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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

About this granth

The Yajurveda (यजुर्वेद) is the second of the four Vedas and the Veda of sacrificial ritual. Its formulas are largely in prose, and it was compiled as a manual for priests conducting the sacrifices; most mantras used in household rites and fire rituals today still come from it.

This edition by Dr. Rekha Vyas gives the mantras with a simple Hindi rendering of their sense. It was published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi (copyright 1979); the scanned copy is the 2015 edition. In her foreword the author notes that 663 mantras of the Rigveda reappear unchanged in the Yajurveda, yet the two differ, since the Rigveda is in verse and the Yajurveda in prose. She also mentions the tradition of 101 branches of the Yajurveda, of which two are the most widely followed.

The translation runs chapter by chapter after a table of contents, offering readers the plain meaning of the mantras without a dense commentary.

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पूर्वार्ध नौवां अध्याय
वाले विश्वे देव सहित देवों के लिए स्वाहा. उत्तर दिशा का नेतृत्व करने वाले
मित्रावरुण देव और मरुद्गण के लिए स्वाहा. ऊपर और स्वर्गलोक का नेतृत्व करने
वाले सोम सहित अन्य देवों के लिए स्वाहा. ( ३६ )
अग्ने सहस्व पृतना ऽ अभिमातीरपास्य.
दुष्टरस्तरन्नरातीयर्चोधा यज्ञवाहसि.. ( ३७)
हे अग्नि! आप शत्रुओं को हराइए. आप शत्रुओं का नाश कीजिए. हे अग्नि!
आप को जीतना दुर्लभ है. हे अग्नि! आप मंत्रपूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान को
अन्न दीजिए. तेजस्वी बनाइए. ( ३७ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
उपा २४ शोर्वीर्येण जुहोमि हत २४ रक्षः स्वाहा रक्षासं त्वा वधायावधिष्म
रक्षोवधिष्मामुमसौ हतः... ( ३८)
हे सविता देव! आप संसार को उपजाने वाले हैं. हम अश्विनीकुमारों की भुजाओं
और पूषा देवता के हाथों से आप को हवि चढ़ाते हैं. आप ने शूरवीरता से शत्रुओं को
खदेड़ा, मारा. जैसे यह राक्षस मारा गया वैसे ही शत्रु भी मारे जाएं. ( ३८ )
सविता त्वा सवाना २४ सुवतामग्निर्गृहपतीना २४ सोमो वनस्पतीनाम्.
बृहस्पतिर्वाच ऽ इन्द्रो ज्यैष्ठ्याय रुद्रः पशुभ्यो मित्रः सत्यो वरुणो धर्मपतीनाम्.. ( ३९)
हे सविता देव! आप यजमानों को यज्ञ के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए.
हे अग्नि! आप गृहपतियों को ( यज्ञ के लिए ) प्रेरित करने की कृपा कीजिए. सोम
यजमानों को वनस्पति प्रदान करने की कृपा करें. बृहस्पति देव हमें वाणी प्रदान
करने की कृपा करें. इंद्र देव हमें ज्येष्ठता ( बड़ाई ) प्रदान करें. रुद्र देव हमें पशु
प्रदान करने की कृपा करें. मित्र देव हमें सत्यवादी बनाने की कृपा करें. वरुण देव
हमें धर्म पालक बनाने की कृपा करें. ( ३९ )
इमं देवा ऽ असपत्न २४ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते
जानराज्यायैन्द्रस्येन्द्रियाय.
इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश ऽ एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना २४
राजा.. (४०)
हे यजमानो! सोम राजा हैं. सोम हम ब्राह्मणों के राजा हैं. सोम अमुक पुत्र
अमुक के पुत्र पर अपनी कृपा बनाए रखें. ये देवगण महान् क्षत्रिय जैसा बल पाने
के लिए प्रेरित करें. महान् राज्य व महान जन राज्य के लिए प्रेरित करने की कृपा
करें. हमें इंद्र देव जैसा समृद्धिशाली बनाने की कृपा करें. ( ४० )
यजुर्वेद - ११५

दसवां अध्याय

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दसवां अध्याय
अपो देवा मधुमतीरगृह्णन्नूर्जस्वती राजस्वश्चितानाः.
याभिर्मित्रावरुणावभ्यषिञ्चन्याभिरिन्द्रमनयन्नत्यरातीः.. (१)
देवताओं ने मधुर, ऊर्जस्वी, राजोचित व चेतना जगाने वाला जल ग्रहण किया.
जिन जलों से मित्र, वरुण आदि देवताओं का अभिषेक किया तथा अन्य देवताओं
ने जिन जलों से इंद्र देव का अभिषेक किया, हम यजमान उन जलों को ग्रहण करते
हैं. ये जल शत्रुनाशक हैं. (१)
वृष्ण ऽ ऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहा वृष्ण ऽ ऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि
वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहा वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि.. (२)
जलधाराएं लहरदार, बलवती, राष्ट्रदायिनी हैं. वे मुझे राष्ट्र प्रदान करें. इन के
लिए स्वाहा. वे विशाल सेना वाली हैं. इन के लिए स्वाहा. वे राष्ट्रदायिनी हैं. इन के
लिए स्वाहा. वे मुझे राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. वे विशाल सेना वाली हैं.
इन के लिए स्वाहा. वे विशाल राष्ट्रदायिनी हैं. इन के लिए स्वाहा. हमें राष्ट्र प्रदान
करने की कृपा करें. (२)
अर्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहार्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तौजस्वती स्थ
राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापः परिवाहिणी स्थ
राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापां पतिरसि
राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहापां पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देह्यपां गर्भोसि राष्ट्रदा राष्ट्रं
मे देहि स्वाहापां गर्भोसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि.. (३)
ये जल अर्थदायी हैं. हमें अर्थ प्रदान करने की कृपा करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं.
हमें राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल ऊर्जादायी हैं. हमें
ऊर्जा प्रदान करने की कृपा करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करने की
कृपा करें. ये जल पराक्रमदायी हैं. हमें पराक्रम प्रदान करें. ये जल राष्ट्रदायी हैं. हमें
राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल पराक्रमदायी हैं. हमें पराक्रम प्रदान
करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल सब जलों के पालकपोषक हैं तथा उन्हें अपने
अधीन रखने में सक्षम हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करें. इन के लिए स्वाहा. ये जल सब जलों
११६ - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
को गर्भ में रखते हैं. अपने शासन में रखने में सक्षम हैं. हमें राष्ट्र प्रदान करें. इन के
लिए स्वाहा. ( ३ )
सूर्यत्वचस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा सूर्यत्वचस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त
सूर्यवर्चस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा सूर्यवर्चस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त मान्दा
स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा मान्दा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त व्रजक्षित स्थ राष्ट्रदा
राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा व्रजक्षित स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त वाशा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे
दत्त स्वाहा वाशा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त शविष्ठा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा
शविष्ठा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त शक्वरी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा शक्वरी
स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त जनभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा जनभृत स्थ राष्ट्रदा
राष्ट्रममुष्मै दत्त विश्वभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा विश्वभृत स्थ राष्ट्रदा
राष्ट्रममुष्मै दत्तापः स्वराज स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त.
मधुमतीर्मधुमतीभिः पृच्यन्तां महि क्षत्रं क्षत्रियाय वन्वाना ऽ अनाधृष्टाः सीदत सहौजसो
महि क्षत्रं क्षत्रियाय दधतीः.. (४)
हे जल! आप सूर्य की त्वचा में स्थित हैं. आप राष्ट्रदायी हैं. आप हमें राष्ट्र
प्रदान करें आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप आनंददायी हैं. आप हमें आनंद प्रदान
करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप राष्ट्रदायी हैं. आप राष्ट्र
प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप पशुपालक हैं. आप
पशु प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप बलदायी हैं.
आप बल प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप राष्ट्रदायी
हैं. आप राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल! आप
क्षमतादायी हैं. आप क्षमता प्रदान करने की कृपा करें. आप के लिए स्वाहा. हे जल!
आप राष्ट्रदायी हैं. आप राष्ट्र प्रदान करने की कृपा करें. आप जनता का
भरणपोषण करने वाले हैं. आप राष्ट्र प्रदान करें. आप के लिए स्वाहा. आप विश्व
का भरणपोषण करने वाले हैं. आप राष्ट्र प्रदान करें. आप के लिए स्वाहा. आप हमें
मधुरमधुर जलधाराओं में सींचने की कृपा करें. आप हमें क्षत्रियोचित बल प्रदान
करने की कृपा करें. आप हमें साहस व बल प्रदान करने की कृपा करें. क्षत्रियोचित
सामर्थ्य धारण करने की कृपा करें. यहां प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. ( ४ )
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात्.
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा बृहस्पतये
स्वाहेन्द्राय स्वाहा घोषाय स्वाहा श्लोकाय स्वाहा ध्वं शाय स्वाहा भगाय स्वाहार्यम्णे
स्वाहा.. (५)
जिस प्रकार सोम आदि देवता ऐश्वर्यवान हैं, हम भी वैसे ही ऐश्वर्यवान हो
जाएं. अग्नि के लिए स्वाहा. सोम देव के लिए स्वाहा. सविता देव के लिए स्वाहा.
यजुर्वेद - ११७

