यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Yajurveda (यजुर्वेद) is the second of the four Vedas and the Veda of sacrificial ritual. Its formulas are largely in prose, and it was compiled as a manual for priests conducting the sacrifices; most mantras used in household rites and fire rituals today still come from it.
This edition by Dr. Rekha Vyas gives the mantras with a simple Hindi rendering of their sense. It was published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi (copyright 1979); the scanned copy is the 2015 edition. In her foreword the author notes that 663 mantras of the Rigveda reappear unchanged in the Yajurveda, yet the two differ, since the Rigveda is in verse and the Yajurveda in prose. She also mentions the tradition of 101 branches of the Yajurveda, of which two are the most widely followed.
The translation runs chapter by chapter after a table of contents, offering readers the plain meaning of the mantras without a dense commentary.
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
आप के पंख हैं. आप शुभ गतिवान हैं. आप स्वर्गलोक में उड़िए. आप स्वेच्छा
से उड़ान भरिए. ( ४ )
विष्णोः क्रमोसि सपत्नहा गायत्रं छन्द ऽ आरोह पृथिवीमनु विक्रमस्व विष्णोः
क्रमोस्यभिमातिहा त्रैष्टुभं छन्द ऽ आरोहान्तरिक्षमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोस्यरातीयतो
हन्ता जागतं छन्द ऽ आरोह दिवमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोसि शत्रूयतो हन्तानुष्टुभं
छन्द ऽ आरोह दिशोनु विक्रमस्व.. (५)
हे अग्नि! आप विष्णु के पदव्यास व शत्रुनाशी हैं. आप गायत्री छंद पर आरूढ़
होने व पृथ्वी का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु देव का क्रम न्यास
व शत्रु का अभिमान नष्ट करने वाले हैं. आप त्रिष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने तथा
अंतरिक्ष का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास और न
करने योग्य आचरण करने वाले के नाशक हैं. आप जगती छंद पर आरूढ़ होने और
स्वर्गलोक का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास तथा
शत्रुनाशक हैं. आप अनुष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने और सारी दिशाओं का अनुकरण
करने की कृपा कीजिए. ( ५ )
अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्.
सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (६)
अग्नि बादल के समान गरजते हैं. स्वर्गलोक से वह पृथ्वी पर व्याप्त होते हैं. वे
लताओं को घेर लेते हैं व शीघ्र जलते हैं. वे समिधावान और सब को प्रकाशित
करते हैं. वे अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं. ( ६ )
अग्नेभ्यावर्त्तिन्नभि मा निवर्त्तस्वायुषा वर्चसा प्रजया धनेन.
सन्या मेधया रय्या पोषेण.. (७)
हे अग्नि! आप हमारे सम्मुख पधारते हैं. आप आयु, वर्चस्व, संतान व धन
के साथ हमारे पास पधारिए. आप बुद्धि, ऐश्वर्य व पोषण के साथ हमारे पास
पधारिए. ( ७ )
अग्ने अङ्गिरः शतं ते सन्त्वावृतः सहस्रं त ऽ उपावृतः.
अधा पोषस्य पोषेण पुनर्नो नष्टमाकृधि पुनर्नो रयिमाकृधि.. (८)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंग वाले हैं. हम आप की सैकड़ों, हजारों परिक्रमाएं
करते हैं. आप हमें पोषकता देने वाला पोषण व नष्ट हुआ पशुधन और धन प्राप्त
कराने की कृपा कीजिए. ( ८ )
पुनरूर्जा निवर्त्तस्व पुनरग्न ऽ इषायुषा पुनर्नः पाह्य १७ हसः... (९)
हे अग्नि! आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप हमें बारबार संपन्न व आयु संपन्न
यजुर्वेद - १४१
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
बनाने की कृपा कीजिए. आप बारबार पाप से बचाने की कृपा कीजिए. ( ९ )
सह रय्या निवर्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (१०)
हे अग्नि! आप धन के साथ पधारिए. आप पृथ्वी को जलधार से सींचिए. यह
जलधार प्यास बुझाने वाली है. आप पूरे संसार को इस से सींचिए. ( १० )
आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलि:.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्.. (११)
हे अग्नि! हम ने आप को आमंत्रित किया है. आप उखा के भीतर स्थित व ध्रुव
( स्थिर ) होइए. आप अविचल हो कर रहिए. सभी आप को चाहें. यज्ञ की कृपा से
पूरा राष्ट्र भ्रष्ट ( और कलंकित ) होने से बचे. ( ११ )
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम ँ४ श्रथाय.
अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (१२)
हे वरुण! आप हमारे ऊपर, बीच व नीचे के बंधन दूर कीजिए. आप अदिति
के पुत्र हैं. हम अदिति के प्रति अनागस हो जाएं. ( १२ )
अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो अस्थान्निर्जगन्वान् तमसो ज्योतिषागात्.
अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग ऽ आ जातो विश्वा सद्मान्यप्रा:... (१३)
अग्नि विशाल, प्रज्वलित, ऊषा के आगे स्थित और अंधकार से ज्योति की
ओर जाते हैं. वे सूर्य के साथ सामने प्रकटे. वे अंधकार नाशक के साथ प्रकटे.
उन्होंने उत्पन्न होते ही सभी लोकलोकांतरों को व्याप्त कर लिया. ( १३ )
ह ँ४ स: शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसद्दृतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (१४)
अग्नि गमनशील, पवित्र स्थान में रहने वाले, धनवर्षक. वे सब को बसाने वाले
व अंतरिक्ष में होने वाले हैं. वे देवों के आह्वाहक हैं. वे वेदी में स्थित रहने वाले,
अतिथि, सर्वत्र पूज्य हैं. वे यज्ञगृह में रहने वाले हैं. वे मनुष्यों में प्राण के रूप में रहते
हैं. वे व्योमवासी हैं और चिनगारी से उत्पन्न हैं. वे ऋत और पत्थर से उत्पन्न हैं. वे
विशाल हैं. ( १४ )
सीद त्वं मातुरस्या ऽ उपस्थे विश्वान्यग्ने वयुनानि विद्वान्.
मैनां तपसा मार्चिषाभि शोचीरन्तरस्या ँ४ शुक्रज्योतिर्विभाहि.. (१५)
हे अग्नि! माता की गोद में बैठने की तरह आप इस आसन पर विराजिए. आप
सर्वज्ञ और विद्वान् हैं. आप अपने ताप से इस मचिया को मत तपाइए. आप अपनी
भीतरी ज्योति से हमेशा चमकिए. ( १५ )
१४२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
अन्तरग्ने रुचा त्वमुखायाः सदने स्वे.
