यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextग्यारहवां अध्याय
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः.
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या ऽ अध्याभरत.. (१)
सविता देव सर्वप्रथम मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. अग्नि में प्रकाश जगाते हैं.
उस प्रकाश से पृथ्वी मंडल को पूरी तरह भर देते हैं. (१)
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे. स्वर्ग्याय शक्त्या.. (२)
हम सविता देव के साथ मन से जुड़ सकें. हम उन से स्वर्ग के योग्य शक्ति
प्राप्त कर सकें. (२)
युक्त्वाय सविता देवान्त्स्वर्यतो धिया दिवम्.
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्र सुवाति तान्.. (३)
सविता देव सभी को प्रकाशित करने वाले हैं. वे बुद्धि और स्वर्गलोक को
प्रकाशित करते हैं. वे अपनी विशाल ज्योति को पूरी तरह विस्तार देते हैं. (३)
युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (४)
विशेष रूप से ज्ञानी ऋत्विज् यजमान के विशाल यज्ञ को सफल बनाने के
लिए मन और बुद्धि को जोड़ते हैं. वह होता सभी विज्ञानों को जानने वाला है.
वही उन्हें धारण भी करता है. सविता देव की स्तुति महिमामयी व संतोषदायी
है. (४)
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक ऽ एतु पथ्येव सूरेः.
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ऽ आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः.. (५)
हे यजमान दंपती! हम परम शक्ति को नमस्कार करते हुए यज्ञ शुरू करते हैं.
हम विशिष्ट श्लोकों से यह यज्ञ संपन्न करते हैं. हमारी यह उपासना सविता देव के
पथ में पहुंचने की कृपा करे. अमरता के पुत्र दिव्य धाम में बैठे हुए देवगण हमारी
इन स्तुतियों को सुनने की कृपा करें. (५)
यजुर्वेद - १२५