१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
द्वितीय अध्याय ] [ २६५
द्वितीय अध्याय ] [ २६५
योग सिद्ध होता है। सोमांश 'स' कार है, उसका प्रतिलोम से
नौवां अक्षर 'भ' होता है। फिर चन्द्रमा का बीजाक्षर 'स' है, उसका
आठवां अक्षर विलोम से 'म' होता है। फिर से पांच अक्षर उलटा
गिनने से 'प' अक्षर निकलता है। चन्द्रमा का बीज 'स' और अनेक
वर्ण वाला 'क्ष' अन्तिम अक्षर है। (इस प्रकार "ह्रीं भं सं मं पं सं क्ष"
यह खेचरी का बीज मन्त्र प्रकट होता है) ॥ १६—२० ॥
गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् ।
यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥२१
स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः ।
य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥२२
तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते ।
नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥२३
वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः ।
एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥२४
अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरी पथे ।
यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥२२
ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदां जपेत् ।
नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किंचित्सिद्धिभागभवेत् ॥२६
यह खेचरी मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। यह
गुरु के उपदेश से ही सिद्ध होता है। जो नियम से इसका प्रतिदिन
बारह बार जप करता है, उसे अन्तःकरण में स्थित देह सम्बन्धी माया
नहीं व्यापती। जो इसे भावपूर्वक पाँच लाख जपेगा उसको खेचरी की
सिद्धि स्वयमेव हो जायेगी, सब विघ्न दूर होकर देवताओं की
प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २१—२३ ॥ इससे शरीर पर पड़ी हुई झुरियां
मिट जाती हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं। इस महाविद्या को जब
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भली प्रकार जान ले तब उसका अभ्यास भली भाँति करे ॥ २४ ॥
ऐसा न करने से खेचरी की सिद्धि न होकर उलटा कष्ट ही उठाना
पड़ता है । विधिपूर्वक अभ्यास करने पर भी सफलता न हो तो भी
'सम्मेलक' (गुरु शिक्षक आदि) के बताये अनुसार सदैव इसका जप
करता रहे । बिना उपयुक्त शिक्षक के इनमें कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो
सकती ॥ २५—२६ ॥
यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् ।
ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥२७
तालूमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् ।
स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥२८
स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् ।
समादाय ततस्तेत लोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२६
हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् ।
पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोम मात्र समुच्छिनेत् ॥३०
जब इस विद्या के शास्त्र का ठीक तरह से ज्ञान हो जायेगा तब
साधक की सिद्धि प्राप्त करने में देर न लगेगी ॥ २७ ॥ सर्व प्रथम
साधक को सात दिन तक तालु के मूल स्थान को गुरु के आदेश के
अनुसार घिसकर वहां का सब मैल दूर करना चाहिए ॥ २८ ॥ फिर
थूहर के पत्ते के समान उत्तम धार वाले शुद्ध चाकू आदि से तालूमूल
को एक बाल के बराबर काटे अथवा गुरु या शिक्षक से कटावे)
॥ २६ ॥ कटे स्थान के ऊपर हर्र और सैन्धे नमक का चूर्ण
भुरभुराता रहे। सात दिन के पश्चात् फिर पूर्ववत् बाल बराबर
काटे ॥ ३० ॥
एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् ।
षण्मासाद्रसनामूलं शिराबन्धं प्रनश्यति ॥३१