पूर्वार्ध दसवां अध्याय

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
सरस्वती देवी के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. बृहस्पति देव के लिए स्वाहा.
इंद्र देव के लिए स्वाहा. घोष के लिए स्वाहा. श्लोक के लिए स्वाहा. घोष के लिए
स्वाहा. ऐश्वर्य देव के लिए स्वाहा. सौभाग्य देवी के लिए स्वाहा. अर्यमा देव के
लिए स्वाहा. सौभाग्य देव के लिए स्वाहा. ( ५ )
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः.
अनिभृष्टमसि वाचो बन्धुस्तपोजाः सोमस्य दात्रमसि स्वाहा राजस्वः.. ( ६ )
आप पवित्रता में स्थित हैं. आप को विष्णु के लिए पवित्र किया जाता है. आप
सविता देव से उत्पन्न होते हैं. पवित्र सूर्य की रश्मियों से छन कर जल आकाश में
जाता है. आप को सूर्य पवित्र करने की कृपा करें. वाणी को पवित्र करने की कृपा
करें. आप तपशक्ति प्रदाता हैं. आप सोम को राजोचित पात्रता प्रदान कर सकते हैं.
आप के लिए स्वाहा. ( ६ )
सधमादो द्युम्निनीराप ऽ एता ऽ अनाधृष्टा ऽ अपस्यो वसानाः.
पस्त्यासु चक्रे वरुणः सधस्थमपा ६४ शिशुर्मातृतमास्वन्तः.. ( ७ )
ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये जल आनंददायी हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये
तेजस्विता प्रदान करने वाले हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये उत्तम वास प्रदान करने
वाले हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये धारक हैं. ये स्वर्गलोक के जल हैं. ये माता की
तरह पोषक हैं. हम यजमान सादर इन जलों को स्थापित करते हैं. ( ७ )
क्षत्रस्योल्बमसि क्षत्रस्य जरायु्वसि क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसीन्द्रस्य
वार्त्रघ्नमसि मित्रस्यासि वरुणस्यासि त्वयायं वृत्रं वधेत्.
दृवासि रुजासि क्षुमासि पातैर्नं प्राञ्चं पातैर्नं प्रत्यञ्चं पातैर्नं तिर्यञ्चं दिग्भ्यः पात.. ( ८ )
हे जल! आप क्षत्रियों के गर्भपोषक हैं. आप क्षत्रियों की गर्भ रक्षक झिल्ली हैं.
आप इंद्र देव की नाभि हैं. आप वृत्रासुर के नाशक हैं. आप मित्र देव की तरह शत्रुओं
का वध करते हैं. आप वरुण देव की तरह शत्रुओं का वध करते हैं. आप शत्रुओं
को विदीर्ण देते हैं. आप शत्रुओं को पीड़ा देते हैं. आप शत्रुओं को डरा देते हैं. आप
पूर्व दिशा से रक्षा करने की कृपा करें. आप पश्चिम दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा
करने की कृपा करें. आप उत्तर दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा करने की कृपा करें.
आप दक्षिण दिशा से ( इस यज्ञ की ) रक्षा करने की कृपा करें. ( ८ )
आविर्मर्या आवित्तो अग्निर्गृहपतिरावित्त ऽ इन्द्रो वृद्धश्रवा ऽ आवित्तौ मित्रावरुणौ
धृतव्रतावावित्तः पूषा विश्ववेदा ऽ आविन्ते द्यावापृथिवी
विश्वशम्भुवावावित्तादितिरुरुशर्मा.. ( ९ )
सभी आर्य लोग ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. गृहपति
अग्नि ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. यशस्वी इंद्र देव ( इस यज्ञ
११८ - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. ऐश्वर्यवान मित्र देव और वरुण देव ( इस
यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. व्रतधारी पूषा देव ( इस यज्ञ स्थल
की ) रक्षा करने की कृपा करें. समस्त देव ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की
कृपा करें. स्वर्गलोक ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें. पृथ्वी देवी
विश्व का शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की कृपा करें.
सुखदायी अदिति माता शुभ करने वाली है. ( इस यज्ञ स्थल की ) रक्षा करने की
कृपा करें. ( ९ )
अवेष्टा दन्दशूकाः प्राचीमारोह गायत्री त्वावतु रथन्तर १७ साम त्रिवृत्स्तोमो वसन्त ऽ
ऋतुर्ब्रह्म द्रविणम्.. (१०)
यज्ञ को हानि पहुंचाने वाले जीवजंतु नष्ट हो गए. आप पूर्व दिशा में आरोहण
करने की कृपा कीजिए. गायत्री, रथंतर सोम व वसंत ऋतु आप की रक्षा करने की
कृपा करें. ब्रह्म धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १० )
दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वावतु बृहत्साम पञ्चदश स्तोमो ग्रीष्म ऽ ऋतुः क्षत्रं द्रविणम्.. (११)
आप दक्षिण दिशा में आरोहण करने की कृपा करें. त्रिष्टुप् रूपी धन आप की
रक्षा करने की कृपा करें. बृहत्साम रूपी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें.
पंचदश स्तोम धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ग्रीष्म ऋतु रूपी व पौरुष रूपी
धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( ११ )
प्रतीचीमारोह जगती त्वावतु वैरूप १७ साम सप्तदश स्तोमो वर्षा ऋतुर्विड्
द्रविणम्.. (१२)
आप पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. जगती रूपी धन आप की
रक्षा करें. वैरूप सामरूपी, दश स्तोम रूपी व वर्षा ऋतु रूपी धन आप की रक्षा
करें. ( १२ )
उदीचीमारोहानुष्टुप् त्वावतु वैराज १७ सामैकवि १७ श स्तोमः शरदृतुः फलं द्रविणम्.. (१३)
आप उत्तर दिशा की ओर बढ़ने की कृपा करें. अनुष्टुप् रूपी फलदायी धन
आप की रक्षा करने की कृपा करें. वैराज साम रूपी फलदायी धन आप की रक्षा
करने की कृपा करें. एकविंश स्तोम फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा
करें. शरद ऋतु रूपी फलदायी धन आप की रक्षा करने की कृपा करें. ( १३ )
ऊर्ध्वामारोह पङ्क्तिस्त्वावतु शाक्वररैवते सामनी त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ स्तोमौ
हेमन्तशिशिरावृतू वर्चो द्रविणं प्रत्यस्तं नमुचेः शिरः.. (१४)
आप ऊपर की ओर बढ़ने की कृपा करें. पंक्ति रूपी धन आप की रक्षा करें.
शाक्वर रूपी धन आप की रक्षा करें. रैवत साम रूपी धन आप की रक्षा करें.
यजुर्वेद - १११

