यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध दसवां अध्याय
भी राजाओं के मध्य प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (२९)
सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभिरिन्द्रेणास्मे बृहस्पतिना
ब्रह्मणा वरुणेनौजसाग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतः प्र
सर्पामि.. (३०)
सविता देव उत्पादक हैं. सरस्वती देवी से, उन की वाणी से हम प्रेरित होते हैं.
हम त्वष्टा देव के रूप से व पशुवान पूषा देव से प्रेरित होते हैं. हम सामर्थ्यशाली
बृहस्पति व अग्नि के तेज से प्रेरित होते हैं. हम राजा सोम से प्रेरित होते हैं. हम
पालक विष्णु से प्रेरित होते हैं. हम देवताओं के दिव्य ( कर्म ) पथ पर ( जाने हेतु )
प्रेरित होते हैं. ( ३० )
अश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्व.
वायुः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्क्सोमो अतिस्रुतः.
इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३१)
आप दोनों अश्विनीकुमारों के लिए परिपक्व होइए. आप सरस्वती देवी के
लिए परिपक्व होइए. इंद्र देव अन्य देवताओं को योजित करते हैं. आप इंद्र देव के
लिए परिपक्व होइए. वायु से पवित्र सोम का यज्ञ में श्रवण हो रहा है. सोम इंद्र देव
से जुड़े हुए हैं. सोम इंद्र देव के मित्र ( सखा ) हैं. ( ३१ )
कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.
उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्णे.. (३२)
हे सोम! आप को प्रजा के कल्याण हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप
यहां आइए और भोजन कीजिए. यजमान आप को बैठने के लिए कुशासन प्रदान
करते हैं. यजमान आप के लिए उक्ति (मंत्रों से ) यज्ञ करते हैं. आप को
अश्विनीकुमारों के लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को सरस्वती देवी के
लिए बरतन में ग्रहण किया जाता है. आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण किया
जाता है. आप को शत्रु नाश हेतु बरतन में ग्रहण किया जाता है. ( ३२ )
युव ꣳ१ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा.
विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (३३)
हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों नमुचि राक्षस के पास स्थित सोम रस का भी
पान करने वाले हैं. आप रमणीय सोमरस का भी पान करने वाले हैं. इंद्र देव शुभ
कर्मा ( शुभ काम करने वाले ) हैं. आप दोनों इंद्र देव के रक्षक बनने की कृपा
करें. ( ३३ )
यजुर्वेद - १२३