यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधीरिरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे.
सनेयमश्वं गां वास ऽ आत्मानं तव पूरुष.. (७८)
ओषधियां मातापिता के समान और दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम उन के गुणों
के बारे में कहते रहते हैं. हे यज्ञ पुरुष! आप से प्राप्त घोड़े, गाय और आत्मिक सुखों
का उपभोग करें. ( ७८ )
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता.
गोभाज ऽ इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्.. (७९)
ओषधियों का निवास पीपल और पत्तों में है. आप गो भाजन बनिए. आप
आकाश का सेवन कीजिए. आप वर्षा करिए. आप यजमान को अन्नधन संपन्न
बनाइए. ( ७९ )
यत्रौषधी: समग्मत राजान: समिताविव.
विप्र: स ऽ उच्यते भिषग्रक्षोहामीवचातन:... (८०)
जैसे राजा राक्षसों पर विजय पाने के लिए युद्ध में जाते हैं, वैसे ही ओषधियां
रोगी और रोग के पास जाती हैं. रोगनाशक होने के ही कारण उन्हें वैद्य और विप्र
कहा जाता है. ( ८० )
अश्वावती ४ सोमावतीमूर्जयन्तीमुदोजसम्.
आवित्सि सर्वा ऽ ओषधीरस्मा ऽ अरिष्टतातये.. (८१)
अनिष्ट का निवारण करने के लिए अश्ववती और सोमवती ऊर्जा से हम
परिचित हैं. यह ऊर्जा ओजस्विता की पोषक है. ( ८१ )
उच्छुष्मा ऽ ओषधीनां गावो गोष्ठादिवेरते.
धन ४ सनिष्यन्तीनामात्मानं तव पूरुष.. (८२)
जैसे गोशाला से गाएं जंगल में जाती हैं, वैसे ही यज्ञ का धुआं वायुमंडल में
जाता है. अग्नि के शरीर से निकलती हुई लपट से उन की शक्ति और सामर्थ्य प्रकट
होती है. ( ८२ )
इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूय ४ स्थ निष्कृती:.
सीरा: पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ.. (८३)
आप रोग निवारक हैं. आप माता जैसी हैं. आप विकारनाशक हैं. आप अन्न
की भांति मनुष्य को शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ८३ )
अति विश्वा: परिष्ठा स्तेन ऽ इव व्रजमक्रमू:.
ओषधी: प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो रप:... (८४)
यजुर्वेद - १५३