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
त्रिणव, त्रयस्त्रिंश, स्तोम रूपी, हेमंत व शिशिर ऋतु रूपी धन आप की रक्षा करें.
अनाचारियों को समूल नष्ट करने की कृपा करें. (१४)
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात्. मृत्योः पाह्योजोसि सहोस्यमृतमसि.. (१५)
आप सोम के प्रकाशक व बलशाली हैं. हमारा ऐश्वर्य भी आप के ऐश्वर्य जैसा
हो जाए. आप मृत्यु से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. हम आप के ही समान अमर
हो जाएं. (१५)
हिरण्यरूपा ऽ उषसो विरोक ऽ उभाविन्द्रा ऽ उदिथः सूर्यश्च.
आरोहतं वरुण मित्र गर्तं ततश्चक्षाथामदितिं दितिं च मित्रोसि वरुणोसि.. (१६)
हे मित्र देव! आप सोने जैसे रूप वाले हैं. हे वरुण! आप सोने जैसे रूप वाले
हैं. हे मित्र देव! आप उषाओं को प्रकाशित करने वाले हैं. हे वरुण! आप उषाओं
को प्रकाशित करने वाले हैं. आप दोनों सूर्य व चंद्र देव की तरह उदित होते हैं.
हे मित्र देव!, हे वरुण देव! आप रथ पर चढ़ने की कृपा कीजिए. आप दोनों
अदिति, दिति, मित्र व वरुण स्वरूप हैं. (१६)
सोमस्य त्वा द्युम्नेनाभिषिञ्चाम्यग्नेर्भ्राजसा सूर्यस्य वर्चसेन्द्रस्येन्द्रियेण.
क्षत्राणां क्षत्रपतिरेध्यति दिद्यून् पाहि.. (१७)
हे यजमान! हम आप का सोम से अभिषेक करते हैं. हे यजमान! हम आप का
अग्नि के तेज से अभिषेक करते हैं. हे यजमान! हम आप का सूर्य के वर्चस्व से
अभिषेक करते हैं. हम आप का इंद्र देव के बल से अभिषेक करते हैं. आप क्षत्रियों
में क्षत्रपति बनें. आप प्रजा के रक्षक बनें. (१७)
इमं देवा ऽ असपत्न ५७ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते
जानराज्यायैन्द्रस्येन्द्रियाय.
इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश ऽ एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना
५७ राजा.. (१८)
हे देवगण! शत्रुनाश, श्रेष्ठ कार्य, महान् क्षत्रिय बल, महान् बड़प्पन व महान्
जनराज्य हेतु हमें शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. हे देवगण! महान् इंद्र देव जैसी
क्षमता हेतु हमें शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. हे देवगण! अमुक पिता के पुत्र व
अमुक माता के पुत्र को शक्ति प्रदान करने की कृपा करें. प्रजा पालन हेतु हमें शक्ति
प्रदान करने की कृपा करें. ये सोम हम ब्राह्मणों के राजा हैं. (१८)
प्र पर्वतस्य वृषभस्य पृष्ठान्नावश्चरन्ति स्वसिच ऽ इयानाः.
ता ऽ आववृत्रन्नधरागुदक्ता ऽ अहिं बुध्य्मनु रीयमाणाः.
विष्णोर्विक्रमणमसि विष्णोर्विक्रान्तमसि विष्णोः क्रान्तमसि.. (१९)
१२० - यजुर्वेद

अभिषेक के समय बलवान सोम की धाराएं पर्वत की पीठ से बहने वाली

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
अभिषेक के समय बलवान सोम की धाराएं पर्वत की पीठ से बहने वाली
जलधाराओं की तरह बहती हैं. जैसे जलधारा पर्वत को ढक कर के बहती है, वैसे
ही सोम की धाराएं धन वैभव के पर्वत को ढक कर के बहती हैं. वैसे ही पृथ्वी
विष्णु के प्रथम चरण में जीती गई. अंतरिक्ष विष्णु के द्वितीय चरण में जीता गया.
स्वर्गलोक विष्णु के तृतीय चरण में जीता गया. ( १९ )
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्त्वयममुष्य पितासावस्य पिता वय ᳪ स्याम पतयो रयीणा
ᳪ स्वाहा.
रुद्र यत्ते क्रिवि परं नाम तस्मिन्हुतमस्यमेष्टमसि स्वाहा.. (२०)
हे प्रजापति! इस विश्व में आप के अलावा हमारा अन्य कोई नहीं हैं. आप
ही विश्वरूप हैं. हम जिस कामना से यज्ञ करते हैं, आप हमारी उन कामनाओं
को परिपूर्ण करने की कृपा कीजिए. यह अमुक का पिता है, हम अमुक के पिता
हैं. हम धनों के स्वामी हो जाएं. आप के लिए स्वाहा. रुद्र देव के भीषण व
कल्याणकारी रूप के लिए स्वाहा. ( २० )
इन्द्रस्य वज्रोसि मित्रावरुणयोस्त्वा प्रशास्त्रोः प्रशिषा युनज्मि.
अव्यथायै त्वा स्वधायै त्वारिष्टो अर्जुनो मरुतां प्रसवेन जयापाम मनसा
समिन्द्रियेण.. (२१)
आप इंद्र देव के वज्र हैं. मित्र और वरुण देव आप के अस्त्रशस्त्र हैं. हम आप
को ( शत्रुनाश हेतु ) नियुक्त करते हैं. आप के लिए स्वाहा. शत्रुनाशक हेतु
स्वाहा. अर्जुन हेतु स्वाहा. मरुतों के लिए स्वाहा. हम मन व इंद्रियों से आप के
साथ हैं. ( २१ )
मा त ऽ इन्द्र ते वयं तुराषाडयुक्तसो अब्रह्मता विदसाम.
तिष्ठा रथमधि यं वज्रहस्ता रश्मीन् देव यमसे स्वश्वान्.. (२२)
हे इंद्र देव! हम सब आप की कृपा से ज्ञानी हो जाएं. हम सब आप की कृपा
से ब्रह्मज्ञानी हो जाएं. हम सब आप की कृपा से ज्ञाता हो जाएं. जैसे रथ में बैठ कर
प्रशिक्षित घोड़ों की लगाम थाम ली जाती है, वैसे ही वज्र हाथ वाले आप यमराज
से हमारे प्राण के घोड़ों की लगाम थामिए. ( २२ )
अग्नये गृहपतये स्वाहा सोमाय वनस्पतये स्वाहा मरुतामोजसे स्वाहेन्द्रस्येन्द्रियाय स्वाहा.
पृथिवि मातर्मा मा हि ᳪ सीर्मो अहं त्वाम्.. (२३)
गृहपति अग्नि के लिए स्वाहा. वनस्पति सोम के लिए स्वाहा. ओजस्वी मरुद्
देव के लिए स्वाहा. इंद्रिय सामर्थ्यदाता इंद्र देव के लिए स्वाहा. हे पृथ्वी माता! हम
आप के प्रति हिंसा न करें. हे पृथ्वी माता! आप हमारे प्रति हिंसा न करें. ( २३ )
यजुर्वेद - १२१

