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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 151 of 421

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Page 151

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
निर्ऋत देवी उन बंधनों को हटाती हैं जिन पाशों ने आप की गरदन को जकड़
रखा था, आप उन बंधनों से छूटिए. आप पोषक अन्न को ग्रहण कीजिए. आप हमें
धन दीजिए. देवी को हमारा नमन. ( ६५ )
निवेशनः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः.
देव ऽ इव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे पथीनाम्.. (६६)
हे अग्नि! आप वासदाता, धनदाता, रूपवान और अभीष्ट फलदाता हैं. आप
सविता देव जैसे प्रकाशवान हैं. सत्य रूपी धर्म वाले हैं. युद्ध में इंद्र देव की भांति
स्थिर रहने वाले हैं. ( ६६ )
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (६७)
आप कवि व धीर हैं. देवों के अच्छे मन के लिए आप हल को बैल के जोड़े
के साथ जोतते हैं. ( ६७ )
युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्.
गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय ऽ इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (६८)
हे किसानो! आप हल को जोड़िए. बैल के कंधों पर जुआ रखिए. आप खेत
को जोतिए. आप बीज बोइए. सृष्टि में अच्छी फसल के लिए स्तुति कीजिए. अन्न
भरभर कर तैयार हो. अन्न अच्छी तरह पके. ( ६८ )
शुन १४ सु फाला वि कृषन्तु भूमि १४ शुनं कीनाशा ऽ अभि यन्तु वाहैः.
शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ऽ ओषधीः कर्तनास्मे.. (६९)
भूमि को हल के फाल से अच्छी तरह जोतिए. किसान बैलों के साथ आराम
से जाएं. हे वायु! हे सूर्य! आप हवि से प्रसन्न होइए. आप पृथ्वी को जल से सींचिए.
आप ओषध उपजाइए. आप पृथ्वी को श्रेष्ठ फलों से पूरिए. ( ६९ )
घृतेन सीता मधुना समंज्यतां विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः.
ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान्त्सीते पयसाभ्याववृत्स्व.. (७०)
विश्व और मरुद्गण हल के फाल को अनुमति देने की कृपा करें. उसे शहद से
सींचने की कृपा करें. आप ऊर्जस्वी होइए. आप दूध से दिशाओं को और हमें घी व
दूध से सींचिए. ( ७० )
लाङ्गलं पवीरवत्सुशेव १४ सोमपित्सरु.
तदुद्वपति गामविं प्रफर्व्यं च पीवरीं प्रस्थावद्रथवाहनम्.. (७१)
हल फाल युक्त हैं. पृथ्वी को खोदते हैं. सोम के रक्षक और कल्याणकारी हैं.
कृषि उत्पादन के साथ ही भेड़, बकरी पुष्ट, गौएं रथ वहन करने वाले उत्तम घोड़े
प्रदान करते हैं. ( ७१ )
यजुर्वेद - १५१