यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध दसवां अध्याय
ह १७ सः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसद्दतसद्वयोम सदब्जा गोजा ऽ ऋतजा ऽ अद्रिजा ऽ ऋतं बृहत्.. (२४)
हे परमात्मा! आप पवित्र हैं, अंतरिक्ष के होता व यज्ञ वेदी पर प्रतिष्ठित हैं. आप
अतिथि जैसे आदरणीय व नेतृत्व में अग्रणी, ऋत में प्रतिष्ठित, जलोत्पादक हैं. आप
विशाल सत्य बल संपन्न हैं. ( २४ )
इयदस्यायुरस्यायुर्मयि धेहि युङ्ङसि वर्चोसि वर्चो मयि धेह्यूर्गस्यूर्जं मयि धेहि.
इन्द्रस्य वां वीर्यकृतो बाहू अभ्युपावहरामि.. (२५)
हे परमात्मा! आप की जितनी आयु है, आप इतनी ही आयु हमें दीजिए. आप
जितने वर्चस्वी हैं, आप उतना ही वर्चस्व हमें दीजिए. आप जितने ऊर्जस्वी हैं, आप
उतनी ही ऊर्जा हमें दीजिए. आप इंद्र देव की पराक्रमी बाहु जैसे हैं. हम यज्ञीय पदार्थ
ले कर आप के पास आते हैं. ( २५ )
स्योनासि सुषदासि क्षत्रस्य योनिरसि.
स्योनामासीद सुषदामासीद क्षत्रस्य योनिमासीद.. (२६)
हे आसन देव! आप सुखद व सुख से बैठने योग्य हैं. आप बल का मूल स्थान
व सुखद हैं. आप सुख से बैठने योग्य व बल का मूल स्थान हैं. ( २६ )
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा. साम्राज्याय सुक्रतुः.. (२७)
यजमान व्रतधारी हैं और वह अनिष्ट दूर करने में संलग्न हैं. यजमान श्रेष्ठ राज्य
प्राप्ति हेतु इस सुयज्ञ को कर रहे हैं. वे प्रजापालक बनें. ( २७ )
अभिभूरस्येतास्ते पञ्च दिशः कल्पन्तां ब्रह्माँस्त्वं ब्रह्मासि सवितासि सत्यप्रसवो
वरुणोसि सत्यौजा ऽ इन्द्रोसि विशौजा रुद्रोसि सुशैवः.
बहुकार श्रेयस्कर भूयस्क्रेन्द्रस्य वज्रोसि तेन मे रध्य.. (२८)
यजमान शत्रुओं को पराभूत करने वाले हैं. पांचों दिशाएं यजमान के लिए
फलीभूत हों. आप ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मा, सविता व सत्य के उत्पादक हैं. आप वरुण,
सत्यवान व ओजस्वी हैं. आप इंद्र व विशाल, ओजस्वी और रुद्र हैं. आप अच्छे कर्म
वाले हैं. आप बहुत श्रेयस्कर हैं. आप वज्र हैं. आप अपने यजमान को धन प्रदान
करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
अग्निः पृथुधर्मणस्पतिर्जुषाणो अग्निः पृथुधर्मणस्पतिराज्यस्य वेतु स्वाहा.
स्वाहाकृताः सूर्यस्य रश्मिभिर्यतध्व १७ सजातानां मध्यमेष्ठ्याय.. (२९)
अग्नि विशाल हैं. अग्नि धर्म के पालक हैं. अग्नि यज्ञ में अग्रणी हैं. अग्नि से
निवेदन है कि वे हमारा मन जानें. हमारी आहुति को स्वीकारने की कृपा करें. अग्नि
के लिए स्वाहा. अग्नि सूर्य की किरणों से स्वयं भी बलवान हों तथा यजमान को
१२२ - यजुर्वेद