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
ह १७ सः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसद्दतसद्वयोम सदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (२४)
हे परमात्मा! आप पवित्र हैं, अंतरिक्ष के होता व यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित हैं. आप
अतिथि जैसे आदरणीय व नेतृत्व में अग्रणी, ऋत में प्रतिष्ठित, जलोत्पादक हैं. आप
विशाल सत्य बल संपन्न हैं. ( २४ )
इयदस्यायुरस्यायुर्मयि धेहि युङ्ङसि वर्चोसि वर्चो मयि धेह्यूर्गस्यूर्जं मयि धेहि.
इन्द्रस्य वां वीर्यकृतो बाहू अभ्युपावहरामि.. (२५)
हे परमात्मा! आप की जितनी आयु है, आप इतनी ही आयु हमें दीजिए. आप
जितने वर्चस्वी हैं, आप उतना ही वर्चस्व हमें दीजिए. आप जितने ऊर्जस्वी हैं, आप
उतनी ही ऊर्जा हमें दीजिए. आप इंद्र देव की पराक्रमी बाहु जैसे हैं. हम यज्ञीय पदार्थ
ले कर आप के पास आते हैं. ( २५ )
स्योनासि सुषदासि क्षत्रस्य योनिरसि.
स्योनामासीद सुषदामासीद क्षत्रस्य योनिमासीद.. (२६)
हे आसन देव! आप सुखद व सुख से बैठने योग्य हैं. आप बल का मूल स्थान
व सुखद हैं. आप सुख से बैठने योग्य व बल का मूल स्थान हैं. ( २६ )
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा. साम्राज्याय सुक्रतुः.. (२७)
यजमान व्रतधारी हैं और वह अनिष्ट दूर करने में संलग्न हैं. यजमान श्रेष्ठ राज्य
प्राप्ति हेतु इस सुयज्ञ को कर रहे हैं. वे प्रजापालक बनें. ( २७ )
अभिभूरस्येतास्ते पञ्च दिशः कल्पन्तां ब्रह्माँस्त्वं ब्रह्मासि सवितासि सत्यप्रसवो
वरुणोसि सत्यौजा ऽ इन्द्रोसि विशौजा रुद्रोसि सुशैवः.
बहुकार श्रेयस्कर भूयस्क्रेन्द्रस्य वज्रोसि तेन मे रध्य.. (२८)
यजमान शत्रुओं को पराभूत करने वाले हैं. पांचों दिशाएं यजमान के लिए
फलीभूत हों. आप ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मा, सविता व सत्य के उत्पादक हैं. आप वरुण,
सत्यवान व ओजस्वी हैं. आप इंद्र व विशाल, ओजस्वी और रुद्र हैं. आप अच्छे कर्म
वाले हैं. आप बहुत श्रेयस्कर हैं. आप वज्र हैं. आप अपने यजमान को धन प्रदान
करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
अग्निः पृथुधर्मणस्पतिर्जुषाणो अग्निः पृथुधर्मणस्पतिराज्यस्य वेतु स्वाहा.
स्वाहाकृताः सूर्यस्य रश्मिभिर्यतध्व १७ सजातानां मध्यमेष्ठ्याय.. (२९)
अग्नि विशाल हैं. अग्नि धर्म के पालक हैं. अग्नि यज्ञ में अग्रणी हैं. अग्नि से
निवेदन है कि वे हमारा मन जानें. हमारी आहुति को स्वीकारने की कृपा करें. अग्नि
के लिए स्वाहा. अग्नि सूर्य की किरणों से स्वयं भी बलवान हों तथा यजमान को
१२२ - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
भी राजाओं के मध्य प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (२९)
सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभिरिन्द्रेणास्मे बृहस्पतिना
ब्रह्मणा वरुणेनौजसाग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतः प्र
सर्पामि.. (३०)
सविता देव उत्पादक हैं. सरस्वती देवी से, उन की वाणी से हम प्रेरित होते हैं.
हम त्वष्टा देव के रूप से व पशुवान पूषा देव से प्रेरित होते हैं. हम सामर्थ्यशाली
बृहस्पति व अग्नि के तेज से प्रेरित होते हैं. हम राजा सोम से प्रेरित होते हैं. हम
पालक विष्णु से प्रेरित होते हैं. हम देवताओं के दिव्य ( कर्म ) पथ पर ( जाने हेतु )
प्रेरित होते हैं. ( ३० )
अश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व.
वायुः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिस्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३१)
आप दोनों अश्विनीकुमारों के लिए परिपक्व होइए. आप सरस्वती देवी के
लिए परिपक्व होइए. इंद्र देव अन्य देवताओं को योजित करते हैं. आप इंद्र देव के
लिए परिपक्व होइए. वायु से पवित्र सोम का यज्ञ में श्रवण हो रहा है. सोम इंद्र देव
से जुड़े हुए हैं. सोम इंद्र देव के मित्र ( सखा ) हैं. ( ३१ )
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. (३२)
हे सोम! आप को प्रजा के कल्याण हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप
यहां आइए और भोजन कीजिए. यजमान आप को बैठने के लिए कुशासन प्रदान
करते हैं. यजमान आप के लिए उक्ति (मंत्रों से ) यज्ञ करते हैं. आप को
अश्विनीकुमारों के लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को सरस्वती देवी के
लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण किया
जाता है. आप को शत्रु नाश हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. ( ३२ )
युव ꣳ१ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा.
विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (३३)
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों नमुचि राक्षस के पास स्थित सोम रस का भी
पान करने वाले हैं. आप रमणीय सोमरस का भी पान करने वाले हैं. इंद्र देव शुभ
कर्मा ( शुभ काम करने वाले ) हैं. आप दोनों इंद्र देव के रक्षक बनने की कृपा
करें. ( ३३ )
यजुर्वेद - १२३

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पूर्वार्ध दसवां अध्याय
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दꣲ सनाभिः.
यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (३४)
हे इंद्र देव! जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है, उसी प्रकार अश्विनीकुमारों
ने राक्षसों के संपर्क के कारण गलत मंत्रों से अशुद्ध हुए सोमरस को पी कर भी आप
की रक्षा की. जब पवित्र मददायी सोमरस का आप ने पान किया तब वाणी की देवी
सरस्वती आप के अनुकूल हुईं ( अर्थात् अशुद्धता जन्य दोष से नाराज हुईं तत्पश्चात
उन की वह नाराजगी दूर हुई ). ( ३४ )
१२४ - यजुर्वेद

ग्यारहवां अध्याय

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ग्यारहवां अध्याय
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः.
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या ऽ अध्याभरत.. (१)
सविता देव सर्वप्रथम मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. अग्नि में प्रकाश जगाते हैं.
उस प्रकाश से पृथ्वी मंडल को पूरी तरह भर देते हैं. (१)
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे. स्वर्ग्याय शक्त्या.. (२)
हम सविता देव के साथ मन से जुड़ सकें. हम उन से स्वर्ग के योग्य शक्ति
प्राप्त कर सकें. (२)
युक्त्वाय सविता देवान्त्स्वर्यतो धिया दिवम्.
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्र सुवाति तान्.. (३)
सविता देव सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. वे बुद्धि और स्वर्गलोक को
प्रकाशित करते हैं. वे अपनी विशाल ज्योति को पूरी तरह विस्तार देते हैं. (३)
युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (४)
विशेष रूप से ज्ञानी ऋत्विज् यजमान के विशाल यज्ञ को सफल बनाने के
लिए मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. वह होता सभी विज्ञानों को जानने वाला है.
वही उन्हें धारण भी करता है. सविता देव की स्तुति महिमामयी व संतोषदायी
है. (४)
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक ऽ एतु पथ्येव सूरेः.
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ऽ आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः.. (५)
हे यजमान दंपती! हम परम शक्ति को नमस्कार करते हुए यज्ञ शुरू करते हैं.
हम विशिष्ट श्लोकों से यह यज्ञ संपन्न करते हैं. हमारी यह उपासना सविता देव के
पथ में पहुंचने की कृपा करे. अमरता के पुत्र दिव्य धाम में बैठे हुए देवगण हमारी
इन स्तुतियों को सुनने की कृपा करें. (५)
यजुर्वेद - १२५

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
यस्य प्रयाणमन्वन्य ऽ इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा.
यः पार्थिवानि विममे स ऽ एतशो रजा ᳪ सि देवः सविता महित्वना.. (६)
जिस सविता देव के प्रयाण ( गमन ) महिमा और ओज का अन्य देवता गण
अनुकरण करते हैं, वह सविता देव अपनी महिमा से सर्वत्र व्यापक हैं. ( ६ )
देव सवितः प्र सुव यज्ञं प्र सुव यज्ञपतिं भगाय.
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु.. (७)
हे सविता देव! आप सभी को यज्ञ के लिए प्रेरित करने की कृपा करें.
यज्ञपति को सौभाग्यशाली बनाने की कृपा कीजिए. आप दिव्य और पवित्रकारी
हैं. वाणी के स्वामी हैं. हमारी वाणी को मधुरता से संचारित करने की कृपा
करें. ( ७ )
इमं नो देव सवितर्यज्ञं प्रणय देवाय्व ᳪ सखिविद ᳪ सत्राजितं धनजित ᳪ स्वर्जितम्.
ऋचा स्तोम ᳪ समर्धय गायत्रेण रथन्तरं बृहद्गायत्रवर्तनि स्वाहा.. (८)
हे सविता देव! आप यज्ञ को और अधिक ऊर्जामय बनाते हैं. आप मित्रता को
जानने वाले और धन जीतने वाले हैं. आप हमारे यज्ञ को बढ़ाइए. हम वैदिक मंत्रों
से आप की स्तुति करते हैं. गायत्र साम से रथंतर और बृहत्साम को परिपुष्ट करने
की कृपा कीजिए. सविता देव के लिए स्वाहा. ( ८ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आददे गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वत्पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभर त्रैष्टुभेन
छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (९)
सविता देव सिरजनहार हैं. हम अश्विनीकुमार की बाहु और पूषा देव के हाथों
से गायत्री छंद के प्रभाव से सविता देव को ग्रहण करते हैं. हम सविता देव को
अंगिरा ऋषि की भांति ग्रहण करते हैं. त्रिष्टुप् छंद की प्रेरणा से आप अंगिरा ऋषि
की भांति पृथ्वी को ऊर्जामय बनाने की कृपा करें. ( ९ )
अभ्रिरसि नार्यसि तया वयमग्नि ᳪ शकेम खनितु ᳪ सधस्थ ऽ आ.
जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (१०)
आप अभ्रि ( मिट्टी खोदने का साधन ) हैं. आप नारी हैं. हम आप की कृपा
से जगती छंद के प्रभाव से अंगिरा ऋषि की भांति पृथ्वी पर अग्नि को धारण करने
की सामर्थ्य पा सकें. ( १० )
हस्त ऽ आधाय सविता बिभ्रदभ्रि ᳪ हिरण्ययीम्.
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या ऽ अध्याभरदानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वत्.. (११)
सविता देव हाथ में स्वर्णमयी अभ्रि ( मिट्टी खोदने का साधन ) धारण करते
१२६ - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हैं. अंगिरा ऋषि के समान अग्नि को यज्ञ वेदी पर स्थापित करते हैं. अनुष्टुप् छंद में
पढ़े गए मंत्र से उसे भलीभांति पोषित करने की कृपा करें. ( ११ )
प्रतूर्त्तं वाजिन्ना द्रव वरिष्ठामनु संवतम्.
दिवि ते जन्म परममन्तरिक्षे तव नाभिः पृथिव्यामधि योनिरित्.. (१२)
हे अग्नि देव! आप अत्यंत त्वरणशील ( शीघ्र कार्य करने वाले ) हैं. आप
धनवान वरिष्ठ हैं. स्वर्गलोक में आप का जन्म हुआ है. अंतरिक्ष में आप का नाभि
स्थल है. पृथ्वीलोक आप की योनि है. आप पृथ्वीलोक पर अधिष्ठित होने की कृपा
कीजिए. ( १२ )
युञ्जाथा ष्षं रासभं युवमस्मिन् यामे वृषण्वसू. अग्निं भरन्तमस्मयुम्.. (१३)
आप दोनों ( पुरोहित और यजमान ) पर लाभकारी धन बरसे. आप अग्नि को
प्रज्वलित करने में समर्थ हैं. आप रासभ ( प्रज्वलित अग्नि और मंत्र ) को यज्ञ कार्य
में जोड़ने की कृपा कीजिए. ( १३ )
योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे. सखाय ऽ इन्द्रमूतये.. (१४)
इंद्र देव हमारे सखा हैं. हम अपनी रक्षा के लिए बारबार उन का आह्वान करते
हैं. ( १४ )
प्रतूर्वन्नेह्यवक्रामन्नशस्ती रुद्रस्य गाणपत्यं मयोभूरेहि.
उर्वन्तरिक्षं वीहि स्वस्तिगव्यूतिरभयानि कृण्वन् पूष्णा सयुजा सह.. (१५)
हे अग्नि! आप हम पर दया कीजिए. आप तीव्र गतिशील हैं. आप दुष्टों को
रुलाने वाले देव के गणपति का पद पाएंगे. आप हमारे यहां यज्ञ में पधारिए. आप
यजमानों की राह को सुगम बनाइए. आप पृथ्वी से अंतरिक्ष तक कल्याणकारी हैं.
आप हमारी राह निर्भय बनाइए. आप अन्न जल वाले मार्ग तक व्याप्त होइए. ( १५ )
पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभरागिं पुरीष्यमङ्गिरस्वदच्छेमोग्निं
पुरीष्यमङ्गिरस्वद्धरिष्यामः.. (१६)
हे अभ्रि ( यज्ञ से संबंधित सामग्री )! आप पृथ्वी के पालनहार हैं. आप
सामर्थ्यवान हैं. आप तेजोमय हैं. आप अग्रगण्य हैं. आप अग्नि को यहां लाने की
कृपा कीजिए. अग्नि पोषण करने वाले हैं. वे सामर्थ्यवान और नायक हैं. हम यज्ञ
स्थल पर अग्नि की प्रतिष्ठा ( स्थापना ) करते हैं. ( १६ )
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः.
अनु सूर्यस्य पुरुत्रा च रश्मीननु द्यावापृथिवी आततन्थ.. (१७)
अग्नि पहले से ही मौजूद हैं. वे उषाकाल से पूर्व ही दिन को प्रकाशित कर देते
यजुर्वेद - १२७

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हैं. वे सूर्य की बहुत सी किरणों को प्रकाशित करते हैं. अग्नि लोक की सृष्टि करने
वाले हैं. हम अग्नि को स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक में घूमता हुआ देखते हैं. ( १७ )
आगत्य वाज्यध्वान ꣳ सर्वा मृधो विधूनुते.
अग्नि ꣳ सधस्थे महति चक्षुषा नि चिकीषते.. ( १८ )
अग्नि यज्ञ को अन्नमय बनाते हैं. वे सभी मार्ग को कंपाते हुए जाते हैं. वे सधे
हुए हैं. वे अपने विशाल चक्षु से यज्ञ का निरीक्षण करते हैं. ( १८ )
आक्रम्य वाजिन् पृथिवीमग्निमिच्छ रुचा त्वम्.
भूम्या वृत्वाय नो ब्रूहि यतः खनेम तं वयम्.. (१९)
हे वाजिन ( चेतनायुक्त ऊर्जा ) ! आप पृथ्वी पर तेजी से विचरते हैं. आप अग्नि
की चाह न कीजिए ( इच्छा न करिए ). आप प्रकाशित होने और भूमि को खोद कर
हमें बताने की कृपा कीजिए. ताकि हम भी उसे खोद कर ( ऊर्जस्वी पदार्थों को )
प्राप्त कर सकें. ( १९ )
द्यौस्ते पृष्ठं पृथिवी सधस्थमात्मान्तरिक्ष ꣳ समुद्रो योनिः.
विख्याय चक्षुषा त्वमभि तिष्ठ पृतन्यतः.. (२०)
हे वाजिन! स्वर्गलोक में आप का आधार ( पृष्ठ ) भाग है. पृथ्वी पर आप सधे
हुए हैं. अंतरिक्ष में आप की आत्मा है तथा समुद्र योनि है. आप आंखों से व्याख्या
करते हैं. आप राक्षसों पर आक्रमण कर के उन का विनाश कीजिए. ( २० )
उत्क्राम महते सौभागायास्मादास्थानाद् द्रविणोदा वाजिन्.
वय ꣳ स्याम सुमतौ पृथिव्या ऽ अग्निं खनन्र ऽ उपस्थे अस्याः.. ( २१ )
हे वाजिन! आप धनदाता हैं. आप सौभाग्य दान करने के लिए ऊपर उठने की
कृपा कीजिए. हम आप की कृपा से अच्छी मति वाले हो जाएं. हम पृथ्वी को खोदें.
अग्नि को स्थापित करने की कृपा कीजिए. ( २१ )
उदक्रमीद् द्रविणोदा वाज्यर्वाकः सुलोक ꣳ सुकृतं पृथिव्याम्.
ततः खनेम सुप्रतीकमग्नि ꣳ स्वो रुहाणा अधि नाकमुत्तमम्.. ( २२ )
यह घोड़ा चंचल और धनदाता है. पृथ्वी का उत्क्रमण कर के आया है. पृथ्वी
पर अच्छे लोक रचे हैं. उन्हें अच्छी कृति का रूप दिया है. हम अग्नि को उत्तम सुख
के लिए खोदते हैं ( जगाते हैं ). हम अच्छे सुखों के लिए उत्तम लोक का आरोहण
करते हैं. ( २२ )
आ त्वा जिघर्मि मनसा घृतेन प्रतिक्षियन्तं भुवनानि विश्वा.
पृथुं तिरश्चा वयसा बृहन्तं व्यचिष्ठमन्नै रभसं दृशानम्.. ( २३ )
१२८ - यजुर्वेद 632/8

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप आइए, पधारिए. आप अखिल विश्व में व्यापिए. हम मन से,
घी से आप के प्रज्वलित होने की प्रतीक्षा करते हैं. आप तिरछी वय से सब ओर
व्यापते हैं. आप दर्शनीय व सधे हुए मन वाले हैं. ( २३ )
आ विश्वतः प्रत्यञ्चं जिघर्म्यरक्षसा मनसा तज्जुषेत.
मर्यश्रीः स्पृहयद्वर्णो अग्निर्नाभिम्शे तन्वा जर्भुराणः.. ( २४)
हे अग्नि! आप आइए, आप सर्वत्र व्यापक हैं. हम मन से, घी से आप को
प्रज्वलित करते हैं. आप स्पृहणीय ( प्यारे ) वर्ण वाले व सुनहरी शोभा वाले हैं. आप
बारबार चाहे जाते हैं. आप हितकारी और सर्वथा ग्रहण करने योग्य देव हैं. ( २४ )
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्. दधद्रत्नानि दाशुषे.. ( २५)
अग्नि अन्नदाता, कवि और हविदाता को धन देने वाले हैं. आप यजमान को
देने के लिए रत्न धारण करते हैं. ( २५ )
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्र १७ सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवे दिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्.. ( २६)
हे अग्नि! हम ब्राह्मण आप के सम्मुख आप की उपासना करते हैं. हम आप से
बुद्धि पाने की इच्छा करते हैं. आप गुणधारक हैं. आप प्रतिदिन दुष्टों का नाश करते
हैं. हम बारबार आप का वंदन करते हैं. ( २६ )
त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि.
त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः.. ( २७)
हे अग्नि! आप सभी के रक्षक, स्वर्गिक गुणों वाले, अंधकार को शीघ्र ही दूर
करने वाले और प्रतिदिन ही प्रज्वलित होते हैं. आप वन व ओषधियों में उत्पन्न होते
हैं. आप मनुष्यों के यहां उत्पन्न होते हैं. आप पवित्र हैं. ( २७ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामि.
ज्योतिष्मन्तं त्वाग्ने सुप्रतीकमजस्रेण भानुना दीद्यतम्.
शिवं प्रजाभ्यो ऽ हि १७ सन्तं पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामः.. ( २८)
अग्नि सविता देव से उत्पन्न हैं. अग्नि को अश्विनी देव बाहुओं से पुकारते हैं.
अग्नि को पूषा देव हाथों से पुकारते हैं. अग्नि को पृथ्वी पर साधा जाता है. अग्नि
आप को पृथ्वी को खोद कर ( जाग्रत कर के ) पुकारते हैं. आप ज्योतिमान हैं. आप
शोभावान हैं. आप लगातार सूर्य से प्रदीप्त होते हैं. आप प्रजाजनों का कल्याण
चाहते हैं. आप पृथ्वी पर सधे हुए हैं. अंगिरस पृथ्वी को खोद कर ( जगा कर ) आप
को पुकारते हैं. ( २८ )
यजुर्वेद - १२९

