१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पूर्वकाण्ड ] [ २२५
पूर्वकाण्ड ] [ २२५
मम प्राणात्मिका देवता ॥४॥ अहमेव जगतत्रयस्यैकः पतिः
॥ ५ ॥ यम वशानि सर्वाणि युगान्यपि च ॥ ६ ॥ अहोरात्रादि-
मतिसंवर्धिताः कालाः ॥७॥ मम रूपा रवेस्तेजश्चन्द्रनक्षत्र
ग्रहतेजांसि ॥ ८ ॥ गगनो मम त्रिशक्तिमायास्वरूपः नान्यो
मदस्ति ॥ ६ ॥ तमोमायात्मको रुद्रः सात्विकमायात्मको विष्णु
राजसमायात्मको ब्रह्मा । इन्द्रादयस्तामसराजसात्मिका न
सात्विकः कोऽपि अघोरः साधारणस्वरूपः ॥ १० ॥
हरि ॐ। एक समय स्वयंब्रह्मा के मन में इच्छा हुई कि
“मैं प्रजा उत्पन्न करूं” तो कामनाओं के पूर्ण करने वाले रुद्र और
कुबेर की उत्पत्ति हुई ॥ १॥ तब कुबेर और बालखिल्य ऋषि ने
स्वयंभू से पूछा—जगत में विद्या क्या है ? जागृत और तुरीय अवस्था
के देवता कौन हैं ? जगत किसके वश में है, काल का क्या प्रमाण
है ? सूर्य चन्द्रादि किस की आज्ञा से प्रकाशित होते हैं ? आकाश के
समान विशाल किस की महिमा है ? हम इन बातों को जानना चाहते
हैं, आपके सिवाय कोई इनका जानने वाला नहीं हैं, अतएव इन बातों
को बतलाइये ॥ २ ॥ स्वयंभू ने कहा—जगत की मातृका वर्णमाला
रूप माता विद्या है ॥ ३॥ वह दो वर्ण (हंस) और तीन वर्ण
(प्रणव) वाली है। दो वर्ण वाली भी तीन वर्ण की (प्रणव) ही
है। चार मात्रा वाला ॐकार मेरा प्राण रूप देव है ॥ ४॥ तीनों
लोकों का मैं ही एक मात्र पति हूँ ॥ ५ ॥ समस्त युग मेरे वश में
रहते हैं ॥ ६ ॥ मुझसे ही दिन-रात्रि आदि काल उत्पन्न हुये हैं
॥ ७ ॥ सूर्य का तेज और चन्द्रमा, तारागण, ग्रह आदि में जो
ज्योति है, वह मेरी ही है ॥ ८ ॥ यह आकाश मेरी तीन शक्तिशाली
माया रूप है और मेरे सिवाय कहीं कुछ नहीं है ॥ ९ ॥ रुद्र-तमोगुण
२२६ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
माया रूप है, विष्णु सतोगुणी माया रूप है और ब्रह्मा रजोगुणी
माया रूप है। इन्द्रादि देव रजोगुण और तमोगुण दोनों से युक्त हैं,
इनमें से कोई सात्विक नहीं है। केवल अघोर (शिव) ही सर्व
सामान्यरूप के हैं ॥१०॥
समस्तयागानां रुद्रः पशुकर्ता रुद्रो यागदेवो विष्णु-
रध्वर्युर्होतेन्द्रो देवता यज्ञभुङ् मानसं ब्रह्म महेश्वरं ब्रह्म ॥११॥
मानसो हंसःसोऽहं हंस इति तन्मयं यज्ञो नादानुसंधानम् ।
तन्मयविकारो जीवः ॥१२॥
परमात्मस्वरूपो हंसः । अन्तर्बहिश्चरति हंसः । अन्तर्गतो-
ऽनवकाशान्तर्गतसुपर्णस्वरूपो हंसः ॥१३॥
षण्णवतितत्त्वतन्तुवद्व्यक्तं चित्सूत्रत्रयचिन्मयलक्षणं
नवतत्त्वत्रिरावृतं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरात्मकमग्नित्रयकलोपेतं चिद्-
ग्रन्थिबन्धनम् अद्वैतद्ग्रन्थिः ॥१४॥ यज्ञसाधारणाङ्गं बहि
रन्तर्ज्वलनं यज्ञाङ्गलक्षणब्रह्मस्वरूपो हंसः ॥१५॥
उपवीतलक्षणसूत्रं ब्रह्मगा यसाः । ब्रह्माङ्गलक्षणयुक्तो
यज्ञसूत्रम् । तद्ब्रह्मसूत्रम् । यज्ञसूत्रसम्बन्धी ब्रह्मयज्ञः तत्स्वरूपः
॥१६॥
अङ्गानि मात्राणि । मनोयज्ञस्य हंसो ब्रह्मसूत्रम् । प्रणवं
ब्रह्मसूत्रं ब्रह्मयज्ञमयम् । प्रणवान्तर्वर्ती हंसो ब्रह्मसूत्रम् । तदेव
ब्रह्मयज्ञमयं मोक्षक्रमम् ॥१७॥
ब्रह्मसंध्याक्रिया मनोयोगः । संध्याक्रिया मनोयागस्य
लक्षणम् ॥१८॥
यज्ञ सूत्रं प्रणवम् । ब्रह्मयज्ञक्रियायुक्तो ब्राह्मण । ब्रह्मचर्येण
चरन्ति देवाः । हंससूत्रचर्या यज्ञाः । हंसप्रणवयोरभेदः ॥१९॥
समस्त यज्ञों के कर्ता पशुपति रुद्र भगवान् हैं, विष्णु अध्वर्यु,