तस्यास्त्व ꣳ हरसा तपञ्जातवेदः शिवो भव.. (१६)
हे अग्नि! यह उखा आप का घर है, इस में चमकिए. आप अपने ताप से इसे
तपाइए. आप सर्वज्ञ हैं. आप कल्याणकारी होइए. ( १६ )
शिवो भूत्वा मह्यमग्ने अथो सीद शिवस्त्वम्.
शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (१७)
हे अग्नि! आप मेरे प्रति भी कल्याणमय हो कर इस उखे के घर में विराजिए.
यहां भी कल्याणकारी हो कर ही रहिए. आप सभी दिशाओं को कल्याणकारी
बनाइए. अग्नि! यह उखा आप का मूल स्थान है. आप इस में स्थित होने की कृपा
कीजिए. ( १७ )
दिवस्परि प्रथमं जज्ञे अग्निरस्मद् द्वितीयं परि जातवेदाः.
तृतीयमप्सु नृमणा ऽ अजस्रमिन्धान ऽ एनं जरते स्वाधीः.. (१८)
सर्वप्रथम स्वर्गलोक में अग्नि का जन्म हुआ! दोबारा हमारे पास मनुष्यलोक में
उन का जन्म हुआ. मेघ के रूप में उन का जन्म हुआ! तीसरी बार निरंतर प्रवाहित
होने वाले जलों में उन का जन्म हुआ. वे निरंतर प्रवहमान हैं. ( १८ )
विद्या ते अग्ने त्रेधा त्र्याणि विद्या ते धाम विभृता पुरुत्रा.
विद्या ते नाम परमं गुहा यद्विद्या तमुत्सं यत ऽ आजगन्थ.. (१९)
हे अग्नि! हम आप को तीन प्रकार से तीन रूपों में जानते हैं. आप रक्षक व
सर्वत्र व्याप्त हैं. हम आप के परम गुप्त रूप को भी जानते हैं. हम आप के मूल उत्स
( स्रोत ) को भी जानते हैं, जहां आप इन रूपों में प्रकट हुए हैं. ( १९ )
समुद्रे त्वा नृमणा ऽ अप्स्वन्तर्नृचक्षा ऽ ईंधे दिवो अग्न ऽ ऊधन्.
तृतीये त्वा रजसि तस्थिवा ꣳ समपामुपस्थे महिषा अवर्धन्.. (२०)
हे अग्नि! प्रजापति देव सब के कल्याणकारक हैं. वे आप को ईंधनमय बनाते
हैं. परमात्मा सर्वद्रष्टा हैं. वही आप को प्रज्वलित करते हैं. आप स्वर्गलोक के स्तन
जैसे हैं. आप ही सब की बढ़ोत्तरी करते हैं. ( २० )
अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्.
सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (२१)
अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्वी
को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को
प्रकाशित व उन के मध्य चमकते हैं. ( २१ )
यजुर्वेद - १४३
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
श्रीणामुदारो धरुणो रयीणां मनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः.
वसुः सूनुः सहसो अप्सु राजा वि भात्यग्र ऽ उषसामिधानः.. (२२)
अग्नि उदारता से धन देने वाले, धनधारी, मनुष्यों को स्वर्ग प्राप्त कराने वाले
और सोम के पालक हैं. वे बल के पुत्र, जलों के राजा और प्रदीप्त होने वाले हैं. वे
सब से आगे शोभित होने वाले हैं. ( २२ )
विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भ ऽ आ रोदसी अपृणाज्जायमानः.
वीडुं चिदद्रिमभिनत् परायञ्जना यदग्निमयजन्त पञ्च.. (२३)
अग्नि संसार की पताका और उस का गर्भ हैं. उत्पन्न हो कर वे स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक को व्याप्त कर लेते हैं. इंद्र देव जैसे देवराज रूप में वे बड़े से बड़े पर्वत
को भी भेद देते हैं. पांच व्यक्ति अग्नि की पूजा करते हैं. ( २३ )
उशिकपावको अरतिः सुमेधा मर्त्येष्वग्निरमृतो नि धायि.
इयर्त्ति धूममरुषं भरिभ्रदुच्छुक्रेण शोचिषा द्यामिनक्षन्.. (२४)
अग्नि इच्छा करने योग्य, पवित्र, दुष्टों के प्रति प्रेमहीन और श्रेष्ठ बुद्धि वाले
हैं. वे अमर व मनुष्यों के इच्छापूरक हैं. उन का धुआं ऊपर की ओर जाता है. वे
चमकीले हैं. अग्नि अपनी शोभा स्वर्गलोक तक फैलाते हैं. ( २४ )
दृशानो रुक्म ऽ उर्व्या व्यद्यौद्दुर्मर्षमायुः श्रिये रुचानः.
अग्निरमृतो अभवद्वयोभिर्यदेनं द्यौरजनयत्सुरेताः.. (२५)
अग्नि दर्शनीय हैं व रुक्म जैसी आभावाले हैं. अग्नि अपनी आभा से पृथ्वी पर
शोभित होते हैं. चमकते हैं. अमर हैं. श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं. वे पृथ्वी और स्वर्ग दोनों
लोकों के बीच शोभायमान हैं. ( २५ )
यस्ते अद्य कृणवद्भद्रशोचेऽपूपं देव घृतवन्तमग्ने.
प्र तं नय प्रतरं वस्यो अच्छाभि सुम्नं देवभक्तं यविष्ठ.. (२६)
हे अग्नि! आप शोभादायक हैं. आज यजमान ने आप के लिए विधिविधान और
पवित्रतापूर्वक भोग की सामग्री बनाई है. आप घी से युक्त उस सामग्री को ग्रहण
करने और अपने यजमानों को स्वर्ग के सुख प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( २६ )
आ तं भज सौश्रवसेष्वग्न ऽ उक्थ ऽ उक्थ ऽ आ भज शस्यमाने.
प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवात्युज्जातेन भिनददुज्जनित्वैः.. (२७)
हे अग्नि! आप यजमान को श्रेष्ठ यशदायी कामों व शास्त्र के पठनपाठन में
लगाने की कृपा कीजिए. सूर्य और अग्नि प्रिय हैं. इन की कृपा से हम उन्नतिशील
पुत्र और पौत्र प्राप्त करते हैं. इन की कृपा से हम अतीव अभ्युदय को प्राप्त करते
हैं. ( २७ )
१४४ - यजुर्वेद 632/9
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
त्वामग्ने यजमाना ऽ अनु द्यून् विश्वा वसु दधिरे वार्याणि.