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम्.
वर्धमानो महाँ २ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व.. (२९)
आप जल के आधार और अग्नि की योनि हैं. आप समुद्र की बढ़ोतरी करते हैं.
आप महान् व कमल की भांति स्वर्गिक हैं. आप पृथ्वी के परिणाम जितने विस्तृत
होने की कृपा कीजिए. ( २९ )
शर्म च स्थो वर्म च स्थो ऽ च्छिद्रे बहुले उभे.
व्यचस्वती सं वसाथां भृतमग्निं पुरीष्यम्.. (३०)
आप सुखदायी व स्थायी हैं. आप कवच के समान सुरक्षा करने वाले हैं. आप
दोनों हितेच्छु हैं. आप चमकीले, भरणपोषण करने वाले व अग्नि की बढ़ोतरी
करने वाले हैं. ( ३० )
सं वसाथा ँ४ स्वर्विदा समीची उरसा त्मना.
अग्निमन्तर्भरिष्यन्ती ज्योतिष्मन्तमजस्रमित्.. (३१)
आप अग्नि को अपने में बसाइए. अग्नि स्वयं प्रकाशवान हैं. आप उस ( हृदय )
में प्रज्वलित होते हैं. आप ज्योतिमान व अजस्र प्रकाशित होते हैं. ( ३१ )
पुरीष्योसि विश्वभरा ऽ अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने.
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत.
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (३२)
हे अग्नि! आप सर्वव्यापक व विश्व का भरणपोषण करने वाले हैं. सर्वप्रथम
अथर्वा ऋषि ने अरणि मंथन से आप को प्रकट किया. उन्होंने आप को सम्मानपूर्वक
विश्व के उच्च भाग पर स्थापित किया. ( ३२ )
तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ऽ ईंधे अथर्वणः. वृत्रहणं पुरन्दरम्.. (३३)
हे अग्नि! दध्यङ् ऋषि अथर्वा ऋषि के पुत्र हैं. अथर्वण ने वृत्रहंता व नगर
भेदक को प्रकट किया. ( ३३ )
तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्. धनञ्जयं ँ४ रणेरणे.. (३४)
हे अग्नि! आप सत्यथगामी, बलवान व डाकुओं के नाशक हैं. आप समिधाओं
से प्रज्वलित होते हैं और आप हर युद्ध में धन जीतने वाले हैं. ( ३४ )
सीद होतः स्व ऽ उ लोके चिकित्वान्सादया यज्ञ ँ४ सुकृतस्य योनौ.
देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः.. (३५)
हे अग्नि! आप होता रूप में प्रतिष्ठित हैं. आप अपने लोक को प्रकाशित करते
हैं. आप यज्ञ संपन्न करते हैं. आप श्रेष्ठ ( अच्छे ) कार्य करने वाले हैं. आप श्रेष्ठ कर्म
१३० - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
का मूल स्थान हैं. आप देवताओं को देवताओं की तरह हवि से तृप्त करने वाले हैं.
आप यज्ञ संपन्न करने की कृपा करें. आप यजमान हेतु धन धारण व आयु धारें. ( ३५ )
नि होता होतृषदने विदानस्त्वे्षो दीदिवाँ २ असदत्सुदक्षः.
अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः.. (३६)
हमारे होता अग्नि होता सदन में शोभते हैं. अग्नि विद्वान्, तेजस्वी, दिव्य व
दिव्य स्थान वासी हैं. वे हजारों का पालनपोषण करने वाले, व्रतशील, अत्यंत पावन
व पवित्र जिह्वा वाले हैं. ( ३६ )
स ष्४ सीदस्व महाँ २ असि शोचस्व देववीतमः.
वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (३७)
हे अग्नि! आप प्रशंसित, महान्, पवित्र व दिव्य गुणों से संपन्न हैं. आप बहुत
सा लाल धुआं फैला कर मार्ग प्रशस्त करने की कृपा कीजिए. ( ३७ )
अपो देवीरुपसृज मधुमतीरयक्ष्माय प्रजाभ्यः.
तासामास्थानादुज्जिहतामोषधयः सुपिप्पलाः.. (३८)
हे अग्नि! आप दिव्य जल व प्रजा के लिए मीठी जलधारा उत्पन्न कीजिए. उन
जलधाराओं से रोग नाशक श्रेष्ठ ओषधियां उपजाने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
सन्ते वायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्.
यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मै देव वषडस्तु तुभ्यम्.. (३९)
हे पृथ्वी! आप विशाल हृदय हैं. आप जल व वनस्पति धारण कीजिए. आप देवों
में प्राणों का संचार करती हैं. आप किस देव के प्रति कल्याणदायी नहीं हैं. ( ३९ )
सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः.
वासो अग्ने विश्वरूप ष्४ सं व्ययस्व विभावसो.. (४०)
हे अग्नि! आप अच्छी तरह उत्पन्न होने वाले हैं. आप ज्वालाओं के साथ वेदी
को शोभित करने की कृपा कीजिए. आप सुखद व विभावान ( कांतिमान ) हैं. आप
विश्व रूप वाली पृथ्वी पर वास करते हैं. ( ४० )
उदु तिष्ठ स्वध्वरावा नो देव्या धिया.
दृशे च भासा बृहता सुशुक्वनिराग्ने याहि सुशस्तिभिः.. (४१)
हे अग्नि! आप उठिए, ( वेदी पर ) विराजिए और यज्ञ को संपादित कीजिए.
आप अपनी दिव्य बुद्धि से हमारा संरक्षण करने की कृपा कीजिए. आप अपनी
विशाल किरणों से पधारिए व दर्शन दीजिए. हम अच्छी प्रशंसात्मक स्तुतियों से
आप का आह्वान करते हैं. ( ४१ )
यजुर्वेद - १३१

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
ऊर्ध्व ऽ ऊ षु ण ऽ ऊतये तिष्ठा देवो न सविता.
ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (४२)
हे अग्नि! जैसे सविता देव ( इतने ) ऊपर बैठ कर ( इतने ) ऊपर से हमारी रक्षा
करते हैं, वैसे ही आप हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप ऊपर से अन्न और
पोषक पदार्थों के साथ हमारी रक्षा कीजिए. हम यजमान हवि प्रदान करते हुए आप
का आह्वान करते हैं. ( ४२ )
स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ऽ ओषधीषु.
चित्रः शिशुः परि तमा ँष्स्यक्तून्प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गाः.. (४३)
हे अग्नि! आप सुंदर और विशेष भरण ( पोषण ) करने वाली ओषधियों से
युक्त हैं. आप पृथ्वी और स्वर्ग के बीच उत्पन्न होते हैं. आप गर्भ स्वरूप हैं. आप
अद्भुत लपटों वाले और शिशु रूप हैं. आप अंधेरा दूर करते हैं. आप मातृ स्वरूप
के पास से आवाज करते हुए तेज गति से विचरने की कृपा कीजिए. ( ४३ )
स्थिरो भव वीड्वङ्ग ऽ आशुर्भव वाज्यर्वन्.
पृथुर्भव सुषदस्त्वमग्नेः पुरीषवाहनः.. (४४)
हे अग्नि! आप चंचल व वेगवान हैं. आप स्थिर, वेगवान व शक्तिशाली
होइए. आप सब को वहन करने वाले हैं. आप सब को सुख प्रदान करने की कृपा
कीजिए. ( ४४ )
शिवो भव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमङ्गिरः.
मा द्यावापृथिवी अभि शोचीर्मान्तरिक्षं मा वनस्पतीन्.. (४५)
हे अग्नि! आप मनुष्यों के सभी अंगों में व्याप्त हैं. आप मनुष्यों तथा
अन्य सभी जीवों के लिए कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. आप स्वर्गलोक
को और पृथ्वीलोक को संतप्त न करें. आप अंतरिक्ष व वनस्पति को संतप्त न
करें. ( ४५ )
प्रैतु वाजी कनिक्रदन्नानदद्रासभः पत्वा.
भरन्नग्निं पुरीष्यं मा पाद्यायुषः पुरा.
वृषाग्निं वृषणं भरन्नपां गर्भ ँष्समुद्रियम्.
अग्न ऽ आ याहि वीतये.. (४६)
हे अग्नि! आप वेगवान हैं. आप सब से आगे प्रस्थान करने की कृपा कीजिए.
आप तेज आवाज करते हुए बढ़ने की कृपा कीजिए. भरणपोषण करने वाली अग्नि
आगे बढ़े, कहीं रुके नहीं. समुद्र बलवान और शक्तिशाली अग्नि को धारण करे.
हे अग्नि! आप हवि ग्रहण करने के लिए आइए. ( ४६ )
१३२ - यजुर्वेद

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
ऋत १४ सत्यमृत १४ सत्यमग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरामः.
ओषधयः प्रति मोदध्वमग्निमेत १४ शिवमायन्तमभ्यत्र युष्माः.
व्यस्यन् विश्वा ऽ अनिरा ऽ अमीवा निषीदन्नो अप दुर्मतिं जहि.. (४७)
अग्नि सत्यस्वरूप और अमर हैं. सत्यस्वरूप अग्नि को हम अंगिरा ऋषि के
समान परिपुष्ट करते हैं. सभी ओषधियां आनंदवर्द्धक हो कर अग्नि देव को प्राप्त
होने की कृपा करें. आप हम सभी के प्रति शिवममय ( कल्याणकारी ) होने की कृपा
करें. आप हमारे सभी कष्ट हरिए. आप निरोगी बनाइए. आप विराजिए. आप की
कृपा से दुर्बुद्धि हमें छोड़ कर चली जाए. ( ४७ )
ओषधयः प्रति गृभ्णीत पुष्पवतीः सुपिप्पलाः.
अयं वो गर्भ ऽ ऋत्वियः प्रत्न १४ सधस्थमासदत्.. (४८)
हे ओषधियो! आप पुष्पवती व सुफलवती हैं. ऋतु के अनुरूप अग्नि के गर्भ
में उत्पन्न होती हैं. अग्नि प्राचीन समय से सधे व विराजे हुए हैं. ( ४८ )
वि पाजसा पृथुना शोशुचानो बाधस्व द्विषो रक्षसो अमीवाः.
सुशर्मणो बृहतः शर्मणि स्यामग्नेरह १४ सुहवस्य प्रणीतौ.. (४९)
हे अग्नि! आप विशाल, बलवान व दीप्तिमान हैं. आप द्वेषियों, राक्षसों व रोगों
का नाश कीजिए. हमें सुखदायी विशाल महायज्ञ में लगाने की कृपा कीजिए. आप
की कृपा से हम अच्छी हवि वाले हों. हमें आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त कराइए. ( ४९ )
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऽ ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (५०)
हे जल देवो! आप भुवन में सुख के स्रोत व ऊर्जाधारी हैं. आप महान् देखने
योग्य कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करें. ( ५० )
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (५१)
हे जल देवो! आप कल्याणकारी हैं. रसीले व अपना कल्याणकारी रस हमें
प्राप्त कराइए. आप जिस रस से ( रोगों का ) क्षय करते हैं, उस रस को हमें प्राप्त
कराइए. आप जनोपयोगी रस हमें प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. ( ५१ )
तस्मा ऽ अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (५२)
हे जल देवो! आप अत्यंत कल्याण करने वाले हैं. हे जल देवो! आप उस रस को
सेवन से वैसे ही पुष्ट करिए जैसे माताएं संतान को दुग्ध रस से पुष्ट करती हैं. ( ५२ )
मित्रः स १४ सृज्य पृथिवीं भूमिं च ज्योतिषा सह.
सुजातं जातवेदमसमक्षमाय त्वा स १४ सृजामि प्रजाभ्यः.. (५३)
जैसे हमारे मित्र सूर्य अपनी ज्योति के साथ पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार
यजुर्वेद - १३३

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पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हम प्रजा के कल्याण के लिए अग्नि को प्रकाशित करते हैं. आप सम्यक् रूप से उत्पन्न
हैं. आप सर्वविद् हैं. हम यक्ष्मा ( रोग ) नाश के लिए आप को सिरजते हैं. ( ५३ )
रुद्राः स ँ४ सृज्य पृथिवीं बृहज्ज्योतिः समीधिरे.
तेषां भानुरजस्र ऽ इच्छुक्रो देवेषु रोचते.. (५४)
रुद्रगणों ने पृथ्वी को सिरजा और विशाल ज्योति से लोक को प्रदीप्त किया
( चमकाया ). सूर्य की अजस्र ( लगातार ) ज्योति देवताओं को चमकाती है. ( ५४ )
स ँ४ सृष्टां वसुभी रुद्रैर्धीरैः कर्मण्यां मृदम्.
हस्ताभ्यां मृद्वीं कृत्वा सिनीवाली कृणोतु ताम्.. (५५)
धैर्यशाली वसुओं और रुद्रगणों द्वारा कर्मपूर्वक मिट्टी सिरजी गई है ( तैयार
की गई है ). सिनीवाली देवी हाथों से उस मिट्टी को पात्र बनाने लायक तैयार करें
तथा पात्र बनाने की कृपा करें. ( ५५ )
सिनीवाली सुकपर्दा सुकुरीरा स्वौपशा.
सा तुभ्यमदिते मह्योखां दधातु हस्तयोः.. (५६)
सिनीवाली देवी सुंदर केशों, सुंदर अंगों व सुंदर आभूषणों वाली हैं. वे
देवताओं की माता हैं. वे हम लोगों को लिए हाथों में उखा ( पुरोडाश पकाने का
पात्र ) धारण करने की कृपा करें. ( ५६ )
उखां कृणोतु शक्त्या बाहुभ्यामदितिर्धिया.
माता पुत्रं यथोपस्थे साग्निं बिभर्तु गर्भ ऽ आ.
मखस्य शिरो ऽ सि.. (५७)
देवमाता उखा पात्र को शक्ति व सुमतिपूर्वक बाहु से धारण करने की कृपा
करें. माता जैसे पुत्र को गोद में बैठाती है, वैसे ही आप अपने गर्भ ( बीच ) में अग्नि
को धारने की कृपा करें. आप यज्ञ के सिर ( मुख्य ) हैं. ( ५७ )
वसवस्त्वा कृण्वन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि पृथिव्यसि धारया मयि प्रजा
ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्यं ँ४ सजातान्यजमानाय रुद्रास्त्वा कृण्वन्तु त्रैष्टुभेन
छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवास्यन्तरिक्षमसि धारया मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४
सजातान्यजमानायादित्यास्त्वा कृण्वन्तु जागतेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि द्यौरसि धारया
मयि प्रजा ँ४ रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय विश्वे त्वा देवा
वैश्वानराः कृण्वन्त्वानुष्टुभेन छन्दसाङ्गिरस्वद्द्ध्रुवासि दिशोसि धारया मयि प्रजा ँ४
रायस्पोषं गौपत्य ँ४ सुवीर्य ँ४ सजातान्यजमानाय.. (५८)
हे उखा देव! वसुगण गायत्री छंद से अंगिरा के समान आप को निर्मित करने
की कृपा करें. आप ध्रुव व पृथ्वी हैं. आप हमारी प्रजा, यजमान व हमारे सजातियों
१३४ - यजुर्वेद