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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१६८ ] पंचम अध्याय

१६८ ] पंचम अध्याय
यही कर्म है। जैसे कीचड़ में कमल पत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त
नहीं होता, वैसे ही इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी-
जन कर्म में लिप्त रहते हुए भी अपनी बुद्धि को उनमें लिप्त नहीं होने
देते। यदि तुम्हारे हृदय में इन्द्रियों से युक्त विषय स्पन्दन नहीं करते,
तो अवश्य ही तुम जानने योग्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करके जगत रूप
समुद्र से पार हो गए। वासना रूपी पुष्पों की सुगन्ध लेकर भी यदि
उससे चित्तवृत्ति को शीघ्र हटा लिया जाय तो उच्चपद की प्राप्ति संभव
है ॥१५८--१७५॥
संसाराम्बुनिधावस्मिन् वासनाऽम्बुपरिप्लुते ।
ये प्रज्ञानावमारुढास्ते तीर्णाः पण्डिताः परे ॥१७६॥
न त्यजन्ति न वाञ्छन्ति व्यवहारं जगद्गतम् ।
सर्वमेवानुवर्तन्ते पारावारविदो जनाः ॥१७७॥
अनन्तस्यात्मतत्वस्य सत्तासामान्यरूपिणः ।
चितश्चेत्योन्मुखत्वं यत्तत् सङ्कल्पाङ्कुरं विदुः ॥१७८॥
लेशतः प्राप्तसत्ताकः स एव घनतां शनैः ।
याति चित्तत्वमापूर्य दृढं जाड्यायमेधघत् ॥१७९॥
भावयन्ति (न्ती) चितिश्चैत्य व्यतिरिक्तमिवात्मनः ।
सङ्कल्पतामिवायाति बीजमङ्कुरतामिव ॥१८०॥
संकल्पनं हि संकल्पः स्वयमेव प्रजायते ।
वर्धते स्वयमेवाशु दुःखाय न सुखाययत् ॥१८१॥
मा सकल्पय संकल्प मा भावं भावय स्थितौ ।
संकलपनाशने यत्तो न भूयोजननुगच्छति ॥१८२॥
भावनाऽभावमात्रेण संकल्पः क्षीयते स्वयम् ।
संकल्पेनैव संकल्पं मनसैव मनो मुने ॥१८३॥

महोपनिषत् [ १६६ ]
छित्त्वा स्वात्मनि तिष्ठ त्वं किमेतावति दुष्करम् ।
यथैवेदं नभः शून्यं जगच्छून्यं तथैव हि ॥१८४॥
तण्डुलस्य यथा चर्म यथा ताम्रस्य कालिमा ।
नश्यति क्रियया विप्र पुरुषस्य तथा मलम् ॥१८५॥
जीवस्य तण्डुलस्येव मलं सहजमप्यलम् ।
नश्यत्येव न संदेहस्तस्मादुद्योगवान् भव ॥१८६॥
यह संसार-सागर वासनारूपी जल से परिपूर्ण है। जो ज्ञानी
पुरुष प्रज्ञा रूप नाव पर चढ़ गए, वे इससे पार हो गए। जो पुरुष इस
सांसारिक प्रपञ्च के ज्ञाता हैं, वे न तो संसार के व्यवहारों की आकांक्षा
करते हैं और न उसका त्याग ही करते हैं। वे सभी व्यवहारों में
अनासक्त रहते हैं। विद्वानों ने संकल्प का अंकुरित होना आत्मतत्व
रूप चेतन का विषयों की ओर दौड़ने को ही माना है क्योंकि संकल्प
धीरे-धीरे दृढ़ होते जाते हैं और तब उनसे चित्ताकाश आच्छन्न होकर
जड़त्व को प्राप्त होता है। जैसे बीज अंकुर रूप होने लगता है, वैसे
ही चेतन-विषयों को अपने से पृथक-सा मानते हुये वह संकल्प रूप में
स्थित होता है। संकल्प के द्वारा उसकी क्रिया स्वयं ही प्रकट होती है
और जल्दी-जल्दी वृद्धि को प्राप्त होने लगती है। परन्तु वह क्रिया
सुख देने वाली नहीं होती, बल्कि दुःख ही देती है। इसलिये हे पुत्र !
अपने चित्त में होने वाली संकल्प की क्रिया का अवरोध करो। यदि
संकल्प उत्पन्न भी तो उसमें पदार्थ भावना न करो क्योंकि जो
संकल्प को नष्ट करने के लिये कटिबद्ध है, वे उसको क्रियात्मक नहीं
होने देते। यदि भावना नष्ट हो जाय तो संकल्प भी स्वतः ही नष्ट हो
जाते हैं। मन के द्वारा मन को जीतो और संकल्प के द्वारा संकल्प को
नष्ट कर डालो। इस प्रकार आत्म-स्वरूप में स्थित होकर उद्योगी
पुरुष बनने की चेष्टा करो। आकाश के समान यह संसार भी शून्य-