त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमन्तमुशिजो विवव्रुः.. (२८)
हे अग्नि! हम यजमान प्रतिदिन आप का अनुसरण करते हैं. यजमान आप की
कृपा से सभी प्रकार के धन प्राप्त करते हैं. आप के साथ हम सभी प्रकार के धन
की इच्छा करते हुए उशिजों की तरह गायों के बाड़े में चले जाएं. ( २८ )
अस्ताव्यग्निन॑रा ᳪ सुशेवो वैश्वानर ऽ ऋषिभिः सोमगोपाः.
अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (२९)
अग्नि यजमानों के द्वारा सेवन योग्य हैं. अग्नि विद्वानों के द्वारा स्तुति किए
जाने योग्य हैं. अग्नि नायक और सोम पालक हैं. हम द्वेष रहित स्वर्गलोक व
पृथ्वीलोक का आह्वान करते हैं. हे देव! आप हमें सुवीर बनाइए और हमारे लिए
धन धारिए. ( २९ )
समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्.
आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (३०)
हे अग्नि! आप समिधावान हैं. हम आप की परिक्रमा करते हैं. आप हमारे
अतिथि हैं. हम घी से आप को जगाते हैं. आप इस में हवि होमने की कृपा
कीजिए. ( ३० )
उदु त्वा विश्वे देवा ऽ अग्ने भरन्तु चित्तिभिः.
स नो भव शिवस्त्व ᳪ सुप्रतीको विभावसुः... (३१)
हे अग्नि! आप प्राणस्वरूप हैं. आप को अपनी बुद्धि से ऊपर की ओर धारण
करने की कृपा करें. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. आप
सुमुख और ज्योति रूप धन वाले हैं. ( ३१ )
प्रेदग्ने ज्योतिष्मान् याहि शिवेभिरर्चिभिष्ट्वम्.
बृहद्भिर्भानुभिर्भासन्मा हि ᳪ सीस्तन्वा प्रजाः... (३२)
हे अग्नि! आप ज्योतिष्मान हैं. आप इसी रूप में यहां से प्रस्थान करने की कृपा
कीजिए. हम कल्याणकारी स्तुतियों से आप की अर्चना करते हैं. आप की ये बड़ी-
बड़ी लपटें सूर्य की तरह चमकती हैं. आप अपनी इन लपटों से अपनी संतान के
प्रति हिंसा मत कीजिए. ( ३२ )
अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्.
सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः... (३३)
अग्नि के गरजने की आवाज मेघ के गरजने की आवाज के समान है. पृथ्वी
को मेघ के समान ही भिगाते हैं. समिधावान अग्नि स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को
यजुर्वेद - १४५
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
प्रकाशित करते हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के मध्य चमकते हैं. ( ३३ )
प्र प्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः.
अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ दीदाय दैव्यो अतिथिः शिवो नः.. (३४)
अग्नि द्वारा बुलाने के लिए बोले गए मंत्र को सुनते हैं. अग्नि सूर्य के समान
भासित होते हैं. वे युद्ध में पुरु के सहायक रहे. वे राजा, दिव्य और हमारे अतिथि
हैं. हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा करें. ( ३४ )
आपो देवीः प्रतिगृह्णीत भस्मैतत्स्योने कृणुध्व १४ सुरभा ऽ उ लोके.
तस्मै नमन्तां जनयः सुपत्नीर्मातेव पुत्रं बिभृताप्स्वेनत्.. (३५)
हे जलदेवी! आप इस भस्म को स्वीकारने और इस से लोकों को सुगंधित
बनाने की कृपा कीजिए. वरुण देव पत्नियों सहित इस के प्रति नमें तथा इसे उसी
प्रकार धारें, जैसे माता पुत्र को धारण करती है. ( ३५ )
अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे. गर्भे सञ्जायसे पुनः.. (३६)
हे अग्नि! जल में आप की सहस्थिति है. आप जल के साथ ओषध धारण करते
हैं. वनस्पतियों के गर्भ से बारबार प्रकट होते हैं. ( ३६ )
गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्.
गर्भो विश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि.. (३७)
हे अग्नि! आप ओषधियों का गर्भ हैं. आप वनस्पतियों का गर्भ हैं. आप सभी
प्राणियों का गर्भ हैं. आप सभी जलों का गर्भ हैं. ( ३७ )
प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने.
स १४ सृज्य मातृभिष्ट्वं ज्योतिष्मान् पुनरा सदः.. (३८)
हे अग्नि! भस्म से आप अपने मूल स्थान पृथ्वी को प्राप्त होइए. आप जल
के साथ मिलिए और पुनः ज्योतिष्मान होइए. आप पुनः अपने सदन में प्रवेश
कीजिए. ( ३८ )
पुनरासद्य सदनमपश्च पृथिवीमग्ने.
शेषे मातुरथोपस्थेन्तरस्या १४ शिवतमः.. (३९)
हे अग्नि! आप पुनः अपने सदन में प्रवेश कीजिए. आप पृथ्वी पर ऐसे शयन
कर रहे हैं, जैसे संतान मां की गोद में सो रही हो. आप हमारे प्रति कल्याणकारी
होने की कृपा कीजिए. ( ३९ )
पुनरुर्जा निवर्त्तस्व पुनरग्न ऽ इषायुषा. पुनर्नः पाह्य १४ हसः.. (४०)
१४६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप हमें पुनः ऊर्जस्वी और आयुष्मान बनाइए. आप हमें पुनः पाप
से बचाइए. (४०)
सह रय्या निवर्त्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (४१)
हे अग्नि! आप हमें पुनः धन के साथ प्राप्त होइए. आप वर्षा की धारा से पृथ्वी
पर सारी वनस्पति को बढ़ाने की कृपा करें. (४१)
बोधा मे अस्य वचसो यविष्ठ म ँ४ हिष्ठस्य प्रभृतस्य स्वधावः.
पीयति त्वो अनु त्वो गृणाति वन्दारुष्टे तन्वं वन्दे अग्ने.. (४२)
हे अग्नि! आप हमारे इन वचनों को सुनिए. प्रसन्न व्यक्ति आप की और रुष्ट
व्यक्ति आप को कोसते हैं. हम आप के तन का वंदन करते हैं. (४२)
स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्.
