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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 127 of 421

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Page 127

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हैं. अंगिरा ऋषि के समान अग्नि को यज्ञ वेदी पर स्थापित करते हैं. अनुष्टुप् छंद में
पढ़े गए मंत्र से उसे भलीभांति पोषित करने की कृपा करें. ( ११ )
प्रतूर्त्तं वाजिन्ना द्रव वरिष्ठामनु संवतम्.
दिवि ते जन्म परममन्तरिक्षे तव नाभिः पृथिव्यामधि योनिरित्.. (१२)
हे अग्नि देव! आप अत्यंत त्वरणशील ( शीघ्र कार्य करने वाले ) हैं. आप
धनवान वरिष्ठ हैं. स्वर्गलोक में आप का जन्म हुआ है. अंतरिक्ष में आप का नाभि
स्थल है. पृथ्वीलोक आप की योनि है. आप पृथ्वीलोक पर अधिष्ठित होने की कृपा
कीजिए. ( १२ )
युञ्जाथा ष्षं रासभं युवमस्मिन् यामे वृषण्वसू. अग्निं भरन्तमस्मयुम्.. (१३)
आप दोनों ( पुरोहित और यजमान ) पर लाभकारी धन बरसे. आप अग्नि को
प्रज्वलित करने में समर्थ हैं. आप रासभ ( प्रज्वलित अग्नि और मंत्र ) को यज्ञ कार्य
में जोड़ने की कृपा कीजिए. ( १३ )
योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे. सखाय ऽ इन्द्रमूतये.. (१४)
इंद्र देव हमारे सखा हैं. हम अपनी रक्षा के लिए बारबार उन का आह्वान करते
हैं. ( १४ )
प्रतूर्वन्नेह्यवक्रामन्नशस्ती रुद्रस्य गाणपत्यं मयोभूरेहि.
उर्वन्तरिक्षं वीहि स्वस्तिगव्यूतिरभयानि कृण्वन् पूष्णा सयुजा सह.. (१५)
हे अग्नि! आप हम पर दया कीजिए. आप तीव्र गतिशील हैं. आप दुष्टों को
रुलाने वाले देव के गणपति का पद पाएंगे. आप हमारे यहां यज्ञ में पधारिए. आप
यजमानों की राह को सुगम बनाइए. आप पृथ्वी से अंतरिक्ष तक कल्याणकारी हैं.
आप हमारी राह निर्भय बनाइए. आप अन्न जल वाले मार्ग तक व्याप्त होइए. ( १५ )
पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभरागिं पुरीष्यमङ्गिरस्वदच्छेमोग्निं
पुरीष्यमङ्गिरस्वद्धरिष्यामः.. (१६)
हे अभ्रि ( यज्ञ से संबंधित सामग्री )! आप पृथ्वी के पालनहार हैं. आप
सामर्थ्यवान हैं. आप तेजोमय हैं. आप अग्रगण्य हैं. आप अग्नि को यहां लाने की
कृपा कीजिए. अग्नि पोषण करने वाले हैं. वे सामर्थ्यवान और नायक हैं. हम यज्ञ
स्थल पर अग्नि की प्रतिष्ठा ( स्थापना ) करते हैं. ( १६ )
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः.
अनु सूर्यस्य पुरुत्रा च रश्मीननु द्यावापृथिवी आततन्थ.. (१७)
अग्नि पहले से ही मौजूद हैं. वे उषाकाल से पूर्व ही दिन को प्रकाशित कर देते
यजुर्वेद - १२७