१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
११० ] [तृतीय अध्याय
११० ] [तृतीय अध्याय
अपि वह्न्यशनाद्ब्रह्मन् विषमश्चित्तनिग्रहः ॥२०
चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन् सति जगत्त्रयम् ।
तस्मिन् क्षीणे जगत् क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः ॥२१
वायु का लपेटना, आकाश के टुकड़े-टुकड़े करना और लहरों का
गूंथना भले ही सम्भव हो जाय, परन्तु जीवन में आस्था रखना मेरे लिए
सम्भव नहीं है। जिसके द्वारा पाने योग्य वस्तु को भले प्रकार पा लिया
जाय, जिसके कारण फिर शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति
की उपलब्धि हो, वही तो जीवन है। वैसे तो वृक्ष और पक्षी भी
जीवित रहते हैं, परन्तु यथार्थ में वही जीवित है जो आत्म चिन्तन में
लीन है। इस विश्व में जो उत्पन्न हुये हैं, उनमें उन्हीं जीवों का जीवन
श्रेष्ठ है जिन्हें आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ता। इनसे भिन्न
तो जरावस्था प्राप्त गधे के समान है जो असक्त होते हुये भी बोझा ढोने के
लिए विवश हैं। ज्ञानी जन के लिये शास्त्र बोझा के समान हैं, राग-द्वेष
से युक्त पुरुष के लिये ज्ञान बोझ रूप है। जो अशान्त है, उसका मन ही
बोझ रूप है और जो आत्मज्ञान से हीन हैं, उनके लिए यह देह भी बोझ
ही है। अहंकार सब दुःखों का कारण है। उससे विपत्ति प्राप्त होती
है, दुष्ट मनोविकारों की उत्पत्ति होती है और विभिन्न कामनाओं का
प्रादुर्भाव होता है, इसलिये मनुष्य का इससे अधिक कोई शत्रु नहीं है।
अहङ्कार के वशीभूत हो मैंने जिन-जिन भोगों का उपभोग किया, वे
सभी मिथ्या थे। अहंकार-शून्यता ही जीवन की यथार्थता है। व्यग्रता
के वश पड़कर यह मन व्यर्थ ही इधर-उधर भ्रमता है। यह विभिन्न
ग्रामों में घूमते-फिरने वाले कुत्ते के समान दूर-दूर तक भ्रमण करता
है। मैं भी तृष्णा रूप कुतिया के पीछे कुत्ते के समान भटकता हुआ
जड़वत् होगया था। परन्तु अब मैं उनके प्रभाव से मुक्त होगया हूँ।
चित्त को नियन्त्रित करना सुमेरु पर्वत को समूल उखाड़ने अथवा समुद्र
के सम्पूर्ण जल का पान कर लेने से भी अधिक दुष्कर है। अग्नि का भक्षण
महोपनिषत् [ १११ ]
करना भले ही सरल कार्य हो, परन्तु चित्त-निग्रह अत्यन्त ही विषम
कार्य है। यह चित्त तथा बाह्य तथा अभ्यान्तर के विषयों का ग्रहण करने
वाला है, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति रूप तीन अवस्था वाले विश्व की
स्थिति चित्तवृत्ति पर ही निर्भर है। चित्त की क्षीणता ही संसार को
क्षीण करने वाली है। इसलिये आवश्यक है कि चित्त का ही प्रयत्न
पूर्वक उपाय किया जाय ॥११--२१॥
यां यामहं मुनिश्रेष्ठ संश्रयामि गुणश्रियम् ।
तां तां कृन्तति मे तृष्णा तन्त्रीमिव कुमूषिका ॥२२
पदं करोत्यलङ्घ्येऽपि तृप्तऽपि भलमोहते ।
चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा चपलमर्कटी ॥२३
क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्स्थलम् ।
क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥२४
सर्वसंसारदुःखानां तृष्णैका दीर्घदुःखदा ।
अन्तःपुरस्थमपि या योजयत्यतिसंकटे ॥२५
तृष्णाविषूचिकामन्त्रश्चिन्तात्यागो हि स द्विज ॥२६
स्तोकेनानन्दमायाति स्तोकेनायाति खेदताम् ।
नास्ति देहसमः शोच्यो नीचो गुणविवर्जितः ॥२७
कलेबरमहंकारगृहस्थस्य महागृहम् ।
लुठत्वभ्येतु वा स्थैर्यं किमनेन गुरो मम ॥२८
षङ् क्तिबद्धेन्द्रियपशुं वलगत्तृष्णागृहाङ्गणम् ।
चित्तभृत्यजनाकीर्णं नेष्टं देहगृहं मम ॥२९
जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीषणम् ।
दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृहं मम ॥३०
हे मुने ! दुष्ट मूषकी जैसे वीणा के तार को काट डालती है, वैसे
ही मेरी तृष्णा मेरे श्रेष्ठ गुणों को काट डालती है। यह तृष्णा चञ्चल
बंदरिया के समान न साधने योग्य स्थान में भी अपना पांव टिकाने को