युयोध्यस्मद् द्वेषा ँ४ सि विश्वकर्मणे स्वाहा.. (४३)
हे अग्नि! आप धन के स्वामी और धनदाता हैं. आप हमारे द्वेषियों को दूर करने
की कृपा कीजिए. सर्वकर्मा अग्नि के लिए स्वाहा. (४३)
पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतां पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथ यज्ञैः.
घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (४४)
हे अग्नि! आप को आदित्य, रुद्र, वसु पुनः प्रज्वलित करने की कृपा करें.
अग्नि धन के नेता हैं. वे यज्ञ से यजमान आप को बारबार प्रज्वलित करने की कृपा
करें. वे घी से आप अपने शरीर की बढ़ोतरी करने और अपने यजमान की कामनाएं
पूरी करने की कृपा करें. (४४)
अपेत वीत वि च सर्पतातो येत्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः.
अदाद्यमोवसानं पृथिव्या ऽ अक्रन्निमं पितरो लोकमस्मै.. (४५)
नए पुराने जो भी यमदूत यहां हों वे दूर, बहुत दूर चले जाएं. बहुत दूर हट
जाएं. पृथ्वी का यह स्थान यमराज ने स्वयं यज्ञ हेतु हमारे पूर्वजों को देने की
कृपा की है. (४५)
संज्ञानमसि कामधरणं मयि ते कामधरणं भूयात्.
अग्नेर्भस्मास्यग्नेः पुरीषमसि चित स्थ परिचित ऽ ऊर्ध्वचितः श्रयध्वम्.. (४६)
हे उषा! आप सम्यक् ज्ञान हैं. आप कामनाएं धारण करती हैं. आप हमारे लिए
भी कामना धारण करने वाली हों. आप भस्म और अग्नि की पूरक हैं. धरती पर
बालू की पतली रेखाएं बिछाई गई हैं. आप चारों ओर तथा ऊपर की ओर स्थापित
होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ को श्रेयस्कर बनाइए. (४६)
यजुर्वेद - १४७
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
अय छ्ष सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः.
सहस्रियं वाजमत्यं न सप्ति छ्ष ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (४७)
यह वही अग्नि है, जिसे सोम के रूप में इंद्र देव अपनी जठराग्नि में भरते हैं.
यह हजार गुना है. यह अन्नमय, बलदायी और सर्वज्ञ है. हजारों के द्वारा इन की
स्तुति की जाती है. ( ४७ )
अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र.
येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (४८)
हे अग्नि! आप का जो वर्चस्व स्वर्गलोक में है, वही वर्चस्व पृथ्वीलोक में है.
वही वर्चस्व ओषधियों व जलों में है. जिस से आप ने अंतरिक्ष का विस्तार किया
वही यह सूर्य है. वह सभी मनुष्यों को देखने वाला है. ( ४८ )
अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ २ ऊचिषे धिष्ण्या ये.
या रोचने परस्तात् सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त ऽ आपः.. (४९)
हे अग्नि! आप स्वर्गलोक से सीधे जल पाते हैं. देवगण हमारी बुद्धि को
ऊंचाई की ओर प्रेरित करते हैं. जो सामने सूर्य के रूप को भासित है और जो
नीचे जल के रूप में स्थित है, आप दोनों प्रकार के जलों की बरसात करने की
कृपा करते हैं. ( ४९ )
पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः.
जुषन्तां यज्ञमद्रुहोनमीवा ऽ इषो महीः.. (५०)
हे अग्नि! पशुओं का हित साधने वाली, लोक में व्यापक मन के साथ प्रेम
रखने वाली, बीमारियां दूर करने वाली, अन्न देने वाली, वर्षा करने वाली, इष्ट
सिद्धि करने वाली अग्नियां प्रेमपूर्वक इस यज्ञ का सेवन करने की कृपा करें. ( ५० )
इडामग्ने पुरुद छ्ष स छ्ष सनिं गोः शश्वत्तम छ्ष हवमानाय साध.
स्यानः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५१)
हे अग्नि! आप बहुकर्मा हैं. आप यजमान के लिए गाय के ( दूध, दही ) घी
आदि का दान कीजिए. हमें पुत्र संतान दीजिए. हमारी संतान हमारा और आगे वंश
बढ़ाए. अपनी वह कल्याणकारी बुद्धि हमें प्राप्त कराइए. ( ५१ )
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः.
तं जानन्नग्न ऽ आ रोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (५२)
हे अग्नि! आप की यह वेदी ऋतु को जन्म देने वाली है. इसी से उत्पन्न हो कर
आप चमकते हैं. आप यह जानते हुए इस पर चढ़ने की कृपा कीजिए. आप हमारे
धन की बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. ( ५२ )
१४८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
चिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.
परिचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५३)
हे अग्नि! अब आप की स्थापना कर दी गई है. अब आप अंगअंग में रमने की
कृपा कीजिए. आप चित्त हैं. अब आप विराजिए. आप को चारों ओर स्थापित कर
दिया गया है. आप चित्त से स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( ५३ )
लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्.
इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन् योनावसीषदन्.. (५४)
हे अग्नि! लोक को पूरने से जो जगह रह गई आप उन छेदों को भरने की कृपा
कीजिए. आप वहां स्थिर हो कर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव
अग्नि और बृहस्पति देव ने यहां स्थापित किया है. ( ५४ )
ता ऽ अस्य सूददोहसः सोम १७ श्रीणन्ति पृश्नयः.
जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः.. (५५)
स्वर्गलोक से जो जल मिलता है, उस से सोम शोभा पाते हैं. देवों के जन्मजन्म
और प्रत्येक यज्ञ में यह सोम इस स्वर्गिक जल से परिपक्व होता है. ( ५५ )
इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतम १७ रथीनां वाजाना १७ सत्पतिं पतिम्.. (५६)
सभी वाणियां समुद्र के समान विस्तृत हैं. वे वाणियां रथियों में महारथी इंद्र
देव की महिमा का गुणगान करती हैं. इंद्र देव बलवानों में सर्वाधिक बलशाली हैं.
इंद्र देव पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ५६ )
समित १७ सङ्कल्पेथा १७ संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ.
इषमूर्जमभि संवसानौ.. (५७)
हे इंद्र देव! हम समान मति वाले हों. हम सब आपस में प्रिय हों. हम सब
प्रकाशवान हों. हम सब एक साथ प्रेरित हों. हम सब समान ऊर्जस्वी हों. हमारे यज्ञ
का सफलतापूर्वक समापन हो. ( ५७ )
सं वां मना १७ सि सं व्रता समु चित्तान्याकरम्.
अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वं न ऽ इषमूर्जं यजमानाय धेहि.. (५८)
हे अग्नि! हमारे मन समान हों. हमारे संकल्प समान हों. हे अग्नि! आप पुरियों
के स्वामी हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप यजमान के लिए ऊर्जा धारिए. ( ५८ )
अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिमाँ २ असि.
शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (५९)
यजुर्वेद - १४९
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप नगरों के स्वामी हैं. आप धनवान हैं. आप पुष्टिमान हैं. आप
सभी दिशाओं को कल्याणकारी बनाइए. आप यहां अपने मूल स्थान में प्रतिष्ठित
होने की कृपा कीजिए. (५९)
भवतन्नः समनसौ सचेतसावरेपसौ.
मा यज्ञ १४ हि १४ सिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः.. (६०)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमें समान मन वाला बनाइए. आप हमें समान चित्त
वाला बनाइए. आप हमें समान श्रद्धा वाला बनाइए. आप यज्ञ में हिंसा मत कीजिए.
आप यज्ञपति हैं. आप आज हमारे प्रति कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (६०)
मातेव पुत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्नि १४ स्वे योनावभारुखा.
तां विश्वैर्देवैर्ऋतुभिः संविदानः प्रजापतिर्विश्वकर्मा वि मुञ्चतु.. (६१)
जैसे माता पुत्र को धारती है, वैसे ही उखा कल्याणकारी अग्नि को धारती है.
समस्त देवगणों और ऋतु द्वारा ऐक्य भाव से प्रेरित उखा को प्रजापति विश्वकर्मा
पाश से मुक्त करने की कृपा करें. (६१)
असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य.
अन्यमस्मदिच्छ सा त ऽ इत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु.. (६२)
हे दुष्ट दलन में समर्थ! आप चोरों और तस्करों का नाश करने में समर्थ हैं. आप
विशिष्ट शक्तिवान हैं. आप चोरडाकू छोड़ कर अन्य लोग हमें दीजिए. हे देवी! आप
के लिए हमारा नमस्कार. (६२)
नमः सु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयं विचृता बन्धमेतम्.
यमेन त्वं यम्या संविदानोत्तमे नाके अधि रोहयैनम्.. (६३)
हे निर्ऋते! आप तेजस्वी हैं. आप शक्तिमान हैं. आप लोहे जैसी दृढ़ हैं. आप हमें
सांसारिक सत्व बंधन से मुक्त कीजिए. यजमान को यमलोक से उत्तम स्वर्गलोक में
पहचानने की कृपा कीजिए. (६३)
यस्यास्ते घोर ऽ आसञ्जुहोम्येषां बन्धानामवसर्जनाय.
यां त्वा जनो भूमिरिति प्रमन्दते निर्ऋतिं त्वाहं परिवेद विश्वतः.. (६४)
हे निर्ऋते! आप क्रूर स्वभाव वाली हैं. हम जन्ममरण के बंधन से मुक्त होने के
लिए आप को आहुति भेंट करते हैं. भले ही लोग आप को भूमि कहते हैं, पर वे
आप को सब ओर से सर्वज्ञ मानते हैं. (६४)
यं ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध पाशं ग्रीवास्वविचृत्यम्.
तं ते विष्याम्यायुषो न मध्यादथैतं पितुमद्धि प्रसूतः.
नमो भूत्यै येदं चकार.. (६५)
१५० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
निर्ऋत देवी उन बंधनों को हटाती हैं जिन पाशों ने आप की गरदन को जकड़
रखा था, आप उन बंधनों से छूटिए. आप पोषक अन्न को ग्रहण कीजिए. आप हमें
धन दीजिए. देवी को हमारा नमन. ( ६५ )
निवेशनः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः.
देव ऽ इव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे पथीनाम्.. (६६)
हे अग्नि! आप वासदाता, धनदाता, रूपवान और अभीष्ट फलदाता हैं. आप
सविता देव जैसे प्रकाशवान हैं. सत्य रूपी धर्म वाले हैं. युद्ध में इंद्र देव की भांति
स्थिर रहने वाले हैं. ( ६६ )
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (६७)
आप कवि व धीर हैं. देवों के अच्छे मन के लिए आप हल को बैल के जोड़े
के साथ जोतते हैं. ( ६७ )
युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्.
गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय ऽ इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (६८)
हे किसानो! आप हल को जोड़िए. बैल के कंधों पर जुआ रखिए. आप खेत
को जोतिए. आप बीज बोइए. सृष्टि में अच्छी फसल के लिए स्तुति कीजिए. अन्न
भरभर कर तैयार हो. अन्न अच्छी तरह पके. ( ६८ )
शुन १४ सु फाला वि कृषन्तु भूमि १४ शुनं कीनाशा ऽ अभि यन्तु वाहैः.
शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ऽ ओषधीः कर्तनास्मे.. (६९)
भूमि को हल के फाल से अच्छी तरह जोतिए. किसान बैलों के साथ आराम
से जाएं. हे वायु! हे सूर्य! आप हवि से प्रसन्न होइए. आप पृथ्वी को जल से सींचिए.
आप ओषध उपजाइए. आप पृथ्वी को श्रेष्ठ फलों से पूरिए. ( ६९ )
घृतेन सीता मधुना समंज्यतां विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः.
ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान्त्सीते पयसाभ्याववृत्स्व.. (७०)
विश्व और मरुद्गण हल के फाल को अनुमति देने की कृपा करें. उसे शहद से
सींचने की कृपा करें. आप ऊर्जस्वी होइए. आप दूध से दिशाओं को और हमें घी व
दूध से सींचिए. ( ७० )
लाङ्गलं पवीरवत्सुशेव १४ सोमपित्सरु.
तदुद्वपति गामविं प्रफर्व्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनम्.. (७१)
हल फाल युक्त हैं. पृथ्वी को खोदते हैं. सोम के रक्षक और कल्याणकारी हैं.
कृषि उत्पादन के साथ ही भेड़, बकरी पुष्ट, गौएं रथ वहन करने वाले उत्तम घोड़े
प्रदान करते हैं. ( ७१ )
यजुर्वेद - १५१
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
कामं कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च.
इन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्य ऽ ओषधीभ्यः.. (७२)
हल सभी कामनाओं का दोहन करने वाले हैं. मित्र देव और वरुण देव के लिए
इंद्र देव तथा अश्विनी देव के लिए पूषा देव एवं प्रजागण के लिए ओषधियां
उपलब्ध कराने वाले हैं. ( ७२ )
विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना ऽ अगन्म तमस्सपारमस्य. ज्योतिरापाम.. (७३)
मनुष्य अवध्य और यज्ञ के द्वारा देव मार्ग पर ले जाते हैं. आप संसार के पार
ले जाने वाले हैं. हम ईश्वर की कृपा से ज्योति को प्राप्त करें. ( ७३ )
सजूरब्दो अयवोभिः सजूरुषा ऽ अरुणीभिः.
सजोषसावाश्विना द ँश्व सोभिः सजूः सूर ऽ एतशेन सजूर्वैश्वानर ऽ इडया घृतेन
स्वाहा.. (७४)
महीने, दिन और वर्ष से प्रेम रखने वाले के लिए स्वाहा. लाल किरणों से प्रेम
रखने वाली उषा देवी के लिए स्वाहा. चिकित्सकीय कार्यों से प्रेम रखने वाले
अश्विनी देवों के लिए स्वाहा. घोड़ों से प्रेम रखने वाले सूर्य देवों के लिए स्वाहा.
घी से प्रेम रखने वाले अग्नि देव के लिए स्वाहा. ( ७४ )
या ऽ ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा.
मनै नु बभ्रूणामह ँश्व शतं धामानि सप्त च.. (७५)
पहले देवताओं के लिए तीन युग में ओषधियां उत्पन्न हुई हैं. हमें सैकड़ों धाम
और सात धान्यों की क्षमता का ज्ञान है. ओषधियां पक कर भूरेपीले रंग की हो जाती
हैं. ( ७५ )
शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः.
अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत.. (७६)
ओषधियों के सैकड़ों नाम हैं. मां के समान गुण युक्त हैं. उन के सैकड़ों
धाम हैं. वे सैकड़ों यज्ञ कराने वाली हैं. आप हमारे अंगों को पुष्ट करने की कृपा
कीजिए. ( ७६ )
ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः.
अश्वा ऽ इव सजित्त्वरीर्वीरुधः पारयिष्ण्वः.. (७७)
ओषधियां पुष्पवती हैं. फल उपजाने वाले गुणों से युक्त हैं. ओषधियां हमें
आनंद प्रदान करने वाली और घोड़े की तरह वेगवती हैं. रुकावटों ( बीमारियों ) को
तेजी से दूर ( नष्ट ) करने की कृपा करें. ( ७७ )
१५२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधीरिरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे.
सनेयमश्वं गां वास ऽ आत्मानं तव पूरुष.. (७८)
ओषधियां मातापिता के समान और दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम उन के गुणों
के बारे में कहते रहते हैं. हे यज्ञ पुरुष! आप से प्राप्त घोड़े, गाय और आत्मिक सुखों
का उपभोग करें. ( ७८ )
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता.
गोभाज ऽ इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (७९)
ओषधियों का निवास पीपल और पत्तों में है. आप गो भाजन बनिए. आप
आकाश का सेवन कीजिए. आप वर्षा करिए. आप यजमान को अन्नधन संपन्न
बनाइए. ( ७९ )
यत्रौषधी: समग्मत राजान: समिताविव.
विप्र: स ऽ उच्यते भिषग्रक्षोहामीवचातन:... (८०)
जैसे राजा राक्षसों पर विजय पाने के लिए युद्ध में जाते हैं, वैसे ही ओषधियां
रोगी और रोग के पास जाती हैं. रोगनाशक होने के ही कारण उन्हें वैद्य और विप्र
कहा जाता है. ( ८० )
अश्वावती ४ सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्.
आवित्सि सर्वा ऽ ओषधीरस्मा ऽ अरिष्टतातये.. (८१)
अनिष्ट का निवारण करने के लिए अश्ववती और सोमवती ऊर्जा से हम
परिचित हैं. यह ऊर्जा ओजस्विता की पोषक है. ( ८१ )
उच्छुष्मा ऽ ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते.
धन ४ सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष.. (८२)
जैसे गोशाला से गाएं जंगल में जाती हैं, वैसे ही यज्ञ का धुआं वायुमंडल में
जाता है. अग्नि के शरीर से निकलती हुई लपट से उन की शक्ति और सामर्थ्य प्रकट
होती है. ( ८२ )
इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूय ४ स्थ निष्कृती:.
सीरा: पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ.. (८३)
आप रोग निवारक हैं. आप माता जैसी हैं. आप विकारनाशक हैं. आप अन्न
की भांति मनुष्य को शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ८३ )
अति विश्वा: परिष्ठा स्तेन ऽ इव व्रजमक्रमू:.
ओषधी: प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो रप:... (८४)
यजुर्वेद - १५३
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधियां रोग पर वैसे ही आक्रमण करती हैं, जैसे चोर गायों के बाड़े पर आक्रमण
करते हैं. ओषधियां शरीर के समस्त रोगों और विकारों को नष्ट करती हैं. ( ८४ )
यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त ऽ आदधे.
आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. ( ८५ )
जैसे वधगृह में ले जाया जा रहा प्राणी वहां पहुंचने से पहले ही अपने को
मरा हुआ मान लेता है, वैसे ही इन शक्तिशाली ओषधियों को लेने से पहले हम
जब हाथ में रखते हैं, तो राजयक्ष्मा जैसे भीषण रोग भी भाग जाते हैं. ( ८५ )
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः.
ततो यक्ष्मं वि बाधध्व ऽ उग्रो मध्यमशीरिव.. ( ८६ )
जब ओषधि कठोर शरीर के अंगप्रत्यंग में पसरती ( फैलती ) है तो यक्ष्मा आदि
भयंकर रोगों को भी पूरी तरह समाप्त कर देती है. ( ८६ )
साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना.
साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. ( ८७ )
ओषधि लेने के साथ ही यक्ष्मा रोग दूर हो जाता है. प्राणवायु की तरह ओषधि
के शरीर में व्याप्त होने के साथ ही शेष रोग भी नष्ट हो जाता है. ( ८७ )
अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या ऽ उपावत.
ताः सर्वाः संविदाना ऽ इदं मे प्रावता वचः.. ( ८८ )
हे ओषधियो! आप एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाने की कृपा कीजिए. सभी
ओषधियां परस्पर सहयोग और हमारे इन वचनों को सुनने की कृपा करें. ( ८८ )
याः फलिनीर्या ऽ अफला ऽ अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः.
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ँहसः.. ( ८९ )
फल वाली, फलहीन, पुष्पहीन, पुष्पवती, बहुत उत्पन्न होने वाली ओषधियां
हमें रोगों से मुक्त कराने की कृपा करें. ( ८९ )
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत.
अथो यमस्य पड्वीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्.. ( ९० )
हे ओषधियो! आप हमें कुपथ्य और दूषित जल से होने वाले विकारों से मुक्त
कीजिए. आप हमें छहों अनुशासन न पालने से उत्पन्न विकारों से भी मुक्त करने
की कृपा कीजिए. ( ९० )
अवपतन्तीरवदन्दिव ऽ ओषधयस्परि.
यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. ( ९१ )
१५४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
स्वर्गलोक से ओषधियां पृथ्वीलोक को प्राप्त होती हैं. जो जीव इन का ठीक
से सेवन करता है, वह कभी समय से पहले मरता नहीं है. ( ९१ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्बहीः शतविचक्षणाः.
तासामसि त्वमुत्तमार्ं कामाय श १७ हृदे.. (९२)
ओषधि सोम की रानी व बहुगुणा है. वह सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है. वे
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली व हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ( ९२ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु.
बृहस्पतिप्रसूता ऽ अस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९३)
जो ओषधि सोम की रानी है, वह बहुगुणा है. सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है.
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली हैं. हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ओषधियां
पुरुष को वीर्यवान बनाने की कृपा करें. ( ९३ )
याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः.
सर्वाः संगत्य वीरुधोस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९४)
जो ओषधियां पास हैं, जो दूर हैं, जो विभिन्न रूपों में उगी हुई हैं, वे सभी
हमारी प्रार्थनाएं सुनती हैं. सभी ओषधियां साथ मिल कर हमें वीर्य ( शक्ति ) प्रदान
करने की कृपा करें. ( ९४ )
मा वो रिषत् खनिता यस्मै चाहं खनामि वः.
द्विपाच्चतुष्पादस्माक १७ सर्वमस्त्वनातुरम्.. (९५)
हे ओषधियो! जब हम रोग के उपचार के लिए आप को खोदते हैं तो आप की
कृपा से खनन दोष से मुक्त हों. दोपाए, चौपाए और हमारे सभी लोग आप की
कृपा से रोग मुक्त हो जाएं. ( ९५ )
ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा.
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्त १७ राजन् पारयामसि.. (९६)
ओषधियां अपने स्वामी सोम राजा के समान ही कहती हैं—राजन्! हम जिसे
ब्राह्मण बना देती हैं, वह पार हो जाता है. ( ९६ )
नाशयित्री बलासस्यार्शस ऽ उपचितामसि.
अथो शतस्य यक्ष्माणां पाकारोरसि नाशनी.. (९७)
ओषधियां बलनाशक व रोगों का भी नाश करने वाली हैं. ओषधियां मस्से जैसे
रोगों का भी उपचार करने वाली हैं. ओषधियां यक्ष्मा जैसे सैकड़ों रोगों व पके हुए
फोड़े का भी नाश करने वाली हैं. ( ९७ )
यजुर्वेद - १५५
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
त्वां गन्धर्वा ऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः.
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत.. (९८)
गंधर्वों, इंद्र देव व बृहस्पति देव ने ओषधियों का खनन किया. राजा सोम ने
ओषधियों का खनन किया. वे राजा और विद्वान् हैं. उन्होंने यक्ष्मा रोग से मुक्त
किया. ( ९८ )
सहस्व मे अरातीः सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वं पाप्मान १७ सहमानास्योषधे.. (९९)
हे ओषधियो! आप शरीर के सभी शत्रुओं को दूर करने में समर्थ हैं. उन्हें दूर
करने की कृपा कीजिए. हे ओषधियो! आप अपनी सामर्थ्य से हमें सभी कष्टों से
मुक्त कराने की कृपा कीजिए. ( ९९ )
दीर्घायुस्त ऽ ओषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम्.
अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्.. (१००)
हे ओषधि! आप का खनन करने वाले दीर्घायु हों. मैं भी आप का खनन करता
हूं. मैं भी दीर्घायु होऊं. आप भी दीर्घायु होने की कृपा करें. सैकड़ों अंकुरों से युक्त
होने की कृपा करें. ( १०० )
त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा ऽ उपस्तयः.
उपस्तिरस्तु सोस्माकं यो अस्माँ २ अभिदासति.. (१०१)
हे ओषधि! आप उत्तम हैं. आप के समीप वाले वृक्ष आप के लिए कल्याणकारी
हों, जो हमारे प्रति दुर्भावनामय हों, वे भी आप की कृपा से हमारे अनुकूल हो
जाएं. ( १०१ )
मा मा हि १७ सीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिव १७ सत्यधर्मा व्यानट्.
यश्चापश्चन्द्राः प्रथमो जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०२)
जो पृथिवी के जन्मदाता हैं, जो स्वर्गलोक के रचयिता हैं, जो आदिपुरुष हैं, जो
सत्यधर्मा हैं, हम उन के प्रति कभी भी विपरीत न हों. हम कभी भी उन के प्रतिकूल
न रहें. जो प्रथम जन्मा है, उस के अलावा हम अन्य किस देव को अपनी आहुति
अर्पित करें. ( १०२ )
अभ्यावर्त्तस्व पृथिवि यज्ञेन पयसा सह. वपां ते अग्निरिषितो अरोहत्.. (१०३)
हे पृथिवी! यज्ञ से होने वाली बरसात के साथ आप हमारे अनुकूल होने की कृपा
कीजिए. आप अग्नि पर आरोहण करने की कृपा कीजिए. ( १०३ )
अग्ने यत्ते शुक्लं यच्चन्द्रं यत्पूतं यच्च यज्ञियम्. तद्देवेभ्यो भरामसि.. (१०४)
१५६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप की जो ज्वाला चमकीली और चंद्रमा जैसी है, आप की जो
ज्वाला पवित्र है और यज्ञ से संबंधित है, हम उन्हें आहुति अर्पित करते हैं. (१०४)
इषमूर्जमहमित आदमृतस्य योनिं महिषस्य धाराम्.
आ मा गोषु विशत्वा तनूषु जहामि सेदिमनिराममीवाम्.. (१०५)
अग्नि ऊर्जस्वी, अमरता के मूल व महान् इच्छाएं पूरी करने वाले हैं. हम अग्नि
को आमंत्रित करते हैं. वे गायों में और हमारे शरीर में प्रवेश करने की कृपा करें.
