यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध बारहवां अध्याय
आप के पंख हैं. आप शुभ गतिवान हैं. आप स्वर्गलोक में उड़िए. आप स्वेच्छा
से उड़ान भरिए. ( ४ )
विष्णोः क्रमोसि सपत्नहा गायत्रं छन्द ऽ आरोह पृथिवीमनु विक्रमस्व विष्णोः
क्रमोस्यभिमातिहा त्रैष्टुभं छन्द ऽ आरोहान्तरिक्षमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोस्यरातीयतो
हन्ता जागतं छन्द ऽ आरोह दिवमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमोसि शत्रूयतो हन्तानुष्टुभं
छन्द ऽ आरोह दिशोनु विक्रमस्व.. (५)
हे अग्नि! आप विष्णु के पदव्यास व शत्रुनाशी हैं. आप गायत्री छंद पर आरूढ़
होने व पृथ्वी का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु देव का क्रम न्यास
व शत्रु का अभिमान नष्ट करने वाले हैं. आप त्रिष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने तथा
अंतरिक्ष का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास और न
करने योग्य आचरण करने वाले के नाशक हैं. आप जगती छंद पर आरूढ़ होने और
स्वर्गलोक का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदव्यास तथा
शत्रुनाशक हैं. आप अनुष्टुप् छंद पर आरूढ़ होने और सारी दिशाओं का अनुकरण
करने की कृपा कीजिए. ( ५ )
अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन्.
सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः.. (६)
अग्नि बादल के समान गरजते हैं. स्वर्गलोक से वह पृथ्वी पर व्याप्त होते हैं. वे
लताओं को घेर लेते हैं व शीघ्र जलते हैं. वे समिधावान और सब को प्रकाशित
करते हैं. वे अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं. ( ६ )
अग्नेभ्यावर्त्तिन्नभि मा निवर्त्तस्वायुषा वर्चसा प्रजया धनेन.
सन्या मेधया रय्या पोषेण.. (७)
हे अग्नि! आप हमारे सम्मुख पधारते हैं. आप आयु, वर्चस्व, संतान व धन
के साथ हमारे पास पधारिए. आप बुद्धि, ऐश्वर्य व पोषण के साथ हमारे पास
पधारिए. ( ७ )
अग्ने अङ्गिरः शतं ते सन्त्वावृतः सहस्रं त ऽ उपावृतः.
अधा पोषस्य पोषेण पुनर्नो नष्टमाकृधि पुनर्नो रयिमाकृधि.. (८)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंग वाले हैं. हम आप की सैकड़ों, हजारों परिक्रमाएं
करते हैं. आप हमें पोषकता देने वाला पोषण व नष्ट हुआ पशुधन और धन प्राप्त
कराने की कृपा कीजिए. ( ८ )
पुनरूर्जा निवर्त्तस्व पुनरग्न ऽ इषायुषा पुनर्नः पाह्य १७ हसः... (९)
हे अग्नि! आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप हमें बारबार संपन्न व आयु संपन्न
यजुर्वेद - १४१