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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१८२ ] [ षष्ठ अध्याय

१८२ ] [ षष्ठ अध्याय
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स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानमानन्दं पदाप्स्यसि ।
चिदहं चिदिमे लोकाश्चिदाशाश्चिदमाः प्रजाः ॥७६
दृश्यदर्शननिर्मुक्तः केवलामलरूपवान् ।
नित्योदितो निराभासो द्रष्टा साक्षी चिदात्मकः ॥८०
चैत्यनिर्मुं चिद्रूपं पूर्णज्योतिःस्वरूपकम् ।
संशान्तसर्वसंवेद्यं संविन्मात्रमहं महत् ॥८१
संशान्तसर्वसंकल्पः प्रशान्तसकलैषणः ।
निर्विकल्पपदं गत्वा स्वस्थो भव मुनीश्वर ॥८२
श्रेष्ठ आचरण वाला, उदार, विषयों में अनासक्त और सब श्रेष्ठ
आचारों का अनुगामी होकर अन्तःकरण में वैराग्य धारण कर बाहर से
श्रेष्ठ व्यवहार करे । 'यह मेरा बन्धु नहीं है और यह है' ऐसा विचार अल्प
बुद्धि वाले करते हैं । जो लोग उदार मन वाले हैं, उनके लिए तो सम्पूर्ण
संसार ही कुटुम्ब है । भाव-अभाव से रहित, जरा-मरण से सर्वथा दूर
तथा जिसमें सभी संकल्प आश्रय लेते हैं, ऐसे ही राग-रहित परमपद
में अवस्थित होना चाहिए । इस प्रकार की स्थिति ही कामना-रहित एवं
निर्मल ब्राह्मी स्थिति कही गई है । इसका अवलम्बन करने वाला साधक
संकट के उपस्थित होने पर भी मोह से दूर रहता है । शास्त्र से प्राप्त
हुये ज्ञान द्वारा, महत्वादि गुणों के द्वारा अथवा वैराग्य धृत्ति के द्वारा
संकल्प को नष्ट करने पर मन स्वयं ही उन्नतावस्था को प्राप्त
होने लगता है । निराशा के वश में पड़ा हुआ मन वैराग्य के बिना
पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता । जब वह आशा से समन्वित होता है,
तब शरद् ऋतु में स्वच्छ हुए सरोवर के समान रागयुक्त हो जाता है ।
परन्तु भोगों से विरक्ति को प्राप्त हुये मन को बारम्बार रागादि में डालते
हुए विज्ञ पुरुष लज्जित क्यों नहीं होते ? चित् और विषय का योग ही
बन्धन है । उससे छुटकारा पा लेना ही मुक्ति कहा जाता है । वेदांत-

महोपनिषत् ] [ १८३
सिद्धान्त का यही एक सार है कि विषयों से मुक्त चित्त ही आत्मा है।
इस विचार को सत्य मानकर स्वच्छ अन्तःकरण द्वारा स्वयं को ही देखो।
ऐसा करने से आनन्दस्वरूप पद प्राप्त होगा। ये लोक, दिशायें और
जीव-मात्र सब कुछ चित् है, मैं स्वयं भी चित्त हूँ। दृश्य और दर्शन
से स्वच्छन्द हुआ निर्मल रूप वाला यह साक्षी चिदात्मा आभास-रहित
होता हुआ तथा नित्य प्रकट होता हुआ दृष्टा बन गया है। मैं महान्
संवित् मात्र, पूर्ण ज्योतिस्वरूप, संवेदन से सर्वथा मुक्त और चिद्रूप हूँ।
हे मुने ! सभी संकल्पों को शांत कर, कामनाओं के परित्यागपूर्वक
निर्विकल्प में अवस्थित होओ ॥ ७०-८२ ॥
य इमां महोपनिषदं ब्राह्मणो नित्यमधीते अश्रोत्रियः
श्रोत्रियो भवति । अनुपनीत उपनीतो भवति । सोऽग्निपूतो
भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूतो भवति । स सोमपूतो
भवति । स सत्यपूतो भवति । स सर्वपूतो भवति । स सर्वैर्देवैर्ज्ञातो
भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । स सर्वदेवैरनुध्यातो
भवति । स सर्वक्रतुभिरिष्टवान् भवति । गायत्र्याः षष्टिसह-
स्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति । इतिहासपुराणानां रुद्राणां
शतमहस्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति । प्रणवानायुतं जप्तं
भवति । आचक्षुषः पंक्ति पुनाति । आसप्तमान् पुरुषयुगान्
पुनाति । इत्याह भगवान् हिरण्यगर्भः । जाप्येनामृतत्व च गच्छ-
तीति महोपनिषत् ॥ ८३ ॥
इस महोपनिषत् का नित्य अध्ययन करने वाला ब्राह्मण यदि
अश्रोत्रिय हो तो श्रोत्रिय हो जाता है। जो उपनीत न हो, वह उपनीत
हो जाता है। इससे अग्निपूत, वायु पूत, सोमपूत, सत्यपूत आदि सब कुछ
होता है। वह पूर्ण पवित्र होकर देवताओं से परिचय प्राप्त करता है।
उसे सब देवताओं के ध्यान का और तीर्थों का फल मिलता है, वह
सब यज्ञों का अनुष्ठान कर्त्ता होकर सहस्रों गायत्री-जप के फल का भागी
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi