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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 129 of 421

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Page 129

पूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप आइए, पधारिए. आप अखिल विश्व में व्यापिए. हम मन से,
घी से आप के प्रज्वलित होने की प्रतीक्षा करते हैं. आप तिरछी वय से सब ओर
व्यापते हैं. आप दर्शनीय व सधे हुए मन वाले हैं. ( २३ )
आ विश्वतः प्रत्यञ्चं जिघर्म्यरक्षसा मनसा तज्जुषेत.
मर्यश्रीः स्पृहयद्वर्णो अग्निर्नाभिम्शे तन्वा जर्भुराणः.. ( २४)
हे अग्नि! आप आइए, आप सर्वत्र व्यापक हैं. हम मन से, घी से आप को
प्रज्वलित करते हैं. आप स्पृहणीय ( प्यारे ) वर्ण वाले व सुनहरी शोभा वाले हैं. आप
बारबार चाहे जाते हैं. आप हितकारी और सर्वथा ग्रहण करने योग्य देव हैं. ( २४ )
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्. दधद्रत्नानि दाशुषे.. ( २५)
अग्नि अन्नदाता, कवि और हविदाता को धन देने वाले हैं. आप यजमान को
देने के लिए रत्न धारण करते हैं. ( २५ )
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्र १७ सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवे दिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्.. ( २६)
हे अग्नि! हम ब्राह्मण आप के सम्मुख आप की उपासना करते हैं. हम आप से
बुद्धि पाने की इच्छा करते हैं. आप गुणधारक हैं. आप प्रतिदिन दुष्टों का नाश करते
हैं. हम बारबार आप का वंदन करते हैं. ( २६ )
त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि.
त्वं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नृणां नृपते जायसे शुचिः.. ( २७)
हे अग्नि! आप सभी के रक्षक, स्वर्गिक गुणों वाले, अंधकार को शीघ्र ही दूर
करने वाले और प्रतिदिन ही प्रज्वलित होते हैं. आप वन व ओषधियों में उत्पन्न होते
हैं. आप मनुष्यों के यहां उत्पन्न होते हैं. आप पवित्र हैं. ( २७ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामि.
ज्योतिष्मन्तं त्वाग्ने सुप्रतीकमजस्रेण भानुना दीद्यतम्.
शिवं प्रजाभ्यो ऽ हि १७ सन्तं पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामः.. ( २८)
अग्नि सविता देव से उत्पन्न हैं. अग्नि को अश्विनी देव बाहुओं से पुकारते हैं.
अग्नि को पूषा देव हाथों से पुकारते हैं. अग्नि को पृथ्वी पर साधा जाता है. अग्नि
आप को पृथ्वी को खोद कर ( जाग्रत कर के ) पुकारते हैं. आप ज्योतिमान हैं. आप
शोभावान हैं. आप लगातार सूर्य से प्रदीप्त होते हैं. आप प्रजाजनों का कल्याण
चाहते हैं. आप पृथ्वी पर सधे हुए हैं. अंगिरस पृथ्वी को खोद कर ( जगा कर ) आप
को पुकारते हैं. ( २८ )
यजुर्वेद - १२९