Skip to content
SarvaKosh
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 149 of 421

Read in context
Page 149

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
चिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.
परिचिदसि तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५३)
हे अग्नि! अब आप की स्थापना कर दी गई है. अब आप अंगअंग में रमने की
कृपा कीजिए. आप चित्त हैं. अब आप विराजिए. आप को चारों ओर स्थापित कर
दिया गया है. आप चित्त से स्थापित होने की कृपा कीजिए. ( ५३ )
लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्.
इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन् योनावसीषदन्.. (५४)
हे अग्नि! लोक को पूरने से जो जगह रह गई आप उन छेदों को भरने की कृपा
कीजिए. आप वहां स्थिर हो कर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव
अग्नि और बृहस्पति देव ने यहां स्थापित किया है. ( ५४ )
ता ऽ अस्य सूददोहसः सोम १७ श्रीणन्ति पृश्नयः.
जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वा रोचने दिवः.. (५५)
स्वर्गलोक से जो जल मिलता है, उस से सोम शोभा पाते हैं. देवों के जन्मजन्म
और प्रत्येक यज्ञ में यह सोम इस स्वर्गिक जल से परिपक्व होता है. ( ५५ )
इन्द्रं विश्वा ऽ अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः.
रथीतम १७ रथीनां वाजाना १७ सत्पतिं पतिम्.. (५६)
सभी वाणियां समुद्र के समान विस्तृत हैं. वे वाणियां रथियों में महारथी इंद्र
देव की महिमा का गुणगान करती हैं. इंद्र देव बलवानों में सर्वाधिक बलशाली हैं.
इंद्र देव पालकों में श्रेष्ठ पालक हैं. ( ५६ )
समित १७ सङ्कल्पेथा १७ संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ.
इषमूर्जमभि संवसानौ.. (५७)
हे इंद्र देव! हम समान मति वाले हों. हम सब आपस में प्रिय हों. हम सब
प्रकाशवान हों. हम सब एक साथ प्रेरित हों. हम सब समान ऊर्जस्वी हों. हमारे यज्ञ
का सफलतापूर्वक समापन हो. ( ५७ )
सं वां मना १७ सि सं व्रता समु चित्तान्याकरम्.
अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वं न ऽ इषमूर्जं यजमानाय धेहि.. (५८)
हे अग्नि! हमारे मन समान हों. हमारे संकल्प समान हों. हे अग्नि! आप पुरियों
के स्वामी हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाइए. आप यजमान के लिए ऊर्जा धारिए. ( ५८ )
अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिमाँ २ असि.
शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः स्वं योनिमिहासदः.. (५९)
यजुर्वेद - १४९