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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१६६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

१६६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
कर स्थित होने को सिंहासन कहते हैं ॥ ४४ ॥ सींवन के दोनों
तरफ दोनों एड़ियों को रखकर हाथ पैर को नांघकर बैठने से भद्रासन
होता है ॥ ४५ ॥
सीवनीपार्श्वमुभयं गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण तु ।
निपीड्यासनमेतच्च मुक्तासनमुदीरितम् ॥४६
अवष्टभ्य धरां सम्यक्तलाभ्यां हस्तयोर्द्वयोः ।
कूर्परौ नाभिपाश्र्वे तु स्थापयित्वा मयूरवत् ॥४७
सामुन्नतशिरः पादो मयूरासनमिष्यते ।
वामोरूमूले दक्षांघ्रि जान्वोर्वेष्टितपाणिना ॥४८
वामेन वामांगुष्ठं तु गृहीतं मत्स्यपीठकम् ।
योनिं वामेन संपीड्य मेढ्रादुपरि दक्षिणम् ॥४९
ऋजुकायः समासीनः सिद्धासनमुदीरितम् ।
प्रसार्यं भुवि पादौ तु दोर्भ्यामंगुष्ठमादरात् ॥५०
जानूपरि ललाटं तु पश्चिमं ताणमुच्यते ।
येन केन प्रकारेण सुखं धार्यं च जायते ॥५१
तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाचरेत् ।
आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्त्रयम् ॥५२
सींवन के दोनों पाश्र्वों को दोनों एड़ियों से विपरीत रीति से
दबाकर बैठने से मुक्तासन होता है ॥ ४६ ॥ दोनों हथेलियों को
भूमि पर स्थापित करके दोनों कोहनियों को नाभि के दोनों तरफ
लगावे, फिर मोर की तरह सब शरीर को अधर करके सिर और
पैरों को ऊपर की तरफ उठाये रहने से मयूरासन होता है । बाँई जाँघ
की जड़ में दाहिने पैर को रखे और फिर बाँये घुटने का हाथ से
लपेटकर उसी पैर के अंगूठे को पकड़े तो यह मत्स्येन्द्र आसन होता
हैं। बाँये पैर की ऐड़ी को सींवन पर लगाये और दाहिने पैर को