१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
२०२ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
इत्यादिश्चेष्टनं प्राणः करोति च पृथक्स्थितः ।
अपानवायुर्मूत्रादेः करोति च विसर्जनम् ॥८३
प्राणापानादिचेष्टादि क्रियते व्यानवायुना ।
उज्जीर्यंते शरीरस्थमुदानेन नभस्वता ॥८४
पोषणादि शरीरस्य समानः कुरुते सदा ।
उद्गारादिक्रियो नागः कूर्मोक्ष्यादिनिमीलनः ॥८५
व्यान नामक वायु श्रोत्र, जङ्घा कमर एड़ी, कन्धे, गले में
रहता है तथा नाग आदि पाँच उपवायु त्वचा, अस्थि आदि में स्थित
हैं ॥ ८१ ॥ आमाशय में स्थित जल, अन्न रसादिक को प्राणवायु
एकत्र करके फिर पृथक् पृथक करता है ॥ ८२ ॥ इन कार्यों को
प्राणवायु पृथक रह कर करता है । मल और मूत्र के विसर्जन का
कार्य अपान-वायु द्वारा होता है ॥ ८३ ॥ प्राण, अपान वायुओं की
चेष्टाएं व्यान वायु के योग से की जाती हैं और शरीरस्थ उदान से
ऊर्ध्वगामी हुआ जाता है ॥ ८४ ॥ शरीर को पोषण सदैव समान
वायु द्वारा होता है । डकार आदि क्रिया नाग से होती है और आंखों
का खोलना बन्द करना कूर्म का कार्य है ॥ ८५ ॥
कृकरः क्षपयोः कर्ता दत्तो निद्रादिकर्मकृत् ।
मृतगात्रस्य शोभादि धनंजय उदाहृतः ॥८६
नाडीभेदं मरुद्भेदं मरुतां स्थानमेव च ।
चेष्टाश्च विविधास्तेषां ज्ञात्वैवं द्विजसत्तम ॥८७
शुद्धौ यतेत नाडीनां पूर्वोक्तज्ञानसंयुतः ।
विविक्तदेशमास्थाय सर्व संबन्धवर्जितः ॥८८
योगाङ्गद्रव्यसंपूर्णं तत्र दारुमये शुभे ।
आसने कल्पिते दर्भकुशकृष्णाजिनादिभिः ॥८९