यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
यजुर्वेद
डा. रेखा व्यास
एम. ए., पी-एच. डी.
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
© १९७९
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
संस्करण : २०१५
ISBN 81-7987-096-0
VP : 632.5H15
संस्कृत साहित्य प्रकाशन के लिए
विश्व विजय प्रा. लि.
एम-१२, कनाट सरकस, नई दिल्ली-११०००१
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प्राक्कथन
सामान्यतया द्वितीय वेद के रूप में प्रसिद्ध यजुर्वेद की रचना ऋग्वेदीय
ऋचाओं के मिश्रण से हुई मानी जाती है, क्योंकि ऋग्वेद के ६६३ मंत्र यथावत
यजुर्वेद में भी प्राप्त होते हैं. फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि दोनों एक ही
ग्रंथ हैं. ऋग्वेद के मंत्र पद्यात्मक हैं, जबकि यजुर्वेद के गद्यात्मक—'गद्यात्मको यजुः
'. साथ ही अनेक मंत्र ऋग्वेद से भिन्न भी हैं.
वस्तुतः यजुर्वेद एक पद्धति ग्रंथ है, जो पौरोहित्य प्रणाली में यज्ञ आदि कर्म
संपन्न कराने के लिए संकलित हुआ था. इसीलिए आज भी विभिन्न संस्कारों एवं
यज्ञीय कर्मों के अधिकांश मंत्र यजुर्वेद के ही होते हैं. यज्ञ आदि कर्मों से संबंधित
होने के कारण यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक जनप्रिय रहा है.
यूं तो यजुर्वेद की १०१ शाखाएं बताई जाती हैं, किंतु मुख्यतयाः दो शाखाएं
ही अधिक प्रसिद्ध हैं—कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. इन्हें क्रमशः तैत्तिरीय एवं
वाजसनेयी संहिताएं भी कहा जाता है. इन में से तैत्तिरीय संहिता अपेक्षाकृत अधिक
पुरानी मानी जाती है, वैसे दोनों में प्रायः एक ही सामग्री है. हां, उन के क्रम में कुछ
अंतर है. शुक्ल यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक क्रमबद्ध है. इस में कुछ ऐसे भी मंत्र हैं,
जो कृष्ण यजुर्वेद में नहीं हैं.
यजुर्वेद दो संहिताओं में कब और कैसे विभाजित हो गया—यह तो प्रामाणिक
रूप में उपलब्ध नहीं है, हां, इस संदर्भ में एक रोचक कथा अवश्य प्रचलित है—
कहा जाता है कि वेदव्यास के शिष्य वैशंपायन के २७ शिष्य थे. उन में से
सर्वाधिक मेधावी थे याज्ञवल्क्य. एक बार वैशंपायन ने किसी यज्ञ के लिए
अपने सभी शिष्यों को आमंत्रित किया. उन में से कुछ शिष्य यज्ञ कर्म में
पूर्णतया कुशल नहीं थे.
अतः याज्ञवल्क्य ने उन अकुशल शिष्यों का साथ देने से मना कर दिया. इस
से शिष्यों में आपसी विवाद उठ खड़ा हुआ. तब वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से
अपनी सिखाई हुई विद्या वापस मांगी. याज्ञवल्क्य ने भी आवेश में तुरंत यजुर्वेद
का वमन कर दिया. विद्या के कण कृष्ण वर्ण के रक्त से सने हुए थे.
यह देख कर दूसरे शिष्यों ने तीतर बन कर उन कणों को चुग लिया. इन शिष्यों
द्वारा विकसित होने वाली यजुर्वेद की शाखा तैत्तिरीय संहिता कहलाई.
इस घटना के बाद याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना की और उन से पुनः यजुर्वेद
प्राप्त किया. सूर्य ने वाज ( अश्व ) बन कर याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद की शिक्षा
दीक्षा दी थी, इसलिए यह शाखा वाजसनेयी कहलाई.
यह कहानी कितनी सच है और कितनी झूठ, यह बता पाना असंभव है. कुछ
विद्वान् इसे कपोलकल्पित कहते हैं और कुछ मिथ. कुछ भी हो, इतना निश्चित है
कि यजुर्वेद ज्ञान ( वेद ) की वह शाखा ( भाग ) है, जिस में यज्ञीय कर्मों का वर्चस्व
है, जिस के बल पर धर्म के धंधेबाजों ने सदियों से जनसामान्य को बेवकूफ बना
कर स्वार्थ साधे और आज भी यही हो रहा है.
आज जब देश में संस्कृत के ज्ञाताओं की संख्या नगण्य रह गई है, उन में भी
वैदिक संस्कृत जानने वाले तो और भी कम हैं, तब यह आवश्यक हो गया है कि
अन्य वेदों ( वैदिक ग्रंथों ) के साथसाथ यजुर्वेद का भी सरल हिंदी में अनुवाद
प्रस्तुत किया जाए, ताकि साधारण पाठक भी समझ सकें कि यज्ञ, सामाजिक
संस्कार आदि कर्मों की कथित महत्ता प्रतिपादित करने वाले इस वेद के मंत्रों का
वास्तविक अर्थ और अभिप्राय क्या है ?
चूंकि आरंभ से ही यजुर्वेद को यज्ञीय कर्मों से संबद्ध माना गया है, इसलिए
प्रायः सभी प्राचीन आचार्यों ने इस के मंत्रों के अर्थ यज्ञीय कर्मों के संदर्भ में ही
किए हैं. इन आचार्यों में उवट ( १०४० ई. ) और महीधर ( १५८८ ई. ) के भाष्य
प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने शुक्ल यजुर्वेद पर भाष्य लिखे थे. वे भाष्य
आज भी उपलब्ध और विभिन्न विद्वानों द्वारा स्वीकृत हैं. यहां तक कि आचार्य उवट
का भाष्य देख कर ही आचार्य सायण ने भी यजुर्वेद के भाष्य पर अपनी कलम
नहीं चलाई है.
अतः यजुर्वेद के प्रस्तुत अनुवाद में आचार्य उवट के अनुवाद को ही आधार
बनाया गया है. इस में प्रायः उन्हीं अर्थों को अपनाया गया है, जो उवट को अभीष्ट
थे. अनुवाद की भाषा सरल एवं सुबोध रखने का प्रयास किया गया है, ताकि
साधारण पाठक भी विषय को आसानी से समझ सकें.
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