यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
चौंतीसवां अध्याय
चौंतीसवां अध्याय
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति.
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (१)
मन जैसा दूर विचरता है वैसे जाग्रत अवस्था में ही सोते में भी दूर विचरता है.
मन दूरगामी, प्रकाशमान, प्रकाश का प्रवर्तक व अकेला प्रकाशमान है. हमारा मन
कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो. ( १ )
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः.
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (२)
मनीषीगण इसी मन से यज्ञ आदि कार्य संपन्न करते हैं. इसी मन से धीर लोग
श्रेष्ठ कार्य में लगते हैं. मन अपूर्व व यजमानों में आदरणीय है. हमारा वह मन
कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( २ )
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु.
यस्मान्न ऽ ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (३)
जो सभी प्राणियों में ज्ञानमय, चैतन्य, धैर्यमय व अमृतस्वरूप है, जिस के बिना
कोई कार्य नहीं किया जाता है, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो
जाए. ( ३ )
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्.
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (४)
जिस अमर मन से सब कुछ जाना जाता है, जिस से भूतकाल, वर्तमानकाल
और भविष्यकाल को ग्रहण किया जाता है, जिस से सात पुरोहित ( होता ) यज्ञ का
विस्तार करते हैं, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ४ )
यस्मिन्नृचः साम यजूं ४ षि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः.
यस्मिंश्चित्त ४ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (५)
जैसे रथ के पहिए में अरे होते हैं, वैसे ही जिस मन में ऋग्वेद, सामवेद और
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उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय
यजुर्वेद के मंत्र प्रतिष्ठित हैं, जिस मन में प्रजाओं के चित्त का ज्ञान ओतप्रोत है,
हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ५ )
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेभीशुभिर्वाजिन ऽ इव.
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. ( ६ )
अच्छा सारथी घोड़ों को नियंत्रण में रखता है. निर्धारित स्थान पर ले जाता है.
वैसे ही जो मनुष्यों को नियंत्रण में रखता है, उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाता है.
जो हृदय में प्रतिष्ठित है, जो अजर है, जो गतिमान है, हमारा वह मन कल्याणकारी
संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ६ )
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (७)
हम अपने पिता इंद्र देव की स्तुति करते हैं. वे महान् और बलवान हैं. उन्होंने
वृत्रासुर को मर्दित कर दिया. उन्होंने तीनों लोकों में अपनी शक्ति को प्रतिष्ठित
किया. ( ७ )
अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च नस्कृधि.
क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्र ण ऽ आयूं ष्षि ष तारिषः... ( ८ )
हे अनुमते! आप हमारी इच्छाओं का अनुमोदन व हमारा कल्याण करने की कृपा
कीजिए. आप हमारे यज्ञ व हमारी आयु की बढ़ोतरी कीजिए. आप हमें तारिए. ( ८ )
अनु नोद्यानुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्. अग्निश्च हव्यवाहनो भवतं दाशुषे मयः... (९)
हे अनुमते! आज आप हमारे यज्ञ को देवताओं में मान्यता प्राप्त कराइए. हवि
वहन करने वाले अग्नि हमारे प्रति दानशील होने की कृपा करें. ( ९ )
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामति स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिद्धि नः... (१०)
हे सिनीवाली देवी! आप देवताओं की बहन, बहुत केशों वाली व प्रजा का
पालन करने वाली हैं. हम ने हवि ग्रहण करने के लिए आप को आमंत्रित किया है.
आप हवि ग्रहण करने व हमें संतान प्रदान करने की कृपा करें. ( १० )
पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः.
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेभवत्सरित्.. (११)
पांच नदियां एक जैसी स्रोत वाली सहित सरस्वती नदी में मिल जाती हैं. वही
सरस्वती देश में पांच प्रकार से प्रसिद्ध हुई. ( ११ )
त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऽ ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा.
तव व्रते कवयो विद्मनापसोजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः... (१२)
यजुर्वेद – ३८५