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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 132 of 421

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Page 132

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
ऊर्ध्व ऽ ऊ षु ण ऽ ऊतये तिष्ठा देवो न सविता.
ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (४२)
हे अग्नि! जैसे सविता देव ( इतने ) ऊपर बैठ कर ( इतने ) ऊपर से हमारी रक्षा
करते हैं, वैसे ही आप हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप ऊपर से अन्न और
पोषक पदार्थों के साथ हमारी रक्षा कीजिए. हम यजमान हवि प्रदान करते हुए आप
का आह्वान करते हैं. ( ४२ )
स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ऽ ओषधीषु.
चित्रः शिशुः परि तमा ँष्स्यक्तून्प्र मातृभ्यो अधि कनिक्रदद्गाः.. (४३)
हे अग्नि! आप सुंदर और विशेष भरण ( पोषण ) करने वाली ओषधियों से
युक्त हैं. आप पृथ्वी और स्वर्ग के बीच उत्पन्न होते हैं. आप गर्भ स्वरूप हैं. आप
अद्भुत लपटों वाले और शिशु रूप हैं. आप अंधेरा दूर करते हैं. आप मातृ स्वरूप
के पास से आवाज करते हुए तेज गति से विचरने की कृपा कीजिए. ( ४३ )
स्थिरो भव वीड्वङ्ग ऽ आशुर्भव वाज्यर्वन्.
पृथुर्भव सुषदस्त्वमग्नेः पुरीषवाहनः.. (४४)
हे अग्नि! आप चंचल व वेगवान हैं. आप स्थिर, वेगवान व शक्तिशाली
होइए. आप सब को वहन करने वाले हैं. आप सब को सुख प्रदान करने की कृपा
कीजिए. ( ४४ )
शिवो भव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमङ्गिरः.
मा द्यावापृथिवी अभि शोचीर्मान्तरिक्षं मा वनस्पतीन्.. (४५)
हे अग्नि! आप मनुष्यों के सभी अंगों में व्याप्त हैं. आप मनुष्यों तथा
अन्य सभी जीवों के लिए कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. आप स्वर्गलोक
को और पृथ्वीलोक को संतप्त न करें. आप अंतरिक्ष व वनस्पति को संतप्त न
करें. ( ४५ )
प्रैतु वाजी कनिक्रदन्नानदद्रासभः पत्वा.
भरन्नग्निं पुरीष्यं मा पाद्यायुषः पुरा.
वृषाग्निं वृषणं भरन्नपां गर्भ ँष्समुद्रियम्.
अग्न ऽ आ याहि वीतये.. (४६)
हे अग्नि! आप वेगवान हैं. आप सब से आगे प्रस्थान करने की कृपा कीजिए.
आप तेज आवाज करते हुए बढ़ने की कृपा कीजिए. भरणपोषण करने वाली अग्नि
आगे बढ़े, कहीं रुके नहीं. समुद्र बलवान और शक्तिशाली अग्नि को धारण करे.
हे अग्नि! आप हवि ग्रहण करने के लिए आइए. ( ४६ )
१३२ - यजुर्वेद