उन की कृपा से हम निरोगी हो जाएं. (१०५)
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे.. (१०६)
हे अग्नि! आप प्रसिद्ध धनवान व त्रिकालज्ञ हैं. आप का धुआं यज्ञ होने की
सूचना देता हुआ स्वर्गलोक तक जाता है. आप यमजान को अन्नधन प्रदान करते
हैं. (१०६)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा ऽ अनूनवर्चा ऽ उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (१०७)
हे अग्नि! आप पवित्र और अत्यधिक वर्चस्व वाले हैं. आप सूर्य रूप में उदय
होते हैं. जैसे मातापिता बेटे का पालनपोषण करते हैं, वैसे ही आप स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक दोनों लोकों का पालन करते हैं. (१०७)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (१०८)
हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी, सर्वज्ञ हैं. हम अच्छी प्रशंसा से आप को आनंदित
करते हैं. आप सब का हित धारिए. यजमान रक्षा साधनों से सुरक्षित और श्रेष्ठ कुल
में जन्म लेने वाले हैं. वे आप को अन्नमयी आहुति भेंट करते हैं. (१०८)
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य.
स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्.. (१०९)
हे अग्नि! आप अविनाशी हैं. यजमान सर्वप्रथम आप को प्रज्वलित करते हैं.
आप यजमानों को धन प्रदान कीजिए. आप अपने सुंदर शरीर से शोभित होते हैं.
आप यज्ञ में सारी आकांक्षाएं पूर्ण करते हैं. (१०९)
इष्कर्त्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्त ँ१s राधसो महः.
रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसि ँ१s रयिम्.. (११०)
हे अग्नि! आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, श्रेष्ठ चिंतन वाले हैं. आप यजमान को महान्
यजुर्वेद - १५७
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
धन प्रदान करते हैं. उस को सौभाग्यशाली और महान् महिमावान बनाते हैं. आप
हमारे लिए भौतिक और आध्यात्मिक वैभव धारण करते हैं. ( ११० )
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतर्माग्न ँ सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः.
श्रुत्कर्ण ँ सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (१११)
हे अग्नि! आप सत्यवान, महिमाशाली व समस्त विश्व के लिए दर्शनीय
हैं. हम नगरवासी अच्छे मन के लिए आप को धारण करते हैं. आप प्रसिद्ध
और प्रथम वंदनीय हैं. मनुष्य युगयुग से दिव्य गुणों वाले आप का गुणगान करते
हैं. ( १११ )
आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (११२)
हे सोम! विश्व की तेजस्विता आप को प्रसन्न करे. आप वृद्धि को प्राप्त
करने की कृपा करें. आप अन्न की संगति के लिए हमारे पास पधारने की कृपा
करें. ( ११२ )
सन्ते पया ँ सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा ँ स्युत्तमानि धिष्व.. (११३)
हे सोम! आप पोषक रस और अन्न बरसाने की कृपा करें. आप अमृत से तृप्त
कीजिए. आप स्वर्गलोक में विख्यात हैं. आप चिरकाल तक स्थिर होने की कृपा
कीजिए. ( ११३ )
आप्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिर ँ शुभिः.
भवा नः सप्रथस्तमः सखा वृधे.. (११४)
हे सोम! आप आनंददाता हैं. आप सर्वत्र प्रसन्न होने की कृपा कीजिए. आप
शुभ होइए. आप विख्यात और हमारे मित्र हैं. आप बढ़ोतरी पाइए. ( ११४ )
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वाङ्कामया गिरा.. (११५)
हे अग्नि! हम आप के पुत्र हैं. आप परम स्थान पर विराजते हैं. हम श्रेष्ठ स्तोत्रों
से आप की वाणीमय वंदना करते हैं. ( ११५ )
तुभ्यन्ता ऽ अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (११६)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंगों वाले हैं. आप के प्रति पृथ्वी की श्रेष्ठ प्रार्थनाएं
अलग से समर्पित की जाती हैं. हम अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए आप की
उपासना करते हैं. ( ११६ )
अग्निः प्रियेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको वि राजति.. (११७)
१५८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप अपने प्रिय धामों पर स्वेच्छा से सुशोभित हो रहे हैं. आप वर्तमान
और भविष्य की सब मनोकामनाओं के पूरक और सम्राट् हैं. आप दीप्तिमान हो
कर शोभित हो रहे हैं. ( ११७ )
यजुर्वेद - १५९
तेरहवां अध्याय
तेरहवां अध्याय
मयि गृह्णाम्यग्रे अग्नि छँ रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.
मामु देवताः सचन्ताम्.. (१)
हे अग्नि! आप धन के उत्पादक, श्रेष्ठ संतति वाले और श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं.
हम यह सब पाने के लिए आप को आहुतियों से सींचते हैं. आप हमें ग्रहण करने
की (स्वीकारने की) कृपा कीजिए. (१)
अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम्.
वर्धमानो मँहाँ २ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व.. (२)
आप जलधारी, अग्नि का मूल स्थान और समुद्र के साथ वृद्धि पाते हैं.
आप महान् हैं. आप पृथ्वी की तरह विस्तृत हों. आप स्वर्गलोक की दिव्यता प्राप्त
कीजिए. (२)
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽ आवः.
स बुध्न्या ऽ उपमा ऽ अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (३)
सर्वप्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुआ. उस के बाद शक्ति व्यापक हुई. उस शक्ति ने
व्यक्त जगत् को प्रकाशित किया. उस शक्ति ने अव्यक्त जगत् को प्रकाशित किया.
सत् इस की विष्ठा, मल और असत् इस का मूल स्थान हुआ. (३)
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ में परम तत्त्व रहा. उसी से सृष्टि उपजी. वे ही एकमात्र
पालक थे. उन्होंने पृथ्वी को धारण किया. वही स्वर्गलोक को धारण करते हैं. उन
के अलावा हम अन्य किस देव के लिए हवि का विधान करें. (४)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्चः पूर्वः.
समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (५)
प्रारंभ से ही ‘द्रप्स’ रस (एक दिव्य रस) देवता को तृप्ति प्रदान करते हैं और
पृथ्वी को बढ़ाते हैं. स्वर्गलोक की बढ़ोतरी करते हैं. मूल स्थान को सींचते हैं. द्रप्स
१६० - यजुर्वेद 632/10