यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
इक्कीसवां अध्याय
उत्तरार्ध
इक्कीसवां अध्याय
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय. त्वामवस्युरा चके.. (१)
हे वरुण देव! हमारी प्रार्थना सुनने की कृपा करें. आज जो हम हवन कर
रहे हैं, उस से हमें सुख प्रदान करें. हम अपनी रक्षा के लिए आप का आह्वान
करते हैं. ( १ )
तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः.
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश १४ स मा न ऽ आयुः प्र मोषीः.. ( २)
ये यजमान ब्रह्मज्ञानमय ऋचाओं से आप की वंदना कर रहे हैं. आहुतियां अर्पित
कर रहे हैं. उन से आप यजमान पर प्रसन्न होइए. वरुण देव बहुप्रशंसित व देव पूजित
हैं. आप जाग्रत होइए और हमारी आयु क्षीण मत कीजिए. ( २ )
त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः.
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषा १४ सि प्र मुमुग्ध्यस्मत्.. (३)
हे अग्नि! आप विद्वान् हैं. आप आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने वाले हैं.
आप यज्ञ में पूजित, बहुत दीप्तिमान व पवित्र हैं. आप वरुण देव को हम पर प्रसन्न
कराइए. हमारे सभी द्वेषियों को नष्ट करने की कृपा कीजिए. ( ३ )
स त्वं नो अग्नेवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ.
अव यक्ष्व नो वरुण १४ रराणो वीहि मृडीक १४ सुहवो न ऽ एधि.. (४)
हे अग्नि! प्रातः अपने रक्षा साधनों सहित हमारे पास पधारिए. हमारी रक्षा करने
व आहुतियों को देवताओं तक पहुंचाने की कृपा कीजिए. आप उन्हें तृप्ति दीजिए.
आप अच्छी तरह बुलाने योग्य हैं. आप इस सुखदायक आहुति को स्वीकारने की
कृपा कीजिए. ( ४ )
महीम् षु मातर १४ सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हुवेम.
तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं १४ सुशर्माणमदिति १४ सुप्रणीतिम्.. (५)
२७० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
अदिति देवी महामहिमाशालिनी, माता, सुव्रतों वाली, अमर, कभी वृद्ध नहीं
होने वाली हैं, सुखदायिनी व नीतिज्ञा हैं. हम अपनी रक्षा हेतु उन का आह्वान करते
हैं. ( ५ )
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहस ᳪ सुशर्माणमदिति ᳪ सुप्रणीतिम्.
दैवीं नाव ᳪ स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. ( ६ )
अदितिमाता भलीभांति रक्षा करने वाली, पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक तक
विस्तार वाली, अत्यंत सुखदायिनी, अच्छा आसरा ( आश्रय ) देने वाली, दोषरहित,
मृत्यु का भय दूर करने वाली हैं. अपनेआप चलने वाली, बिना छेदों वाली इस नौका
में आप की कृपा से हम आरोहण करें. हम अपने कल्याण के लिए उस पर चढ़ते
हैं. ( ६ )
सुनावमा रुहेयमस्त्रवन्तीमनागसम्. शतारित्रा ᳪ स्वस्तये.. (७)
यह नाव दोष रहित, बिना छेदों वाली, अपनेआप चलने वाली व सैकड़ों
शत्रुओं से त्राण करने वाली है. हम अपने कल्याण के लिए इस पर आरूढ़ ( चढ़ने )
होने की कृपा करें. ( ७ )
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजा ᳪ सि सुक्रतू.. (८)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे यहां गाय के घी से सींचिए. आप हमारे खेतों
को मधुर अमृत से सींचिए. ( ८ )
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न ऽ आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ मा जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (९)
हे मित्र व वरुण देव! आप दोनों देव हमारी प्रार्थना सुनिए. आप अपनी भुजाएं
फैला कर हमें आशीर्वाद व इस जीवन में यश दीजिए. आप हमारे यज्ञ को गाय के
घी से व खेत को मधु अमृत से सींचिए. ( ९ )
शन्नो भवन्तु वाजिनो हवेषु देवताता मितद्रवः स्वर्काः.
जम्भयन्तो ऽ हिं वृक ᳪ रक्षा ᳪ सि सनेम्यस्मद्युयवन्नमीवाः... (१०)
हे मित्र व वरुण देव! आप हमारे लिए सुखदायी होइए. हम आप के लिए
अन्नमय हवि देते हैं. आप हमारे रोग दूर कीजिए. आप हमारे शत्रुओं व राक्षसों का
विनाश कीजिए. आप भेड़िए और ऐसे ही हिंसक जीवों को हम से दूर भगाइए. ( १० )
वाजे वाजेवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा ऽ अमृता ऽ ऋतज्ञाः.
अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः... (११)
हे मित्र व वरुण देव! आप ब्राह्मण, अमर व सत्यज्ञ हैं. युद्ध में अन्न, बल तथा
यजुर्वेद - २७१