात्पर और नित्य स्वरूप नारायण का ध्यान किया और उन्होंने उन
जगदीश्वर के क्षीर सागर में शयन करते हुए, दर्शन किये तथा यह
जाना कि यही परममुख विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण संसार का जीवन
इन्हीं पर अवलम्बित है ॥७-११॥