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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय

Page 208Permalink

पूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय
समुद्रस्य त्वावकयाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (४)
हे अग्नि! हम आप को समुद्र के कवक से चारों ओर से घेर कर रखते हैं. आप
हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी होइए. (४)
हिमस्य त्वा जरायुणाग्ने परि व्ययामसि. पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (५)
हे अग्नि! हम भ्रूण को लपेटने की तरह आप को हिम के आवरण से चारों
ओर से घेर लेते हैं. आप हमें पवित्र बनाने वाले हैं. आप हमारे प्रति कल्याणकारी
होइए. (५)
उप ज्मन्नुप वेतसे ऽ वतर नदीष्वा.
अग्ने पित्तमपामसि मण्डूकि ताभिरागहि सेमं नो यज्ञं पावकवर्ण १४ शिवं कृधि.. (६)
हे अग्नि! आप हमारे समीप पधारिए. हे अग्नि! आप बड़वाग्नि के साथ नदी
में बहते हैं. हे अग्नि! आप जल के पित्त हैं. मंडूकि को अग्नि का अनुसरण करना
चाहिए. आप पृथ्वी से बाहर निकलिए. जल में प्रवेश कीजिए. आप हमारे इस यज्ञ
को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (६)
अपामिदं न्ययन १४ समुद्रस्य निवेशनम्.
अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य १४ शिवो भव.. (७)
यह अग्नि जल के आश्रय समुद्र के घर में रहते हैं. आप हमारे शत्रुओं को
तपाइए. आप हमारे इस यज्ञ को पवित्र व कल्याणकारी बनाइए. (७)
अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान् वक्षि यक्षि च.. (८)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले और चमकने वाले हैं. आप देवों को जिह्वा
से बुलाइए. आप यज्ञ कराइए. (८)
स नः पावक दीदिवो ऽ ग्ने देवाँ २ इहा वह. उप यज्ञ १४ हविश्च नः.. (९)
हे अग्नि! आप पवित्र बनाने वाले हैं. स्वर्गलोक को दीप्तिमय बनाते हैं. आप
यहां देवों का आह्वान कीजिए. यज्ञ के समीप विराजने व उन के पास इस हवि को
पहुंचाने की कृपा कीजिए. (९)
पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन् रुरुच ऽ उषसो न भानुना.
तूर्वन् न यामन्नेतशस्य नू रण ऽ आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (१०)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाली ज्वालाओं से प्रदीप्त होते हैं. जैसे उषा काल
में किरणों से घिरा हुआ सूर्य शोभता है, वैसे ही आप ज्वालाओं से शोभते हैं. जैसे
वेगवान घोड़े पर बैठा हुआ सैनिक शोभा देता है, उसी प्रकार आप अपने वेग
(तेज) से शोभा पाते हैं. (१०)
२०८ - यजुर्वेद 632/13